फिर पधारों म्हारो देश चीता महाराज

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फोटो: सोशल मीडिया से साभार

गौतम चक्रवर्ती

17 सितम्बर के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन के अवसर पर मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया की राजधानी विंडहॉक से लाया गए 8 चीतों को छोड़ा गया है। इन चीतों में 5 मादा और 3 नर चीते हैं।

हालांकि इन चीतों को दोबारा से भारत में बसाए जाने की प्रसन्नता के बीच पहला प्रश्न यह उठता है कि आखिर चीते भारत में विलुप्त क्यों और कैसे हो गए?

एक समय भारत में, चीतों की संख्या बहुत हुआ करती थी। यह वन्यप्राणी उत्तर में जयपुर और लखनऊ से लेकर दक्षिण में मैसूर तक और पश्चिम में काठियावाड़ से पूर्व में देवगढ़ के जंगलों तक में बहुसंख्या में पाये जाते थे।

भारतीय चीतों का तेजी से शिकार होते चले जाने के कारण एक समय उनकी प्रजाति संकट में आ गई। मध्य प्रदेश में कोरिया के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने वर्ष 1947 में देश में शेष बचे अंतिम तीन चीतों का भी शिकार कर उन्हे मार डाला था।

उसके पश्चात वर्ष 1952 में भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर देश में चीतों को विलुप्त वन्य प्राणी घोषित कर दिया। इससे पहले ऊंचे पहाड़ों, तटीय क्षेत्रों और उत्तर पूर्व के क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण देश के जंगलें चीतों की आवाज से गुंजायमान रहा करती थी। भारत में मुगल साम्राज्य के दौरान अकबर कालीन समय में भारतीय वन्य क्षेत्रों में 1000 से अधिक चीतें हुआ करते थे, जिनका उपयोग काले हिरण और चिंकारे के शिकारों में किया जाता था।

एक पशु विशेषज्ञ के रिपोर्ट के अनुसार, इस जानवर की विनम्रता ही इसके विनाश का कारण बना। दरअसल चीते इतने शालीन होते हैं कि इनकी तुलना बिल्लियों से भी की जा सकती है। अन्य वन्य प्राणी जैसे बाघ, शेर और तेंदुये की तरह चीतों ने हम इंसानों को कभी भयभीत नही किया है।

कभी भारतीय राजघरानों में शिकार करने की परिपाटी में हिरन के बाद चीतों का शिकार करना उनका पसंदीदा शौक हुआ करता था और यह परिपाटी राजघरानों के मध्य सदियों से चली आ रहा थी। इन चीतों को वश में करना आसान हुआ करता था जिसके कारण बाघों की अपेक्षा यह कम खतरनाक और कम आक्रमणकारी हुआ करते हैं अक्सर इनका इस्तेमाल भारतीय कुलीन घरानों द्वारा शिकार के खेल खेलने के रूप में किया जाता रहा है। भारत में शिकार के लिए चीतों का निशाना बनाने का सबसे पहला अभिलेख 12वीं शताब्दी के “मानसउल्लास” जैसे संस्कृत पाठ में उल्लेखित मिलता है।

शिकार के लिए चीतों को पकड़ने और उन्हें कैद में रखने के कारण उनकी प्रजनन दर में कमी आने लगी और धीरे -धीरे इसकी संख्या में अत्यंत गिरावट आती चली गई और एक समय आते आते देश में मात्र 3 ही चीते शेष बचे रह गए थे।

बिल्ली के कुल (विडाल) में आने वाला चीता (एसीनोनिक्स जुबेटस) अपनी अदभुत फूर्ती और रफ्तार के लिए जाना पहचाना जाता है। यह अपने पंजों की बनावट के रूपांतरण के कारण पहचाने जाते हैं। इसी कारण, यह इकलौता विडाल वंशी है जिसके पंजे बंद नहीं होते हैं और जिसके कारण इसकी पकड़ भी कमज़ोर रहती है (अतः यह वृक्षों में नहीं चढ़ सकता है हालांकि अपने फुर्तीलेपन के कारण पेड़ों के नीची टहनियों तक ही इसकी पहुंच है)। ज़मीन पर रहने वाला ये सबसे तेज़ जानवर है जो एक छोटी सी छलांग में 120 कि॰मी॰ प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ने में समर्थ है।

दरअसल हमारे देश के प्रधानमंत्री का उद्देश्य भारत में फिर से एक बार चीतों के पुनरुत्पादकता स्थापित कर चीतों की आबादी को उन क्षेत्रों में फिर से पुनरुस्थापना करना है कि जहां वे पहले मौजूद थे और उन चीतों के फलने -फूलने के लिए उनके अनुरूप परियावर्ण भी मौजूद है।

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