अमर शहीदों की उत्पीड़न के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई ने लाखों भारतीयों को स्वतंत्रता के आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उनका निःस्वार्थ बलिदान और साहस हम सभी के लिए एक प्रेरणा है, खासकर उनके लिए जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और अपने पेशेवर करिअर को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका जीवन हमें कई महत्वपूर्ण सबक सिखाता है जो हमारी शैक्षणिक और व्यावसायिक गतिविधियों में हमारी मदद कर सकता है।
अमर शहीदों के जीवन से जुडी 5 बड़ी शिक्षा
चरित्र की ताकत : जब 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंके, तो वे दोनों वहां से भागे नहीं, बल्कि शान से खड़े रहे। उन्होंने कहा कि हम बंद कानों को खोलना चाहते हैं, और क्रांति का सन्देश देना चाहते हैं। ऐसा करने के लिए हिम्मत लगती है। गिरफ्तारी के बाद दोनों को ‘ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ’ दंड दिया गया।
विषय: चरित्र की ताकत से हमें डर से मुक्ति मिल जाती है। अपने करिअर में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी किसी के दबाव में आकर न करें।
भगत सिंह की पढ़ने की आदत : 23 वर्षीय क्रन्तिकारी भगतसिंह को साहित्य पढ़ने का बहुत शौक था। लाहौर जेल में उनके साथ रहे शिव वर्मा बताते हैं कि ‘समाजवाद के प्रति उनके मन में एक नरम कोना होने के बावजूद डिकेन्स, अप्टॉन सिंक्लेयर, हॉल केन, विक्टर ह्यूगो, गोर्की, स्टेप्निक, ऑस्कर वाइल्ड और लियोनार्ड एंड्रू उनके पसंदीदा लेखक थे। शायद पढ़ने के कारण ही उनके विचार इतने क्रन्तिकारी और मेच्योर थे कि 23 की उम्र वे अपने घरवालों से कहा करते थे की मैंने आजादी (देश की ) से शादी कर ली है । ‘
लेसन: खूब पढ़िए। अलग- अलग तरह की जनरल किताबें पढ़िए । अपने दिमाग को खुराक दीजिए। रुक मत जाइए । सुखदेव की लीडरशिप स्किल्स: सुखदेव अपने लीडरशिप स्किल्स के लिए जाने जाते थे और विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक कारणों के लिए लोगों को संगठित करने और जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वह एक प्रतिभाशाली वक्ता भी थे और अपने भाषणों से लोगों को प्रेरित करने में सक्षम थे। यह कहते हुए कि ब्रिटिश साम्राज्य को हिला देने वाली साजिश के पीछे उनका ही दिमाग था !
लाहौर षडयंत्र केस की FIR में सुखदेव का नाम प्रथम स्थान पर आता है। 25 अभियुक्तों की सूची में भगत सिंह 12वें स्थान पर थे, जबकि राजगुरु 20वें स्थान पर! वास्तव में, सुखदेव 1930 के लाहौर षडयंत्र केस में मुख्य अभियुक्त थे, जिसका शीर्षक ‘क्राऊन बनाम सुखदेव और अन्य’ था ! लेसन – अपने एक्शन्स (कर्मों) की पूरी जिम्मेदारी लीजिए। डरिए मत।
भाषाओं पर राजगुरु की पकड़ : राजगुरु का जन्म पुणे के पास खेड़ में शिवराम हरि राजगुरु के रूप में हुआ था। वे स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ साथ विद्वान भी थे। उन्होंने खेड़ में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में पुणे में न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में अध्ययन किया। वे संस्कृत, मराठी और अंग्रेजी सहित विभिन्न विषयों में कुशल थे। वे एक कुशल निशानेबाज थे। उन्हें ‘भगत सिंह की पार्टी का गनमैन’ भी कहा जाता था ।
गंभीर सोच और नवाचार : राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव महत्वपूर्ण विचारक और नवप्रवर्तक थे जिन्होंने पारंपरिक ज्ञान को चुनौती दी और नए विचारों और रणनीतियों के साथ आए। वे सत्ता से सवाल करने, यथास्थिति को चुनौती देने और साहसिक कदम उठाने से नहीं डरते थे । रचनात्मक रूप से सोचने और नया करने की उनकी क्षमता ने उनकी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भगत सिंह ऑर्गेनाइज्ड रिलिजन को नहीं मानते थे।
ये सबक विशेष रूप से उन प्रोफेशनल्स के लिए प्रासंगिक है जो तेजी से बदलते कारोबारी माहौल का सामना कर रहे हैं, क्योंकि ये हमें याद दिलाते हैं कि आधुनिक कार्यस्थल में सफलता के लिए महत्वपूर्ण सोच, नवाचार और अडैप्टेबिलिटी, एजुकेशन, रीडिंग हैबिट्स आवश्यक स्किल्स हैं।







