आज के भारत और विश्व में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई न केवल गहरी हो गई है, बल्कि शोषण के रूप भी और अधिक क्रूर होते जा रहे हैं। कुछ दिन पहले ब्रिटेन के सबसे अमीर हिंदुजा परिवार के चार सदस्यों जिसमें प्रकाश हिंदुजा, कमल हिंदुजा, अजय हिंदुजा और नम्रता हिंदुजा -को स्विस कोर्ट ने भारतीय प्रवासी नौकरों के शोषण के लिए जेल की सजा सुनाई। अब उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक फैक्ट्री से 12 बंधुआ मजदूरों (कई नाबालिग) को मौत के मुंह से बचाया गया। ये घटनाएं महज अलग-अलग मामले नहीं, बल्कि एक विकृत व्यवस्था की तस्वीर हैं जो मजदूरों की मेहनत पर पलती है।
मुजफ्फरनगर की फैक्ट्री वाली घटना के अलावा, दिल्ली-एनसीआर (नोएडा, गुरुग्राम) और लखनऊ जैसे शहरों में भी ऐसी घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। NGO, पड़ोसियों और पुलिस की मदद से कई मामलों में मजदूरों को बचाया गया, लेकिन समस्या जड़ से नहीं हटी।

हिंदुजा परिवार: अमीरी का घिनौना चेहरा
स्विट्जरलैंड की जेनेवा विला में हिंदुजा परिवार ने भारतीय नौकरों से 18 घंटे काम करवाया, महज 700 रुपये (£7) प्रतिदिन से भी कम वेतन दिया—जबकि स्विस न्यूनतम दर लगभग 2800 रुपये प्रति घंटा है। पासपोर्ट जब्त, बाहर जाने की मनाही, रुपये में भुगतान और कुत्तों की देखभाल पर ज्यादा खर्च। कोर्ट ने उन्हें शोषण और अवैध रोजगार का दोषी ठहराया (मानव तस्करी के गंभीर आरोप से बरी कर दिया गया)। सजा: 4 से 4.5 साल जेल।
बता दें कि ये भारत के वे “सफल” पूंजीपति हैं जो विदेश में भी उसी मानसिकता को लेकर जाते हैं- मजदूर इंसान नहीं, मशीन है। उनकी दौलत मजदूरों के खून-पसीने पर टिकी है।
मुजफ्फरनगर: आधुनिक गुलामी का नरक
22 जून 2026 को मुजफ्फरनगर की तितावी थाना क्षेत्र की एक फैक्ट्री (डिस्पोजेबल बाउल-प्लेट बनाने वाली) से 12 मजदूरों को मुक्त कराया गया। बिहार, UP, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ आदि से लाए गए ये मजदूर अच्छी सैलरी, भोजन और रहने का लालच देकर फंसाए गए। हकीकत?
- कोई वेतन नहीं।
- सूखी रोटी-नमक या पशु चारा।
- पिटबुल कुत्तों की निगरानी।
- विरोध पर रॉड-डंडों से पिटाई, चोट के निशान, यहां तक कि मौत के आरोप।
- नाबालिग बच्चे भी शिकार।

पुलिस (SP ग्रामीण अक्षय संजय महाडीक के नेतृत्व में) ने शिवा त्यागी और प्रदीप बालियान को गिरफ्तार किया, तीसरा फरार। बाल श्रम निषेध और बंधुआ मजदूरी कानून के तहत मुकदमा दर्ज।
और उदाहरण: समस्या व्यापक है
- ये अकेले मामले नहीं। भारत में बंधुआ मजदूरी अभी भी जिंदा है, खासकर ईंट-भट्टों, खेतों, निर्माण और छोटी फैक्टरियों में। SC/ST और गरीब समुदाय सबसे ज्यादा शिकार होते हैं।
- गल्फ देश: हजारों भारतीय मजदूर पासपोर्ट जब्ती, वेतन रोकने, 50°C गर्मी में काम और कूड़े जैसे आवास का शिकार। कफाला सिस्टम उन्हें गुलाम बनाए रखता है।
- ईंट-भट्टे और अन्य: UP, बिहार, तमिलनाडु, महाराष्ट्र में नियमित रेस्क्यू होते रहते हैं। 2024-25 में आधिकारिक आंकड़ों में सैकड़ों ही रिहा हुए, जबकि वास्तविक संख्या बहुत ज्यादा है।
- बच्चे और परिवार: नाबालिगों को परिवार समेत फंसाया जाता है। ऋण के जाल में फंसाकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी शोषण।

