आज जो कुछ भी हूं माता-पिता की बदौलत ही हूं: अतुल मालिकराम

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इंटरव्यू: इंदौर के लोकप्रिय भड़ास कैफ़े के ओनर अतुल मालिकराम से खास बातचीत

कहते हैं इंसान में जब कुछ कर गुजरने का जज़्बा होता है तो मंजिल खुद बा खुद उसके करीब आ जाती है एक ऐसे ही अच्छे इंसान हैं इंदौर के अतुल मालिक राम जी! जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कड़ा संघर्ष कर एक बड़ा मुकाम हासिल किया है आज उनके कैफे भड़ास को दुनिया जानती है। कांसेप्ट भी कुछ ऐसा कि आश्चर्य चकित हुए बिना भी नहीं रह सकते, यहाँ लोग अपना गुस्सा और गुबार लेकर आते हैं और रिफ्रेश होकर जाते हैं। लोगों का कहना हैं कि जब मैं यहाँ आया था, तो बेहद गुस्से में था लेकिन यहाँ मैंने थोड़ा समय बिताकर अपनी भड़ास निकाली और अब मै मूड फ्रेस लेकर यहाँ से जा रहा हूँ!

पिता जी ने कहा कि बेटा तू आगे बढ़:

जब अपने नाम के पीछे मलिकराम लगाया तो ऐसा लगा कि खुद पिता मेरे पीछे खड़े हो गये हों और मानो मुझसे ये कह रहे हों कि बेटा तू आगे बढ़। उस दिन खुद से एक वादा किया कि इस नाम को कभी झुकने नही दूंगा। आखिर कैसे झुकने देता। उन्होंने कहा कि मैं आज जो कुछ भी हूं। माता-पिता की बदौलत ही तो हूं।

वृद्धाश्रम का मैं बहुत ध्यान रखता हूँ:

उन्होंने कहा कि परसो रोज कि तरह मैं वृद्धाश्रम गया था। वहां मैं कई बुजुर्गो से मिला जो मुझमें उनका बेटा तलाश रहे थे। वहां एक माता जी मिली। मुझे देख उनकी आंखे भर आयी। वहां के स्टॉफ ने बताया कि अक्सर बच्चों को याद कर इन बुर्जुगों की आंखें यूं ही छलक उठती हैं। कोई अगर मिलने आता है तो ये बच्चों के समान चहकने लगते हैं। उन बुजुर्गो से प्रश्न किया कि वो किन परिस्थितियों में यहां पहुंचें। सही मायने में लगभग सभी का जबाव एक सा ही था कि बेटे की भी मजबूरी रही होगी। खर्च नही उठा रहा पा रहा होगा या उसका अपना भी परिवार है! हमारा खर्च कैसे चला पायेगा। हम यहीं ठीक हैं?

अतुल जी ने कहा कि ‘अपना परिवार’ इस शब्द ने मुझे बैचेन सा कर दिया। मै रात भर यही सोचता रहा कि हम कैसा परिवार बना रहे हैं। जिसमें हमारे माता-पिता के लिए ही जगह नही बची! अफ़सोस की बात है कि हम उन्हें हमारे माता-पिता को ब्रांडेड कपड़ें भी नहीं दे पा रहे हैं।

जीवन में बहुत संघर्ष किया:

सच कहा जाये तो सभी के जीवन में संघर्ष होता है लेकिन अतुल जी के जीवन में संघर्ष कुछ ज्यादा ही बड़ा था, बचपन से ही एक सयुंक्त परिपार का हिस्सा रहें, जिसमें उनके पास एक ऐसा भी समय आया कि उन्हें परिवार का बड़ा भाई होने के नाते परिवार की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी, लेकिन वे कभी घबराये नहीं इस बीच शिक्षा भी पूरी नहीं हो पायी। परिवार चलाने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष करते हुए लोगों के घरों में भी काम किया, बर्तन भी धोये और लोगों के ताने भी सुने, लेकिन कभी किसी से भी शिकवा शिकायत नहीं की।

सब साई कृपा है:

अतुल जी ने बताया कि संन 2005 में एक बार मैं बाबा के दरबार गया। और अपनी मन की व्यथा साई से के सामने रखी, बाबा के प्रति मन में सच्ची श्रद्धा तो थी ही, इसके बाद समय धीरे धीरे बदलने लगा। अतुल जी ने कहा कि आज जो कुछ भी मेरे पास है सब बाबा की कृपा से है। उन्होंने कहा कि शिर्डी जाने के बाद मेरे जीवन में नया उत्साह और समृद्धि का दौर आया और मैं अपनी मंजिलें चढ़ता चला गया। इस बीच मुझे विदेश भी जाने का मौका मिला, जहाँ मैंने वहां रहकर काफी कुछ सीखा और फिर वापस इंडिया आ गया। उन्होंने कहा कि साई भगवान् की कृपा आज मेरा कारोबार अच्छा चल रहा है।

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