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    Home»ब्लॉग

    कैरी का अचार और बच्चों स्कूल डालने का समय

    By September 14, 2017 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    वीरेन्द्र जैन

    एक जमाना था जब बापश्री अपनी औलादों को बकरी की तरह घसीटते हुये ले जाते थे और गुरूजी के चरणों में पटकते हुये कहते थे कि हड्डी-हड्डी मेरी और मांस खाल आपका, बस इसे पढा लिखा कर चिट्ठी बांचने और हिसाब किताब करने लायक बना दीजिये।
    तब गुरूजी कसाई की तरह प्रसन्न होते थे तथा पीठ पर हाथ फेरते हुये हुये मांस टटोल लेते थे, फिर प्रसन्नता से अपनी छड़ी की ओर देख कर कहते कि चिंता न करें कल लाकर पाटी पूजन करा दें।
    उस जमाने में पीठ पूजने से पहले पाटी पूजने की परंपरा हुआ करती थी तथा शिष्य को आदमी बनाने से पहले मुर्गा बना कर डार्विन के सिद्धांत का सत्यापन किया जाता था। स्कूल जाने से पहले बच्चे ऐसी दहाड़ें मार मार कर रोते थे जितना आजकल डाक्टर के यहाँ इंजैक्शन लगवाने को ले जाते समय भी नहीं रोते। इस कठिन तपस्या से तपकर जो लोग निकलते थे उन्हें डरने की आदत पड़ जाती थी और वे सरकार बहादुर के बफादार कर्मचारी बनते थे।
    आज माहौल दूसरा है। जून के पहले सप्ताह से ही समाचार पत्रों के पृष्ठ दर पृष्ठ रंगीन विज्ञापनों से भरे रहते हैं और छात्रों के साथ साथ अभिवावकों को अपने विद्यालयों महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए ललचाते रहते हैं। नगर की दीवारें दर दीवारें होनहारों के पत्ते चीकने करने के आश्वासनों से रंग दी जाती हैं। जो स्कूल अखबारों में विज्ञापन नहीं दे पाते वे अखबारों में परचे ठुंसवा देते हैं। बच्चे तो बच्चे, बच्चों के मां बाप तक भ्रम में फंस जाते हैं कि सपूत को भावी प्रशासनिक अधिकारी, डाक्टर, इंजीनियर, या दीगर ऊपरी कमाई वाले पद पर जाने योग्य बनाने के लिए कौन से संत के कान्वेंट में डलवाया जाये।
    यह वही मौसम होता है जब घराें घरों तक फैली मम्मियों की जाति सोच रही होती है कि नई कैरी आ रही है, इसका अचार कैसे और काहे में डलवाया जाये। इस बहाने बोलचाल बन्द पड़ोसिनों से बोलचाल भी शुरू हो जाती है।
    क्यों बबलू की मम्मी तुमने अचार डाल लिया?
    हाँ- हमने तो परसों ही डाल लिया
    बहुत जल्दी डाल लिया!
    हाँ, परसों सन्डे था, बबलू के पापा फ्री थे, सो उनसे आम कटवा लिए।
    काहे में डाला?
    सरसों के तेल में डाला
    तेल भौत मेंगा हो गया है
    हाँ अभी तो उसकी धार भी देखो, अभी क्या है!
    बाद में इसी भाषा में बबलू के बारे में बात होने लगती है।
    बबलू का एडमीशन हो गया?
    हाँ फार्म डलवा दिया है
    कौन से स्कूल में डलवाया?
    अब नाम तो इनके याद रहते नहीं पर वो थाने के पीछे वाले अंग्रेजी स्कूल में डलवाया है
    कितने पैसे लगे?
    फीस, वो तो बारह हजार लग गये, ड्रैस किताबें सब वहीं से मिलेंगीं
    स्कूल में भी भौत पैसे लगने लगे हैं, सब में धन्धा हो रहा है
    तेल हो या स्कूल मम्मियों का काम मंहगाई पर हाय करना हो गया है
    इस मौसम में आम का अचार और बच्चे को स्कूल में डलवा कर जो निबट लेता है वही शान्ति के साथ सो पाता है। जरा सी देर हो जाये तो आम अचार के लायक नहीं रह जाते। आम का अचार तो फिर भी ठीक है पर स्कूल का चुनाव बहुत कठिन है। स्कूलों के विज्ञापन इतने लुभावने छपने लगे हैं कि विज्ञापन की कला से ग्राहक फांसने वाले बिल्डर और पर्यटकों को पटाने वाले होटल तक हीनता बोध के शिकार हो जाते हैं। वैसे विज्ञापन का यथार्थ यह होता है कि प्राइमरी से कम्प्यूटर पर शिक्षा देने का दावा करने वाला स्कूल बच्चों को पीने का साफ पानी नहीं दे पाता जिसे उन बच्चों को घर से लाद कर ले जाना पड़ता है। पढाई से ज्यादा होमवर्क मिलता है जिससे माँ बाप शिक्षित होते रहते हैं। इन बच्चों को टैस्टों और स्कूल की परीक्षाओं में अवशय ही पचहत्तर प्रतिशत से अधिक अंक देने का नियम है ताकि फीस चुकाने वाले मॉ बाप उनके भविष्य के लालच में भ्रमित रह कर सोचते रहें कि बेटे के अधिकारी बन जाने पर कौन से बैंक में लॉकर लेंगे। संयोग से अभी तक स्कूलों के विज्ञापनों में अभिवावकों को फंसाने के लिए हसीन मॉडलों का प्रयोग प्रारंभ नहीं हुआ है पर जब बीड़ी और मोटर साइकिलें हसीनाओं के कारण बिक सकती हैं तो स्कूल में एडमीशन क्यों नहीं हो सकते!
    जब भी कोई बड़े पद पर पहुँचता है तो उसके परिचय में यह बताया जाता है कि वह कौन से स्कूल में पड़ा है पर रिश्वत और टैक्सचोरी में पकड़े जाने पर संतों के नाम वाले उस पवित्र शिक्षा संस्थान का नाम उल्लेख नहीं होता जहाँ से निकल कर उसने यह प्रतिभा अर्जित की है। मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक अंग्रेजी स्कूल के बोर्ड पर उन पूर्व प्रतिभाशाली छात्रों के शुभ नाम लिखे जाना चाहिये जिनके घर पर छापा पड़ चुका है। इन छापों वाले सम्मान का प्रयाेग स्कूल वाले अपने नये विज्ञापनों में दे सकते हैं और टयूटोरिल क्लासेज वालों को ता यह काम आवशयक रूप से करना ही चाहिये ताकि दुनिया को पता लगे कि उनके संस्थान से निकल कर लोगों की हैसियत कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है।

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