डॉ दिलीप अग्निहोत्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम महिलाओं की तीन तलाक की कुप्रथा से मुक्ति दिलाने का वादा किया था। अध्यादेश के माध्यम से उन्होंने इसे पहले ही पूरा कर दिया था। यह अच्छा रहा कि नरेंद्र मोदी की दुबारा सत्ता में वापसी हुई। यदि उनके अलावा किसी अन्य पार्टी की सरकार बनती तो इस अध्यादेश को कानून बनाने का मसला ठंडे बस्ते में चला जाता। वोटबैंक की सियासत करने वाली पार्टियों में इतना साहस भी नहीं था। इसे शाहबानो प्रकरण में प्रत्यक्ष रूप से देखा भी गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी नर भारी बहुमत के बल पर तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया था।सुप्रीम कोर्ट का फैसला शाहबानो के पक्ष में था। जिसे उसके शौहर ने तीन तलाक देकर सड़क पर धकेल दिया था। ये बात अलग है कि राजीव गांधी को न्यायिक निर्णय बदलने का फायदा नहीं मिला था। वह सत्ता में वापस नहीं हो सके थे। आज उनके उत्तराधिकारियों ने इस बात से प्रेरणा नहीं ली। उन्होंने तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाओं के विचार को समझने का प्रयास ही नही किया। वह सियासत के परम्परागत नजरिये पर ही उलझे रहे। इसीलिए उन्होंने लोकसभा में सरकार के विधेयक का विरोध किया, राज्यसभा में विधेयक को गिराने के लिए अपने सदस्यों को व्हिप जारी किया।

लेकिन राज्यसभा में सरकार का बहुमत न होने के बाद भी विधेयक पारित हो गया। कांग्रेस सहित कुछ अन्य पार्टियों ने विरोध करते समय इस्लामिक देशों में हुए बदलाव पर भी विचार नहीं किया। मिस्र,सीरिया,इराक, पाकिस्तान,बांग्लादेश,ट्यूनीशि या,मलेशिया,इंडोनेशिया, साइप्रस, जॉर्डन, अल्जीरिया, इरान, ब्रुनेई, मोरक्को, कतर, अरब अमीरात में तीन तलाक को पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था। ऐसे में भारत के कुछ विपक्षी पार्टियों के विरोध को उनकी अदूरदर्शिता ही कहा जा सकता है। इनके लिए मुसलमान केवल वोटबैंक मात्र है।
राज्यसभा में इस विधेयक के पक्ष में निन्यानवे और विरोध में चौरासी वोट पड़े। इस प्रकार पन्द्रह वोटों से तीन तलाक विधेयक राज्यसभा से पीड़ित हो गया। इस विधेयक के विरोधी इसे लटकाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भिजवाने का प्रयास किया। सेलेक्ट कमेटी के पास भेजे जाना वाला प्रस्ताव सौ के मुकाबले चौरासी वोट से से गिर गया।
जदयू ,अन्नाद्रमुक ने सदन से बहिर्गमन किया। विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रानिक रूप से या किसी अन्य विधि से तीन तलाक देता है, तो उसकी ऐसी कोई भी उदघोषणा शून्य और अवैध होगी। इसके अलावा तीन तलाक से पीड़ित महिला अपने पति से स्वयं और अपनी आश्रित संतानों के लिए निर्वाह भत्ता प्राप्त पाने की हकदार होगी। इस रकम को मजिस्ट्रेट निर्धारित करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर सरकार से अपने विचार प्रस्तुत करने को कहा था। इसके बाद सरकार ने अनेक मुस्लिम विद्वानों की सलाह ली। उन इस्लामिक मुल्कों से भी जानकारी प्राप्त की, जहाँ बहुत पहले ही तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि वह एक बार में तीन तलाक को उचित नहीं मानती। जाहिर है कि न्यायपालिका और मुस्लिम महिलाओं के सकारात्मक रुख ने सरकार का उत्साह बढ़ाया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस संबन्ध में विधेयक बनाने को कहा, जिससे संसद इस विषय पर कानून बना सके। सरकार इस सम्बन्ध में अध्यादेश लाई थी। तीन तलाक के इस पूरे प्रकरण में सरकार की दृढ़ता और संवेदनशीलता उभरकर सामने आई है। कुछ वर्ष पहले तक यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक पर न्याय मिलेगा।
