घुमत रहली गोरी रहिला क खेतवा,
चुनरी में लागी गइले नोनी क दाग हो।
ओहिके छोड़ावे में छू देहली हथवा से,
उनका देहिया से उठे लागल आग हो।
देखे खातिर गईल रहली सरसो क फुलवा,
भंवरा क बीच से मची गईल भागम-भाग हो।
केतनो सम्भारस उ आपन अंचरा,
लेकिन नाही बुझे नोनिया क आग हो।
सोचेली कि केईसे बचाईं मरदा से नजरिया,
शरीरिया में त लागी गईले दाग हो।
– उपेंद्र नाथ राय ‘घुमन्तु’







