- छात्र बना किसानों के लिए नजीर
- राज्य सरकार से ली सहायता, गोंडा के वजीरगंज में बनवाया पाली हाउस और खिल उठे फूल
उपेन्द्र नाथ राय
एमेटी से बीटेक व आईएसबीएम पूणे से एमबीए करने के बाद लखनऊ शहर में रहने वाले एक युवा ने गांव में वैज्ञानिक खेती की ठान ली। अपने गांव गोंडा जिले के वजीरगंज में 43.62 लाख रुपये खर्च कर 3000 वर्ग मीटर (लगभग-साढ़े चौबिस विस्वा) में हालैंड से जरवेरा फुल के पौधे मंगाकर खेती शुरू कर दी। इतनी बड़ी रकम खेती में नहीं, खेती से पूर्व पाली हाउस व पौधे में मंगाने में लगी। जब युवा ने खेती शुरू की तो गांव के आस-पास के लोग तो खेती का बजट सुनकर ही दंग थे लेकिन नवम्बर माह से निकल रहे फूल और उसकी बिक्री को देख लोगों कुतूहल से देख रहे हैं।
उद्यान विभाग द्वारा पचास प्रतिशत अनुदान दिये जाने वाली इस खेती के लिए अभिनव कुमार सिंह को प्रेरित किया उप निदेशक अनिस श्रीवास्तव ने। खेती करने वाले युवा कृषक अभिनव सिंह ने बताया कि शासन के प्रोजेक्ट के बारे में उन्होंने जानकारी दी और इसके फायदा बताया। इसके बाद हमने फरवरी 2019 से इस पर काम करना शुरू किया। पहले पॉली हाउस (प्लास्टिक का हरित गृह) बनवाना शुरू किया। इसके बाद अगस्त माह में जरवेरा का पौधा मंगवाने के लिए बंगलौर की एक कंपनी से संपर्क किया और हालैंड से 18000 पौधे मंगवाए। पौधों पर छह लाख पचास हजार रुपये खर्च हुए। यह खर्च भी 43.62 लाख में ही शामिल है।
पांच साल तक पुष्प का दावा, 10 पुष्प का बनता है एक पंच:
अभिनव सिंह ने बताया कि जरवेरा का पौधा मुहैया कराने वाली कंपनी का दावा एक बार पौध रोपण के बाद पांच साल तक पुष्प देने का है। यदि यह पांच साल नहीं दिया तो तीन साल तो पुष्प सही ढंग से देगा ही। अगस्त में पौधरोपण के बाद जरवेरा का पुष्प नवम्बर माह से निकलने लगा। अभिनव ने बताया कि पुष्प निकलने के बाद उसका पंच बनाया जाता है। दस पुष्प का एक पंच बनता है। इसके बाद बाजार में भेजा जाता है। अब तक पांच हजार से अधिक पंच की बिक्री की जा चुकी है। एक पंच औसतन पैतीस से चालीस रुपये तक बिकता है।

सालभर निकलता है पुष्प, चार कर्मियों को प्रत्यक्ष रोजगार:
अभिनव सिंह ने बताया कि यह साल भर पुष्प देने वाला पौधा है। जो साल भर पैदावार देगा, उसको सालभर सही से खाद्य भी चाहिए। इस कारण इसकी निराई-गुराई के लिए दो कर्मचारी स्थाई रूप से लगाये गये हैं। इसके अतिरिक्त पंच बनाने आदि के काम होने पर चार से पांच मजदूर लगते हैं। 3000 वर्ग मीटर में ही औसतन चार लोगों की जरूरत प्रतिदिन रहती है अर्थात चार लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मुहैया कराता है।
एमबीए के बाद डेढ़ वर्ष नौकरी भी की, फिर खेती को चूना:
2010 में एमबीए करने वाले अभिनव सिंह ने बताया कि एमबीए करने के बाद डेढ वर्ष नौकरी भी की। नौकरी के दौरान ही मन में आया कि हमें खुद दूसरों को नौकरी देने की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके बाद हमने कठिन राह चुनने और ग्रामीण क्षेत्र को अपना कैरियर चुनने के लिए सोचा। इसके लिए हमने खुद के गांव जाकर वैज्ञानिक पद्धति से खेती कराने का मन बनाया। इस बीच हमें उप निदेशक अनिस श्रीवास्तव मिले, जिन्होंने राज्य सरकार के राज्य औद्योगिक मिशन योजना के अंतर्गत संरक्षित खेती कार्यक्रम के बारे में बताया। इसके साथ ही जानकारी दी कि इसमें पचास प्रतिशत अनुदान मिलता है।
15 वर्ष चलता है पाली हाउस, सात साल में बदलती है सीट:
इस योजना पर काम शुरू किया और परिणाम सबके सामने है। उन्होंने कहा कि पाली हाउस की लाइफ 15 साल होती है। इसमें सात साल पर सीट बदलनी होती है। हमने जो सीट लगवाई है, वह साढ़े सात लाख खर्च आया है अर्थात सात साल पर साढ़े सात लाख का खर्च आएगा।
आर्टिफिशियल फूल से जरवेरा फूल के घटे भाव:
अभिनव सिंह ने बताया कि जरवेरा के फूल की प्रतिद्वंदी आर्टिफिशियल फूल हैं। इनके बाजार में आने के बाद जरवेरा के फुल की किमत गिर गयी है। आज की स्थिति यह है कि जो जरवेरा का पंच पहले डेढ़ सौ से दो सौ में मिलता था, वह आज चालीस से पचास रुपये में मिलता है।







