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    Home»बात पते की

    विपरीत दिशा में भी परिवार को एक रखने की कोशिश करें

    By June 6, 2018Updated:June 6, 2018 बात पते की No Comments7 Mins Read
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    एक बार एक पत्नी, पति से कहती है- ‘मां ने तो जीना मुहाल कर रखा है। जब देखो चश्मा बनवाने की जिद करती रहती है। अभी मुझे अपनी मां से मिलने चंडीगढ़ जाना है। वहां भइया-भाभी ने मुसीबत कर रखी है। अब मैं यहां देखूं या अपनी मां के पास जाऊं। चश्मे में ही हजार खर्च हो गये तो मेरा किराया कैसे निकलेगा?’ बेटा गुस्से से मां से कहता है- ‘क्या मां, तुम्हें चश्मे की पड़ी है। आखिर तुम करती क्या हो ? जो तुम्हें चश्मे की जरूरत है. कितने खर्च हैं। पहले वो देखूं या चश्मा बनवाऊ !’ मां ने कहां- ‘तेरी सूरत में मुझे मोहन दिखते हैं। कबसे तेरा चेहरा नहीं देख पायी। यही तो जिंदा रखता है मुझे. चश्मा ठीक हो जायेगा तो बहू की भी दाल-चावल बीनने में मदद कर दूंगी। वह अकेली काम करती है.’ यह सुन कर बेटे की आंखें नम थीं. वह रुंधे गले से बोला- ‘मुझे माफ कर दो मां! आखिरी बार, प्लीज !’ मगर बच्चों की गलतियां कभी आखिरी नहीं होतीं।

    मानव जीवन को फलने-फूलने के लिए परिवार रूपी बगिया की हमेशा जरूरत रही है। जैसे कोई भी बगिया विभिन्न फूलों के बिना बगिया नहीं कहलाती, वैसे ही बिना परिवार मानव जीवन के फलने-फूलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कुछ वर्षों पहले हमारे दादी-बाबा, चाचा-बुआ साथ रहते थे। शादी के बाद गरमी की छुट्टियों में छोटी-बड़ी बुआ आती थीं। हम भी ननिहाल जाते थे। वहां मौसी-मामा से मिलते थे।

    नयी राह है सबकी जरूरत

    आज इस मुद्दे के मायने नहीं कि एकल परिवार बेहतर है कि संयुक्त परिवार, न ही इस पर बहस की गुंजाइश है. कुछ दशकों पहले जब बच्चे घर से दूर जाने लगे तो इस ओर सबकी नजर गयी। समाजशास्त्रियों ने परिवार विघटन को बड़ी घटना माना और यह थी भी। कुछ विवशतावश और कुछ उज्जवल भविष्य की खातिर। आज हालात यह है कि माता-पिता को आशंका नहीं, बल्कि विश्वास है कि विवाह के बाद बेटा अलग रहेगा। अगर हम उन स्थितियों-परिस्थितियों पर नजर डालें तो हम सब विकास के बढ़ते चक्र में घूम रहे थे। जब भी कोई भीड़ से निकलकर विपरीत दिशा चुनता है तो सबकी निगाहें उसपे जम जाती हैं।

    जैसे-जैसे विपरीत दिशा का कारवां बढ़ेगा, विश्लेषक उसके अच्छे-बुरे परिणाम गिनायेंगे और यह बहस का मुद्दा बन जाता है. मगर जब सभी दिशा बदल लेंगे तो पहलीवाली भीड़ ही विपरीत राह की राही कहलायेगी, क्योंकि नयी राह सबकी जरूरत है। हम इस बात से इत्तेफाक रखें या न रखें, चलना तो इसी रास्ते पर है।

    संबंधों को बचाएं

    परिवार बच्चों की पहली पाठशाला और मां पहली गुरु है, यह सत्य है और हमेशा रहेगा। इसलिए आज की जरूरतों के मुताबिक अगर बच्चों को दूर रहना पड़ रहा है तो पोते-पोतियों को दादी-बाबा से मिलवाने का प्रयास होना चाहिए। पहले गर्मियों की छुट्टियां होते ही बच्चे परिवारवालों से मिलने को उत्सुक रहते थे। आजकल पेरेंट्स हॉबी क्लासेस ढूंढ़ते हैं।
    बेहतरी के लिए कोचिंग क्लासेस करवाते हैं। दूसरे राज्य-देश जाने की प्लानिंग करते हैं। यह भी खराब नहीं। बच्चे दूसरे शहर घूमें, उनको जाने, अच्छा है, लेकिन कृपया कुछ दिनों के लिए ही सही बच्चों को अपने परिवार से मिलाने जरूर ले जाइए। गांव भी घुमाइए। सबसे रोचक बात यह सामने आयी है कि लोग बेटी के सिर पर यह सेहरा बांधते हैं कि अंतत : बेटियां ही पेरेंट्स के काम आती हैं। वही बुढ़ापे का सहारा हैं। माता-पिता भी तारीफों के पुल बांधते नहीं आघाते कि वक्त-बेवक्त उनके बेटी-दामाद ही उनके काम आये। बेटे-बहू ने हाल तक नहीं पूछा। लोग मानते हैं विवाह के बाद बहू दूसरी और बेटा तीसरा हो जाता है।

