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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    सियासी भांडों की तालियों वाला दूसरा हाथ भी काटो!

    By December 8, 2017Updated:December 8, 2017 Hot issue No Comments4 Mins Read
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    Post Views: 593
    – नवेद शिकोह
    लोकतंत्र के खंभे इन पर नकेल नहीं कसते। मज़ा लेते हैं। बढ़ावा देते हैं। लाभ उठाते हैं।
    लोकतंत्र के प्रहरियों के धंधे का कच्चा माल होते है विवादित या नफरत फैलाने वाले बयान। लोकतंत्र की गंदी मंडी इत्ती नीच हो गयी है कि वैश्याओं के कोठे का तसव्वुर भी इन नीचों से ऊंचा है।
    लोकतंत्र के खंभों की अजब दास्तां है। खंभों के बीच हम-आप जैसे आम नागरिकों ने इन सियासी भांडों के लिए मसनद बिछायी है। सियासत की सबसे निचली सतह तक पहुंच चुकी इस भांडगीरी में जो भांड जितनी तेज ताली बजाता है उतनी तेजी से हम उसपर अपने अनमोल वोटों की बौछार कर देते हैं।
    नफरत फैलाने और अमर्यादित बयान देने वालों के खिलाफ कानून के सख्त फैसले नहीं आते। पार्टियां इन्हें निकाल बाहर नहीं करतीं। मीडिया वाला खंभे का तो क्या कहना। पहले विवादित बयान निकलवाने की पुरजोर कोशिश की जाती है, और ये कामयाबी मिल जाये तो विवादित बाइट की खूब मार्केटिंग, रिएक्शन्स, चटकारे, प्रचार, टीआरपी और खूब चर्चा।
     यानी पहले उकसाओ, उत्तेजित करो, रेप कराओ, रेप की फिल्म दिखाओ, देखकर कोई गुस्सा करे, कोई चटकारे ले। रिएक्शन आयें… बस इसके बाद तो सियासी आकाओं की शाबाशी और टीआरपी, दोनो पक्की।
    कार्पोरेट और सियासत की गुलामी के साथ टीआरपी की अंधी दौड़ में मीडिया कितने नीचे स्तर पर पहुंच गयी है इसपर भी गौर फरमाने की जरुरत है।  विवादित बयान खुद कहलवाने, खुद दिखायें, और खुद हीं अपने एंकर सें शर्मनाक और निंदनीय बयान कहलवाना कितना हास्यास्पद है।
    नेताओं के विवादित बयान नैतिकता के रेप में सबको मज़ा देते हैं। मीडिया इन्हें खूब दिखाकर इन नेताओं का क़द बड़ा करती है। फायर बांड का खिताब मिलता है। पार्टी इनके खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय अन्दर ही अंदर शाबाशी देते हैं इन्हें।
     ये बयान बहादुर आप पर धर्म, क्षेत्रवाद, समुदाय वाद से भावनाओं का जादू चलाते हैं। नफरत की आग में अपकी बुद्धि को ख़ाक कर देते हैं, इसलिए आप इन बयान बहादुरों को अपना बहुमूल्य वोट देकर उन्हें आगे बढ़ाते हैं।
     किसी एक राजनीतिक पार्टी में ही ऐसे नेता नहीं पैदा किये जाते, कमोबेश हर पार्टी में ऐसे नेताओं और बयानों को तुरुप का पत्ता मानकर बढ़ावा दिया जाता है।
    अप्रत्यक्ष रुप से प्रधानमंत्री की निंदा/आलोचना में अमर्यादित एक शब्द का इस्तेमाल करने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के विवादित बयान की खूब चर्चायें हो रही हैं। इस तरह का विवादित बयान अक्सर सुर्खियां बटोरता है। ये कोई नयी बात नहीं है। समाज को बांटने, नफरत फैलाने, धर्म-जाति को उकसाने वाले या अमर्यादित भाषा वाले विवादित बयानों से राजनीति की वैतरणी पार करना के प्रयास लगातार सफलता का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।
    भारतीय राजनीति के भांड की तालियां दोनों हाथों से बजती हैं। कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के खिलाफ तत्काल सख्त कार्रवाई कर इन तालियों का एक हाथ काट के आज काबिले तारीफ शुरुआत की है।
    अब भाजपा अपना वाला कोई हाथ काट के भारतीय राजनीति की कमजोर होती नैतिकता के हाथ मजबूत करके दिखाये तो बेहतर होगा।
    नीचता की ताली बजने में सहभागिता वाला हाथ हमारा-आपका भी है, आईये हम सब इस हाथ को काट दें।
    जिस देश के बच्चे भात-भात कह कर भूखे मर जाते हों…  जिस देश के सैकड़ों बच्चे बिना आक्सीजन के तड़प- तड़प कर दम तोड़ देते हों, उस देश के नेता की ये फिक्र ना हो,  फिक्र ये हो कि राहुल गांधी हिन्दू हैं या मुसलमान? ऐसे बयान से ज्यादा नीच बयान कोई हो सकता है क्या?
    राहुल हिन्दू या मुसलमान? मुद्दे उठाते नेताओं के बयानों को खूब दिखाने और इसपर खूब चर्चा करने वाली मीडिया से भी ज्यादा क्या कोई नीच हो सकता है?
    ऐसे बयानों के रंग में रंग कर विकास के बजाय धर्म और नफरत की राजनीति करने वालों को जिताने वाले हमारे-आपके जैसे मतदाताओं से भी ज्यादा नीच हो सकता है कोई?
    धर्म, नफरत और अमर्यादित माहौल से प्रभावित चुनावों मे जीता हुए जनप्रतिनिधि कितना नीच होगा, अब आप खुद अंदाजा लगाइये!

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