नोएडा-ग्रेटर नोएडा के हालिया और पुराने मामले
जनवरी 2026, ग्रेटर नोएडा: एक 10 वर्षीय बालिका (पश्चिम बंगाल से लाई गई) को CRPF कांस्टेबल तारिक अनवर और उसकी पत्नी रिम्पा खातून ने बेहद क्रूरता से पीटा और भूखा रखा। बच्ची के रिब्स फ्रैक्चर, सिर और छाती पर गहरी चोटें, हीमोग्लोबिन मात्र 1.9 और गंभीर कुपोषण। अस्पताल में वेंटिलेटर पर है। पड़ोसियों/डॉक्टर्स की सूचना पर पुलिस ने दंपति को गिरफ्तार किया। बच्ची को 40 दिन पहले “देखभाल” के नाम पर लाया गया था।
नवंबर 2024, नोएडा सेक्टर 137: 8 वर्षीय बालिका (झारखंड से) को दिल्ली मेट्रो ड्राइवर शाहजहां और उसकी पत्नी रुखसाना ने घरेलू कामों के लिए रखा। एक साल तक मारपीट, जबरन काम। बच्ची भागकर सोसाइटी बेसमेंट में छिपी, पड़ोसियों ने देखा और पुलिस/महिला सुरक्षा टीम ने रेस्क्यू किया। शाहजहां गिरफ्तार, बाल श्रम कानून और मारपीट की धाराओं में केस।
दिसंबर 2022, नोएडा सेक्टर 121: वकील शेफाली कौल ने 20 वर्षीय नौकरानी को दो महीने तक बंधक बनाकर रखा, पीटा और गाली दी। क्लियो काउंटी सोसाइटी के फ्लैट में छापेमारी कर पुलिस ने बचाया। illegal confinement और hurt की धाराओं में केस दर्ज।
दिल्ली-गुरुग्राम के कुछ मामले
फरवरी 2023, गुरुग्राम: 14 वर्षीय नाबालिग नौकरानी को 5 महीने तक मारपीट, चाकू/गर्म चिमटे से जलाना, भूखा रखना और यौनिक प्रताड़ना। मालिक दंपति मनीष खट्टर (बीमा कंपनी मैनेजर) और कमलजीत कौर गिरफ्तार। NGO और पत्रकार की सूचना पर रेस्क्यू। POCSO समेत गंभीर धाराएं।
2012, दिल्ली: डॉक्टर दंपति संजय वर्मा और सुमिता ने 13 वर्षीय नौकरानी को फ्लैट में बंद कर थाईलैंड घूमने चले गए। पड़ोसियों ने चीखें सुनकर NGO (शक्ति वाहिनी) और पुलिस को सूचित किया। बच्ची भूखे-प्यासे कई दिन रही।
पुराने मामले: 2013 में दक्षिण दिल्ली में 15 वर्षीय नौकरानी को कुत्तों से कटवाना, चाकू मारना आदि। MP की पत्नी द्वारा नौकरानी की हत्या के आरोप भी लगे।
लखनऊ और अन्य
लखनऊ में भी पुलिसकर्मियों द्वारा अपनी घरेलू नौकरानी को प्रताड़ित करने के मामले सामने आए हैं (जैसे 2024 में दारुलशफा थाने के पुलिसकर्मियों पर FIR)। हालांकि, दिल्ली-एनसीआर की तुलना में यहां रिपोर्टेड मामले कम हैं, लेकिन शोषण की समस्या हर जगह मौजूद है।
कानून (बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम 1976) हैं, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर। सतर्कता समितियां निष्क्रिय, दोषियों को सजा दुर्लभ।
क्यों जारी है ये शोषण?
यह विकृत मानसिकता पूंजीवाद की देन है जो “लाभ” को सब कुछ मानती है। बेरोजगारी, गरीबी और शिक्षा की कमी मजदूरों को आसान शिकार बनाती है। अमीर वर्ग में “सस्ता श्रम” की लालच और मानवीय संवेदना का अभाव दोनों जगह दिखता है – देश में हो या विदेश में। वैश्वीकरण ने अवसर दिए, लेकिन नैतिकता को नहीं।
समाधान की दिशा:
- सख्त कानून अमल और तेज ट्रायल।
- प्रवासी मजदूरों के लिए बेहतर सुरक्षा, कौशल विकास।
- सामाजिक जागरूकता और नैतिक पूंजीवाद की जरूरत।
- पुलिस-प्रशासन की त्वरित कार्रवाई को पुरस्कृत करने जैसे सकारात्मक कदमों का विस्तार।
ये घटनाएं साबित करती हैं कि शोषण सिर्फ फैक्टरियों या विदेश में नहीं, बल्कि हमारे पड़ोस के “पॉश” घरों में भी फल-फूल रहा है। मजदूर इंसान है, गुलाम नहीं। सख्त कानून, रजिस्टर्ड प्लेसमेंट एजेंसियां, जागरूकता और नैतिकता की जरूरत है।
अगर आपके आसपास कोई ऐसी घटना हो तो तुरंत चाइल्डलाइन 1098, पुलिस या NGO से संपर्क करें। “विकसित भारत” तभी बनेगा जब सबसे कमजोर की भी इज्जत और सुरक्षा हो।
मजदूर इंसान है, मशीन नहीं। जब तक हम इस विकृत मानसिकता को चुनौती नहीं देंगे, “विकसित भारत” सिर्फ नारा रहेगा। मुजफ्फरनगर और हिंदुजा जैसे मामलों से सबक लें – शोषण पर अंकुश लगाएं, अन्यथा ये नरक फैलता रहेगा। समाज और राज्य, दोनों को जागना होगा।







