- सीधी भर्ती के पदों पर आरक्षण में कटौती कर दलित वर्ग का मारा जा रहा है हक
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा पदोन्नति में आरक्षण हेतु जारी आदेश को लागू कराने के लिये संघर्ष समिति के पत्र को मुख्यमंत्री कार्यालय ने कार्मिक विभाग को भेजकर डाला ठण्डे बस्ते आरक्षण समर्थकों में भारी आक्रोश
लखनऊ, 11 नवंबर 2018: आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति,उप्र की प्रान्तीय कार्यसमिति की आज एक बैठक हुई, जिसमें पदोन्नति में आरक्षण संवैधानिक संशोधन 117वां लम्बित बिल को पास कराकर संविधान की 9वीं सूची डालने व सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश को लागू कराकर यूपी में रिवर्ट 2 लाख दलित कार्मिकों को उनके पदों पर पुर्नस्थापित कराने पर चर्चा हुई।
संघर्ष समिति के नेताओं ने केन्द्र की मोदी सरकार व उप्र की योगी सरकार पर करारा हमला बोलते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने हेतु जारी निर्देश के बाद भी केन्द्र व उप्र की सरकार तमाशा देख रही है और उल्टे सभी विभागों में नयी नियुक्तियां की जा रही हैं, जिसमें इन्डेक्सन पोस्ट को भरा मानकर आरक्षित पदों की गणना कम की जा रही है।

उन्होंने कहा कि विगत दिनों पावर कार्पोरेशन में सैकड़ों सहायक अभियन्ताओं की सीधी भर्ती में यही पैमाना मानकर आरक्षित पद कम कर आरक्षण पर कुठाराघात किया गया है, जो पूरी तरह गलत है। पहले सपा सरकार में दलित कार्मिकों को रिवर्ट कर उत्पीड़न किया गया और अब वर्तमान भाजपा सरकार में सीधी भर्ती के पदों पर आरक्षण में कटौती कर दलित वर्ग का हक मारा जा रहा है। संघर्ष समिति ने कहा कि पूरे प्रदेश में एक बड़े आन्दोलन के लिये 8 लाख आरक्षण समर्थक कार्मिकों को तैयार रहने के लिये कहा गया है और जन जागरण अभियान जारी है। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही आरक्षण समर्थक अपनी ताकत और आर-पार की लड़ाई का ऐलान करेंगे।
आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति,उप्र के संयोजकों सर्वश्री अवधेश कुमार वर्मा, डा. राम शब्द जैसवारा, श्याम लाल, अन्जनी कुमार, लेखराम, बनी सिंह, जितेन्द्र कुमार व सुनील कनौजिया ने एक सयुंक्त बयान में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश के बाद संघर्ष समिति द्वारा मुख्यमंत्री उप्र को पत्र लिखकर उप्र में आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा-3(7) को 15-11-1997 से बहाल करने व रिवर्ट किये गये लगभग 2 लाख दलित कार्मिकों को उनके पदों पर पुनस्र्थापित कराने को लेकर एक पत्र भेजा गया था।
उन्होंने कहा कि बड़े दुर्भाग्य के साथ कहना पड़ रहा है कि मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा संघर्ष समिति के पत्र को कार्मिक विभाग, उप्र शासन को भेजकर पूरे मामले को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। कार्मिक विभाग द्वारा पोर्टल पर कार्यवाही कार्यालय स्तर पर लम्बित दिखायी जा रही है। सरकार शायद यह भूल गयी कि जब प्रदेश में दलित कार्मिकों को रिवर्ट करना था तो मात्र 15 दिनों में कार्यवाही पूर्ण कर ली गयी थी, यह कैसा न्याय है कि जब दलित कार्मिकों को न्याय देने की बात आती है तो बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बगलें झांकने लगते हैं।
संघर्ष समिति के नेताओं ने कहा कि सपा सरकार के पद चिन्हों पर चलकर आज भी भाजपा सरकार शिक्षा विभाग में दलित शिक्षकों को रिवर्ट कर लगातार उनका वेतन फ्रीज करने पर आमादा है।







