Viral Issue: बेरोजगार सबसे कमजोर और निरीह क्यों ?
गरीब को लूटना सबसे आसान है और वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में बेरोजगार को गरीब की श्रेणी में रखना शायद गलत नही होगा। अपने देश की जो सामाजिक परिस्थितियां हैं रोजागारकी जो स्थिति है उसमें बहुत कम बेरोजगार होते हैं जो अपने भविष्य को लेकर आत्म विश्वास से लबरेज होते हैं अधिकांश में हताशा और निराशा के भाव होते हैं। यह बेरोजगार गरीब लूटा जा रहा है। लूटा जा रहा है ये तो सभी जानते हैं लेकिन इसको लूटने वाले कोई अपराधी नही बल्कि हमारी सरकारें भी शामिल हैं। केन्द्र हो या फिर कोई राज्य सरकार, देश के किसी भी हिस्से में बेरोजगारों को ठगने का सिलसिला सततरूप से जारी है। सुनने में यह बात खराब लग रही है और यकीन करना भी मुश्किल है। लेकिन अक्षरशः नही तो किसी न किसी हद तक इस बात में कुछ न कुछ सच्चाई अवश्य है। संघ लोक सेवा आयोग हो, या उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग या भारत के किसी भी राज्य का लोक सेवा अथवा अधीनस्थ चयन बोर्ड।

यह सवाल कभी किसी ने न तो संसद में उठाया और न ही किसी राज्य की विधानसभा में इस पर बहस हुयी कि आखिर कोई भी भर्ती बोर्ड जब सरकार से अभ्यर्थियों के लिये आवेदन पत्र मांगते हैं तो उसके साथ परीक्षा शुल्क के रूप में बैंक ड्राफ्ट/ पोस्टल आर्डर या आनलाइन धनराशि क्यों मांगी जाती है। कोई भी सरकार या कम्पनी अपने लिये नौकर को तलाश करती है यानि की पहला स्वार्थ सरकार या कम्पनी का होता है। ठीक है कि बेरोजगार को रोजगार चाहिये लेकिन सरकार या कम्पनी को तो नौकर चाहिये। तो पहली आवश्यकता सरकार की है या कम्पनी की। इस दशा में सरकार या कम्पनी को बेरोजगार को परीक्षा या साक्षात्कार के लिये बुलाने का खर्च स्वयं उठाना चाहिये न कि बेरोजगारों के मत्थे मढ़ देना चाहिये।
एक दूसरा पक्ष यह है कि बेरोजगार अभ्यर्थी से प्राप्त धनराशि आखिर जाती कहां हैं। किसी सरकार ने अभी तक संघ लोक सेवा आयोग या राज्यों के अभी तक संघ लोक सेवा आयोग और विभिन्न भर्ती व चयन बोर्डो के खर्च आदि का व्यौरा क्यों नहीं पटल पर रखा इसलिये कि बेरोजगार सबसे कमजोर और निरीह है। उसकी आंखों में सपने हैं जिन्हें सरकार या कोई कम्पनी ही पूरा कर सकती है। और वह इस स्थिति में कभी भी नहीं आ पाता कि वह सरकार या कम्पनी से यह सवाल पूँछे कि अभ्यर्थियों से प्राप्त की गयी धनराशि का क्या किया गया। यह बात एक उदाहरण से समझी जा सकती है।
मान लीजिये कि उ0प्र0 लोक सेवा आयोग ने प्रान्तीय सिविल सेवा के 100-125 पद का विज्ञापन निकाला। इन पदो के लिये 9,00,000 अभ्यर्थियों ने आवेदन भरा। प्रत्येक अभ्यर्थी से आयोग ने परीक्षा शुल्क के नाम पर 200 रु. प्राप्त किये तो इस हिसाब ये धनराशि 18 करोड़ हुयी आयोग वर्ष भर सिविल सेवा के अलावा विभागवार परीक्षायें कराता ही रहता है। उसी बेरोजगारों से वार्षिक आय कितनी हुई।
हर साल बेरोगारों से हजारों करोड़ रुपये कमाने वाले यह आयोग और भर्ती बोर्ड अभ्यर्थियों को परीक्षा के लिये विभिन्न शहरों में बुलाते हैं उन्हें एक पैसा यात्रा के लिये नहीं देते हैं । निरीह बेरोजगारों पर आयोग का इतना कर रवैया होने के बावजूद हर ओर सब सामान्य रहता है न संसंद इस पर बोलती है न विधान सभा न कोई अखबार इस पर लेख लिखता है न टीवी पर ये कोई विषय है बहस के लिये। दरअसल यही सबसे बड़ी समस्या अपने देश की है कि जो मुद्दे वास्तव में प्रासंगिक होते हैं , सामाजिक सरोकार से जुड़े होते हैं बहस या चर्चा उन पर न होकर उन मुद्दो के इर्द गिर्द के विषयो तक सीमित हो जाती है। इसका सबसे बड़ा और कडुवा दुष्प्रभाव यह है कि मुददे कभी समाप्त ही नहीं होते। बेरोजगारी का सबसे बड़ा और कडुवा दुष्प्रभाव यह है कि मुददे कभी समाप्त ही नहीं होते क्योंकि कभी आबादी तो कभी शिक्षा और कभी स्किल पर अनावश्यक बात होती है।
- डॉ. नरेन्द्र तिवारी