वोट बैंक से प्रेरित कथित सेक्युलर सियासत ऐसा होने नहीं देती। इसके लिए शाहबानों प्रकरण तक पीछे लौटकर देखने की जरूरत भी नहीं है। तीन तलाक के मसले पर कांग्रेस, कम्युनिस्ट, राजद, सपा, तृणमूल, बसपा आदि सभी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। विपक्षी पार्टियों का आरोप था कि भाजपा मजहबी मामले में दखल दे रही है।
सामाजिक या मजहबी मान्यताएं संवेदनशील होती हैं। फिर भी व्यापक और सकारात्मक विचार विमर्श से किसी समस्या का समाधान आसान हो जाता है। सरकार के ऐसे ही रुख से मुस्लिम महिलाओं को सौगात मिलने जा रही है। यह अच्छा है, आज मुस्लिम महिलाएं ही ओवैसी जैसे नेताओं को करारा जवाब दे रहीं हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के साहसिक फैसले से तीन तलाक के मसले का समाधान हो रहा है। ऐसे ही सती प्रथा और बाल विवाह की सामाजिक कुप्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था। समय के साथ समाज के सभी वर्गों ने इसे सहज रूप में स्वीकार किया।
अनेक इस्लामी मुल्कों ने एक साथ तीन तलाक की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। यहां तक कि भारत से अलग हुए पाकिस्तान जैसे कट्टर मुल्क में भी एक साथ तीन तलाक पर प्रतिबंध है। बांग्लादेश ने भी ऐसा ही कानून लागू किया है। समय के साथ उन मुल्कों में इस समस्या का समाधान हो गया। आज यदि अपने को सेकुलर घोषित करने वालों की सरकार होती तो यह सुधार असंभव था, क्योंकि फिर उन्हीं लोंगों की चलती जो शाहबानों प्रकरण में न्यायिक निर्णय से असहमत थे। वैसा ही नजारा इस बार भी दिखाई देता।
इस बार भी पहल न्यायपालिका की ओर से हुई थी। कई मुस्लिम महिलाओं ने एक बार मे तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने की याचिका दायर की थी। प्रारंभिक चरण में दो पक्ष थे। एक सुप्रीम कोर्ट, जो याचिका पर विचार हेतु तैयार हुआ। दूसरे पक्ष के रूप में मुस्लिम महिलाएं थीं, जिन्होंने मजहबी ग्रन्थों के आधार पर यह तर्क रखा था कि एक बार में तीन तलाक अनुचित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तो फोन ,चिट्ठी, सोशल मीडिया आदि पर भी एक बार में तीन तलाक होने लगे थे। इन तर्कों का कई मुस्लिम विद्वानों ने भी समर्थन किया।
यह भी अच्छा संयोग था कि इस समय केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अपने विचार प्रस्तुत करने को कहा। सरकार ने अनेक मुस्लिम विद्वानों की सलाह ली। उन इस्लामिक मुल्कों से भी जानकारी प्राप्त की, जहाँ बहुत पहले ही तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि वह एक बार में तीन तलाक को उचित नहीं मानती। जाहिर है कि न्यायपालिका और मुस्लिम महिलाओं के सकारात्मक रुख ने सरकार का उत्साह बढ़ाया।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस संबन्ध में विधेयक बनाने को कहा, जिससे संसद इस विषय पर कानून बना सके। तीन तलाक के इस पूरे प्रकरण में सरकार की साहसिक सोच सामने आई है,अब एक बार में तीन तलाक को दण्डनीय अपराध माना जायेगा। इसके लिए तीन वर्ष कैद और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। मौखिक, पत्र, फोन, ह्वाट्स एप, मेल या किसी अन्य माध्यम से एक बार में तीन तलाक गैरकानूनी और अमान्य होगा। जाहिर है नरेंद्र मोदी की साहसिक सोच से इस समस्या का समाधान संभव हुआ।







