तो क्या लखनऊ मे प्रेस क्लब नही है !
नवेद शिकोह
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पत्रकारों का दुर्भाग्य है कि उनका कोई प्रेस क्लब नहीं है। शायद देश-दुनिया में लखनऊ ही एक ऐसी राजधानी है जहां के राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त/जिला मान्यता प्राप्त/ ग़ैर मान्यता प्राप्त पत्रकार एक अदद प्रेस क्लब से महरूम हैं। जबकि सरकारें यहां के पत्रकारों के हर सुख-दुख में सहयोग करने का दायित्व निभाती रही हैं। राजधानी के पत्रकारों के लिए भूमि/भवन/मकान और करोड़ों की आर्थिक सहायता देती रही हैं।
मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर।प्रेस क्लब की सदस्यता का कार्ड एक कागज का टुकड़ा मान लीजिए,या फिर इसे पत्रकारों के लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रतीक समझये। ये वो ताकत है जो आपको आपका नुमाइंदा चुनने का अधिकार देती है और आपका नुमाइनदा आपकी जायज़ जरुरतों के लिए सरकार के बीच आपकी नुमाइंदगी करता है।
यदि आपका ही नुमाइंदा निजी स्वार्थों या आपके ही खिलाफ काम करने लगे तो उसे आप अगले चुनाव में कुर्सी से बेदखल कर सकते हैं।
लेकिन दुर्भाग्य ये कि पत्रकारिता के इतने बड़े गढ़ लखनऊ में प्रेस क्लब ही नहीं है। दशको से यहां के पत्रकार कैसरबाग स्थित जिलाधिकारी आवास और परिवर्तन चौक के दरम्यान बड़े-बड़े अक्षरों में यूपी प्रेस क्लब नाम से सुशोभित जो बड़ी सी बिल्डिंग देखते थे वो यूपी प्रेस क्लब नहीं है। ये क्षल था। आंखों का धोखा था। सरकारें भी इस धोखे में आकर शहर के सभी पत्रकारों के वेलफेयर के लिए यूपी प्रेस क्लब को वित्तपोषित करती रहीं, सब्सिडी/सहयोग देती रहीं। प्रेस क्लब के ओहदेदारों को शहर के सभी पत्रकारों द्वारा निर्वाचित पत्रकारों का प्रतिनिधि मानकर उनकी मांगों पर अमल करती रहीं। (देश-विदेश के दौरे और अन्य निजी काम)
किसी भी शहर के प्रेस क्लब की सबसे अहम बात ये होती है कि उसके पदाधिकारी उस शहर भर के पत्रकारों के प्रतिनिधि होते हैं। सभी पत्रकार उन्हें संवेधानिक/लोकतांत्रिक तरीके से चुनते हैं।

पत्रकारों के मनोरंजन, स्पोर्ट्स, जल-पान, विश्राम और आपसी चर्चा-परिचर्चा के लिए प्रेस क्लब हर बड़े शहर में होता है। देश या प्रदेश की राजधानी में ये इसलिए ज़रूर होता है क्योंकि राजधानी में मीडियाकर्मियों की तादाद अधिक होती है। प्रेस क्लब पर सभी पत्रकारों का समान अधिकार होता है। प्रेस क्लब नियमानुसार और अनुशासित तरीके से संचालित हो, इसका गलत इस्तेमाल ना हो, इसके पद का कोई दुरोपयोग ना करे, सरकारी सब्सिडी या आर्थिक आय-व्यय में कोई अनिमियता ना हो, इसलिए पत्रकार ही लोकतांत्रिक/निर्वाचित तरीके से अपने बीच से पत्रकारो़ को चुनकर प्रेस क्लब के ओहदों की जिम्मेरियां बांटते है। किसी शहर के प्रेस क्लब के ओहदेदारों की बात सरकारें इसलिए सुनती हैं, या उसपर अमल करती हैं क्योंकि वो समझती हैं कि शहर के सम्पूर्ण पत्रकारों ने निर्वाचित तरीके इसे अपना प्रतिनिधि मनाया है।
देश और दुनिया में मीडिया कर्मियों के वैलफेयर में प्रेस क्लब का कन्सेप्ट है। विशिष्ट सेवाओं से जुड़े पत्रकारों के प्रेस क्लब में सहयोग/सब्सिडी/सहायता देकर सरकारें अपना दायित्व निभाती हैं।
हर प्रेस क्लब में एक अहम बात ये होती है कि यहां का संचालन/सरपरस्ती करने वाले लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित होते हैं। यानी समय-समय पर पत्रकारों द्वारा चुने गये पत्रकार ही प्रेस क्लब के पदाधिकारी होते हैं।
तीसरी अहम बात ये है कि जिस शहर का प्रेस क्लब है उस शहर के हर वास्तविक पत्रकार का उस प्रेस क्लब पर हक़ होता है। प्रेस क्लब की सदस्यता हासिल करना भी हर पत्रकार का अधिकार है।
लेकिन यूपी प्रेस क्लब में ऐसा नहीं होता। बताया जाता है ये प्रेस क्लब ही नहीं है, इसलिए यहां किसी प्रेस क्लब वाली नियमावली लागू नहीं होती। लखनऊ के सभी पत्रकारों का इस पर अधिकार नहीं है। हर पत्रकार यहां के पदाधिकारियों के चयन में अपनी भागीदारी नहीं निभा सकता। प्रेस क्लब की सदस्यता का अधिकार पाने और चुनाव कराने की बात नहीं कर सकता। शायद गलती से बाहर गेट पर यूपी प्रेस क्लब लिख दिया गया है। ये प्रेस क्लब नहीं, कुछ खास और चंद लोगों की यूनियन (निजि कंपनी जैसा)का ऑफिस है।
लेकिन किसी के यूनियन ऑफिस पर यूपी प्रेस क्लब लिखने की गलती से कितना नुकसान हो गया !
शहर के पत्रकारों की पीढ़ी दर पीढ़ी पर बड़ा सितम हो गया।
किसी के यूनियन ऑफिस पर गलती से यूपी प्रेस क्लब का बोर्ड नहीं लगता तो देश-दुनिया के हर बड़े शहर/राजधानी की तरह लखनऊ के पत्रकारों का भी एक प्रेस क्लब होता। जब सरकारों ने पत्रकारों और पत्रकार संगठनों को सैकड़ों मकान/जमीने दी हैं, करोड़ों की सहायता/सहयोग राशि दी है तो वास्तविक प्रेस क्लब के लिए भी जमीन और आर्थिक सहयोग मिल ही गया होता।
और इस शहर के सभी पत्रकार यहां के सदस्य होते। वो लोकतांत्रिक तरीके से अपने बीच के पत्रकारों को निर्वाचित करके प्रेस क्लब यानी अपना प्रतिनिधि बनाते।