    क्या बेटी-दामाद की तारीफ करने वाले पेरेंट्स अपनी बेटी से यह कहते हैं कि जितना तुम हमारा ध्यान रखती हो, उतना या उससे ज्यादा अपनी ससुरालवालों का भी रखो। क्या आपकी बेटी-दामाद किसी के बेटा-बहू नहीं हैं ? क्यों सबको बेटी-दामाद अच्छे लगते हैं ? क्यों बहू-बेटा से ही पेरेंट्स को शिकायत होती है ? इसकी स्प्ष्ट वजह है बेटी का बहू बनने के बाद भी सास-ससुर को माता-पिता के रूप में न देखना। बेटा भी पत्नी की खुशी और ससुराल में दामाद से बेटे का तमगा पाने के लिए ससुरालवालों का खास ध्यान रखता है।

    बहू बनी बेटी मायके की जरा-सी परेशानी में विह्वल हो जाती है। इसमें कुछ गलत नहीं, बल्कि स्वाभाविक है मगर जरूर गलत है कि जब ससुराल में आपकी जरूरत हो उस समय आप आंख चुराएं, तब खटास तो आयेगी ही। हमेशा मायके का गुणगान, ससुराल की कमी निकालना और हर घड़ी ससुराल की मायके से तुलना करना परिवार में खटास लाती हैं। खटास आने से दूध तो फटेगा ही, दूध एक बार फट गया तो दूध नहीं बनेगा. दूध वह आहार है जो जन्म लेते ही बच्चे की जरूरत होता है और बुढ़ापे तक उसकी उपयोगिता कम नहीं होती। संबंधों के इस दूध को फटने से बचाइए।

    रिश्तों में दोहरा मानदंड क्यों

    जीवन के विभिन्न चरणों में खुद को उसके अनुरूप ढालिए. जब आपका बेटा अपने पिता को बेहतर बेटा नहीं, दामाद बनते देखेगा तो क्या वह आपका फरमाबरदार बन पायेगा? अगर बेटा ससुराल की आवभगत में अपने परिवार को भूल जाये तो जब कल आपको अपने बेटे की जरूरत होगी तो वह भी आपको भूलकर अपनी ससुराल के बाहर खड़ा मिलेगा. बहुत से घर ऐसे हैं जहां बूढ़े मां-पिता की याद तब आती है जब घर कोई नन्हा मेहमान आनेवाला होता है। वह माता-पिता को बच्चे की देखभाल के लिए बुलाते हैं। उसमें भी वे खुश रहते हैं।

    मगर जब बूढ़े पेरेंट्स को आपकी जरूरत होती है तो यह कहकर वापस भेज देते हैं कि कौन ध्यान रखेगा, जब हम दोनों जॉब में हैं. हमें याद रखना चाहिए कि उन्होंने हमें जन्म ही नहीं दिया बल्कि खुद कम निवाले खाकर, अभावों में रहकर हमारी जरूरतें पूरी कीं। बड़े बच्चे माता-पिता की चप्पल से लेकर कपड़ों तक पर कब्जा जमा लेते हैं। घर में अपनी पसंद का खाना खानेवाले बच्चे नहीं जानते कि मां को क्या पसंद है और पेरेंट्स उनकी रग-रग से वाकिफ होते हैं क्योंकि वे बच्चों को पालते-पोसते हैं।

    नन्हा शिशु भूख से रो रहा है या अन्य पीड़ा से, मां बखूबी समझती है. वह बारिश में भीगते बच्चे की आंखों से छलकते आंसू देख लेती है। उसी मां को जॉब के नाम पर दूर रखना क्या सही है? एक बेटी मां के आंसू तुरंत देख लेती है, मगर वही सास के आंसू-तकलीफ क्यों नहीं देख पाती? दामाद को सास की पीड़ा का एहसास होता है जिसने उसे जन्म नहीं दिया, मगर उस मां की पीड़ा क्यों नहीं दिखाई देती जिसने उसे जन्मा, मां भी बड़े गर्व से कहती है कि उसका दामाद बेटी का बहुत ध्यान रखता है। वहीं बेटा, बहू का ध्यान रखे तो मां कहती है मेरी बहू ने तो बेटे को कब्जे में कर लिया। यह दोहरा मानदंड क्यों? अगर बहुएं बेटी बन कर सुसराल में रहें, साथ ही जरूरी यह भी है कि सभी सास अपनी बहुओं को वही प्यार दें, जो वो बेटी को देती हैं तो मुझे पक्का यकीन है कि फिर ये नहीं कहा जायेगा कि माता-पिता का ख्याल केवल बेटी-दामाद रखते हैं।

    ताकि बने रहें रिश्ते

    यह सच है कि जहां बेटियां पली-बढ़ीं, उनकी तकलीफ से बहुत कष्ट होता है, मगर जहां उनको नया परिवार बसाना है, वहां के रिश्तों को भी उन्हें प्यार से सींचना है। जैसे फूल के पौधे लगाने के लिए हम पहले जमीन तैयार करते हैं. उसकी सिंचाई, गुड़ाई और खाद डालते हैं। पौधे सूखें नहीं, इसलिए रोज सींचते हैं, तभी खूबसूरत, स्वस्थ, प्यारे फूल खिलते हैं।
    इसी तरह परिवार को भी प्यार, सहयोग व अपनेपन से सींचना होगा, ताकि वह घना वृक्ष बने और मुसीबत के समय साया बन कर हमारे साथ खड़ा रहे। अगर हमारे बच्चे हमें फर्क करते देखेंगे तो कल वे भी वही सुलूक करेंगे जो आज हम कर रहे हैं. परिवार हमारे समाज की सबसे छोटी मगर सबसे मजबूत इकाई है। जब परिवार समृद्ध होगा तभी समाज भी आगे बढ़ेगा और जब समाज समृद्ध होगा, तो देश तो उन्नति करेगा ही।

    -बीड़ी फुलारा

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