लैंडपूलिंग के नाम पर अरबों का खेल, किसान पीछे और अधिकारी-निवेशक आगे
लखनऊ। अभी हाल ही में एक फिल्म आई थी जिसका नाम जॉली LLB -2 , इस फिल्म की पृष्ठभूमि ही बिल्डर और किसानों के बीच घूमती है इसमें विकास के नाम पर किसानों से उनकी कृषि योग्य भूमि बिल्डर छल- कपट से हड़प लेता है और खुद बहुत अमीर बन जाता है और किसानों को सिर्फ धोखा हाथ लगता है कुछ इसी तर्ज पर यह उदहारण एक बार फिर सच के रूप में लखनऊ में देखने को मिला।
सुल्तानपुर रोड पर प्रस्तावित वेलनेस सिटी और आईटी सिटी की दो बड़ी टाउनशिपों में लैंडपूलिंग स्कीम किसानों को रातोंरात अमीर बनाने का वादा लेकर आई थी, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। डेढ़ साल पहले घोषित इस योजना का सबसे बड़ा फायदा LDA के कुछ बड़े अधिकारियों और बाहरी निवेशकों को पहुंच गया।
योजना क्या थी?
लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने किसानों से समझौते पर जमीन ली और बदले में उनकी कुल जमीन का 25% विकसित प्लॉट देने का वादा किया। जहां ₹1 लाख प्रति बीघा की दर से जमीन बिक रही थी, वहां लैंडपूलिंग के बाद 25% विकसित प्लॉट की कीमत 1 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है -यानी लगभग 100 गुना फायदा। सरकार का दावा था कि यह किसानों के हित में है।
देरी का फायदा किसे?
मजे की बात: योजना घोषित होने के डेढ़ साल बाद भी जमीन की खरीद-फरोख्त पर कोई रोक नहीं लगाई गई। नतीजा – किसानों की जगह बड़े बिल्डरों और निवेशकों ने सस्ते दामों पर जमीन खरीद ली। बाद में इन्हीं लोगों ने LDA के साथ लैंडपूलिंग कर लिया और मोटा मुनाफा कमा लिया। अब जब फायदा हो चुका, तब LDA ने बिक्री पर रोक लगा दी।
LDA अधिकारी भी बन गए करोड़पति?
अंदर की खबर और भी चौंकाने वाली है। सूत्रों के मुताबिक LDA के कई आला अधिकारियों ने भी इस इलाके में बड़े-बड़े जमीन के टुकड़े खरीद लिए। कुछ ने रिश्तेदारों के नाम, किसी ने ड्राइवर के नाम, किसी ने नौकर के नाम और कई ने बेनामी तरीके से जमीन खरीदी। एक वरिष्ठ अधिकारी के नाम पर कई बीघा जमीन बेनामी खरीदे जाने का आरोप है, जो भविष्य में नामांतरण के बाद उनके पास आ जाएगी।
जनकल्याण महासमिति का आरोप
लखनऊ जनकल्याण महासमिति के अध्यक्ष उमाशंकर दुबे ने कहा, “LDA ने बिक्री पर रोक लगाने में करीब एक साल की देरी की। सैकड़ों निवेशक आए, नई रजिस्ट्री हुई और उन्होंने लैंडपूलिंग का फायदा उठा लिया। मूल किसान पीछे रह गए। यह बड़ी गड़बड़ है।”
LDA का बचाव
LDA का कहना है कि लैंडपूलिंग नीति शहर के विकास के लिए है। किसानों को 25% विकसित प्लॉट या 50% अविकसित जमीन मिल रही है, जो सामान्य मुआवजे से कई गुना फायदेमंद है। अब तक सैकड़ों बीघा जमीन पर अनुबंध हो चुके हैं।
सवाल उठते हैं
- जब किसानों को फायदा पहुंचाना था तो बिक्री पर रोक डेढ़ साल तक क्यों नहीं लगाई?
- आखिरकार रोक क्यों लगाई गई जब खेल हो चुका था?
इस मामले में विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हुई तो एक बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। नैमिष नगर में LDA ने इसी सबक से सीखते हुए लैंडपूलिंग से दूरी बना ली है। फिलहाल अब यह सब किसानों का हित है या अधिकारियों-निवेशकों का मुनाफा? लैंडपूलिंग की सच्चाई जल्द सामने आने वाली है।







