जी के चक्रवर्ती
अफगानिस्तान में इस समय जो माहौल है उससे पूरी दुनिया सकते में है तालिबान के कब्जे के बाद अब अफगानिस्तान में चारो ओर दहशत और खौफ छाया है। लोग दूसरे देश में पनाह मांगने के लिए भाग रहे हैं।
बता दें कि अमेरिका ने अक्टूबर वर्ष 2001 में अफगानिस्तान से तालिबान को सत्ता से बाहर करने के लिए अफगानिस्तान पर हमला किया था। उस समय अमेरिका का कहना था कि अफगानिस्तान लादेन और अल-कायदा से जुड़े दूसरे उग्रवादियों को अपने देश मे पनाह दे रहा था।
11 सितम्बर 2001 को संयुक्त राज्य अमेरिका पर अल-क़ायदा द्वारा समन्वित आत्मघाती हमलों की एक श्रंखला में 11 सितम्बर के सबेरे, 19 अल कायदा आतंकवादियों ने न्यूयॉर्क शहर के ट्रेड सेंटर, में से दो जुडवें टाव को अपहरण कर लाये गये चार वाणिज्यिक यात्री जेट विमान को आंतकी साज़िश के तहत जानबूझकर उससे टकरा दिया, जिससे विमानों पर सवार सभी लोगों के साथ भवनों के अंदर काम करने वाले लोगों में से बहुत से लोग भी मारे गए थे, और यह दोनों भवन दो ही घंटे के अंदर ढह गये थे।

इस घटना को अंजाम देने के लिए अमेरिका इन्ही आतंकवादियो को ज़िम्मेदार मानता है और तभी से अमेरिका तालिबानी कमांडर ओसामा बिन लादेन का काम तमाम करने के फिराख में लगा रहा और अंततः उसे 10वर्षो के बाद दो मई 2011 को अमरीकी फ़ौज के एक विशेष दस्ते द्वारा पाकिस्तान के ख़ैबर पख़तूनख़्वा प्रांत में छिपे ओसामा बिन लादेन उनके क़रीबी साथी अबू अहमद अलकूवैती और तीन अन्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
इस समय अफगानिस्तान तालिबान की बर्बरता से कांप उठा है। आज अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ते ही फिर से यह देश बर्बरता के शिकंजे में फंस जाना मानवता के लिए अत्यंत चिंताजनक है। कथित इस्लामी सत्ता की स्थापना के लिए आज तालिबान जो कहर ढा रहा है, शायद ही उसकी दुनिया के किसी भी कोने में प्रशंसा होती होगी लेकिन आज इस बर्बरता पूर्ण कार्रवाई से पूरी दुनिया स्तब्ध है।

कभी भारत देश का एक हिस्सा कहलाने वाला अफगानिस्तान में सनातन और बौद्धों धर्म का बोलबाला हुआ करता था, आज की परिस्थिति में हमारे देश द्वारा वहां पर किये गये निवेश पर हमे गौर करना पड़ेगा अफगानिस्तान में जिन विकास परियोजनाओं में भारत की हिस्सेदारी रही। एक अनुमान के अनुसार, हमारे देश ने वहां के लिए 2.3 अरब डॉलर के सहायता कार्यक्रम चला रखे हैं, अब यह प्रश्न उठना लाजमी है की आज की हालत में उन परियोजनाओं का क्या हस्र क्या होगा? आम अफगानियों के बीच भारत की छवि अच्छी जरूर हैं, लेकिन तालिबानियो का रुख भारत के प्रति बहुत अच्छा नही कहा जा सकता है।
बहरहाल, अफगानिस्तान से केवल भारतीय लोग ही नहीं,बल्कि अन्य देशों के लोग भी पलायन कर रहे हैं। हमने कंधार विमान अपहरण के समय तालिबान की भूमिका देख चुके हैं। ऐसे में यह कहना गलत नही होगा कि दुनिया भर के आतंकवादियों को फिर से अफगानिस्तान में एक सुरक्षित ठिकाना मिल जायेगा।







