भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं

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प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के जन्मदिन पर उनकी 3 कवितायेँ विशेष
जन्मस्थान : बस्ती, यूपी, 15 सितंबर 1927 – 24 सितंबर 1983

1-

अंत मे

अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूं
एक समर्थ सच्ची आवाज
यदि कहीं हो।

अन्यथा इसके पूर्व कि
मेरा हर कथन मेरा हर मंथन
हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए
उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूं
जो मृत्यु है।

‘वह बिना कहे मर गया ‘
यह अधिक गौरवशाली है
यह कहे जाने से-
कि वह मरने के पहले
कुछ कह रहा था
जिसे किसी ने सुना नहीं।

2-
भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं।
उसे तबतक घूरो
जब तक तुम्हारी आंखें
सुर्ख न हो जाएं।
और तुम कर भी क्या सकते हो
जब वह तुम्हारे सामने हो?
3-
गोली खाकर
एक के मुँह से निकला—
‘राम’।
दूसरे के मुँह से निकला—
‘माओ’।
लेकिन तीसरे के मुँह से निकला—
‘आलू’।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।”
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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