लंबी यात्रा करके भारत पहुंचे परदेशी पक्षी, झील में पंहुचने वाले पक्षियों का प्रवास लगभग चार माह तक रहता है
दीपावली से होली तक रहती है मेहमान पक्षियों के चहचहाट से झील गुलजार
यूपी के संतकबीरनगर जिला मुख्यालय से लगभग 18 किमी दूर बर्तन नगरी कही जाने वाली बखिरा कस्बे के पास स्थित प्रसिद्ध बखिरा झील में विदेशी पक्षियों का आना शुरू हो गया है। हजारों किमी की यात्रा करने के बाद प्रसिद्ध बखिरा झील में पंहुचने वाले पक्षियों का प्रवास लगभग चार माह तक रहता है। दीपावली से होली तक मेहमान पक्षियों के चहचहाट से झील गुलजार रहती है। इसके बाद फरवरी-मार्च में ये पक्षी वापस अपने ठिकाने पर चले जाते हैं, लेकिन इस दौरान यह झील हजारों विदेशी पक्षियों की कब्रगाह बन जाता है और बहुत कम ही पक्षी वापस अपने देश लौट पाते हैं।
अतिथि देवो भव:
अतिथि देवो भव की सभ्यता वाले देश में प्रवास करने आये मेहमान बेजुबानों को जीभ के स्वाद के लिए शिकारियों द्वारा मौत के घाट उतार दिया जाता है और संबंधित विभाग मूकदर्शक बना रहता है। वन विभाग के दावे के विपरीत मेहमान पक्षियों का शिकार लगातार जारी है। जिस देश में शिकारी के तीर से घायल पक्षी की जान बचाने के लिये गौतम बुद्ध ने अपने चचेरे भाई से विवाद मोल ले लिया था।
जिस देश में शरण में आए पक्षी की जान बचाने के लिए महाराज शिबि ने अपने शरीर को तराजू पर चढ़ाने से परहेज नहीं किया। जिस देश में परोपकार,दया के अनगिनत किस्से हों। ऐसे देश में प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लगाने और ह्रदय को मोहित करने वाले प्राकृतिक प्रकोप से जान बचाने के लिए हजारों किमी की यात्रा करके यहां आते हैं लेकिन यहां भी मौत उनका पीछा नहीं छोड़ती है।
लंबी यात्रा करके भारत आते हैं विदेशी पक्षी

उल्लेखनीय है कि साइबेरिया, ट्रुंडा-टैगा जैसे अति ठंडे स्थानों पर सर्दियों के मौसम में तापमान बहुत कम हो जाता है जो 15 से 20 डिग्री सेल्सियस माइनस में चला जाता है। नदियां, झीलें और सरोवरों का पानी जम जाता है और पशु-पक्षियों का जीवन असम्भव हो जाता है। ऐसे में अपनी जान बचाने के लिए विदेशी पक्षी लगभग हजारों किमी की लंबी यात्रा करके भारत के विभिन्न नदियों, झीलों और सरोवरों पर आते हैं जहां का तापमान उनके अनुकूल होता है। ये मेहमान पक्षी खासतौर पर उत्तर भारत के जलाशयों को अपना ठिकाना बनाते हैं।
कई विदेशी पक्षी रास्ते में ही चढ़ जाते हैं काल की भेंट
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार ये पक्षी उन्हीं स्थानों पर आते हैं जहां उनके पूर्वज आते रहे हैं। बखिरा जैसी झीलों में आकर अनुकूल वातावरण व तापमान में प्रजनन करके अपनी संतति भी बढ़ाते हैं। यद्यपि लंबी यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी पक्षी रास्ते में ही काल के गाल में भी समा जाते हैं, लेकिन जो बचकर यहां तक पहुंच जाते हैं वे भी विविध प्रकार के मांस के शौकीनों के स्वाद के लिए शिकारियों के निशाने पर होते हैं।
बखिरा झील आजकल इन्हीं विदेशी मेहमान पक्षियों की शरणस्थली है जहां सूर्योदय के साथ ही निराली छटा बिखरती है और हर किसी का मन मोह लेती है लेकिन अपने पेट की आग बुझाने के लिए शिकारी उनकी जान के ग्राहक बन जाते हैं। शिकारमाही रोकने के लिए जिम्मेदार वन विभाग के अधिकारी कभी-कभी कुछ लोगों को पकड़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं लेकिन विदेशी पक्षियों के शिकार पर प्रतिबंध के बावजूद उनका शिकार होता रहता है।
शिकारी करते हैं हाईटेक तरीके से पक्षियों का शिकार
स्थानीय लोगों की मानें तो पक्षियों का शिकार करने के लिए शिकारी हाईटेक तरीके से पक्षियों का शिकार करते हैं। नशीली दवा झील के आसपास पत्तों पर छिडक़ने के बाद शिकारी पक्षियों को पकड़ लेते हैं। इसके बाद पहले से सेट तस्कर इन पक्षियों को ऊंची कीमत देकर शिकारियों से खरीद लेते हैं।

यहां आने वाले विदेशी पक्षियों में लालसर, हिवीसील, कोचार्ड, सूरखाल, गोजू, सवल, भपटेल आदि हैं जबकि स्थानीय पक्षियों में कैमा, वाटरहेन, कारमेंट, बगुला, सारस समेत दर्जनों प्रजाति की पक्षियों की चहचहाट से झील गुलजार रहता है। झील में पक्षियों के शिकार होने के बारे में पूछने पर पक्षी विहार बखिरा के रेंजर सुरेशराम ने कहा कि यहां पर सीमित संसाधन के कारण शिकारियों पर रोक नहीं लग पा रहा है। वहीं थानाध्यक्ष बखिरा रामसमुझ प्रभाकर का कहना है कि पुलिस लगातार गश्त करके शिकारमाही पर नजर रखती है।







