- परम्परागत चूने से पुताई अब चलन से बाहर,
- आयल बाउंड डिस्टेंपर की मांग है सर्वाधिक
लखनऊ, 5 अक्टूबर। जगमग दीपों के साथ साज-सज्जा के त्यौहार दीपावली की आहट अब बाजार में दिखाई देने लगी है। साफ-सफाई और सजाने-संवारने के लिए घर तक पहुंचे रंग-रोगन और कूंची ने छतों- दीवारों पर रंग बिखेरना शुरु कर दिया है। समय के साथ लोगों की रुचि में बदलाव अब साफ नजर आ रहा है। यही कारण है कि ज्योति पर्व दीपावली पर कभी रंगाई-पोताई के काम में एक क्षत्र राज करने वाला चूना अब चलन से बाहर है। सीलन से न लड़ पाने की क्षमता इसकी विदाई का एक बहुत बड़ा कारण है। ऐसे में रंगाई-पोताई में मजबूत दखल बनाई है आॅयल बाउंड डिस्टेंपर ने जो टिकाऊ व कलर फुल होने के साथ ही लोगों के बजट को भी रास आ रहा है।
च्वाइस के भरपूर अवसर
हर रंग कुछ कहता है। रंग का दिमाग पर भी असर पड़ता है। इसलिए जरुरी है कि इस दीपावली पर जब आप अपने घरों को रंगे तो उस रंग के माध्यम से अपने मनोभावों को ही नहीं आंखों के सुकून को भी ध्यान में जरुर रखे।
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक रंग मन की शांति ही नहीं बल्कि तनाव के कारण भी बन सकते हैं। इसलिए रंग कराते समय ध्यान रखना जरुरी है। वाटर बेस एनामिल पेंट अब वाटर बेस एनामिल पेंट बाजार में आ गया है। इसकी कीमत 275 से 300 रुपये प्रति लीटर है। रंग का प्रभाव व्यक्तित्व पर रंग का प्रभाव सीधे-सीधे लोगों के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। पढ़ने वाले बच्चों के कमरे में नीले, लाल,गुलाबी जैसे चटखदार रंग उनके अंदर ऊ.र्जा पैदा करते है। विवाहिता जोड़ों के कमरों में आसमानी, ग्रीन क्रीम जैसे रंग अच्छे होते है। बुजुर्गो के कमरे में सफेद और हल्के रंग प्रयोग किए जाने चाहिए।
इन्दिरा नगर बी ब्लाक समोदीपुर स्थिम एमएस टेडर्स के रोहित सिंह का कहना है कि कंपनियों की ओर से स्कीम प्रतिस्पर्धा के इस दौर में तकरीबन हर कंपनी ग्राहकों के लिए त्योहारी उपहारों के साथ बाजार में है। साथ में वारंटी स्कीम भी लागू है। एक-दो नहीं बल्कि अब तो दस साल तक की वारंटी भी दी जाने लगी है। समय के साथ ट्रेंड बदल रहा है।
हर वर्ष नहीं करना चाहते रंगाई-पोताई
गोमती नगर विस्तार के कौशलपुरी कालोनी की रहने वाली अन्नू सिंह का कहना है कि डिस्टेंपर व पेंट पर भी महंगाई की मार जबरदस्त है। तीन से साढ़े तीन सौ रुपये रोज की मजदूरी पर जब कोई पेंट कराता है तो वह चाहता है कि उसकी गाढ़ी कमाई कम से कम तीन से चार साल चले। यही वजह हैं कि अब लोग चूना नहीं बल्कि डिस्टेंपर या फिर प्लास्टिक पेंट पसंद कर रहे हैं।
वक्त के साथ बदली चाहत
रंग कारोबारी राजेश चंद्र बताते हैं कि चूना से लोग अब किनारे कर लिए है। अब घरों में 85 फीसदी डिस्टेंपर हो रहे है। तकरीबन 10 फीसद घरों में प्लास्टिक पेंट का प्रयोग हो रहा है। पिछले चार- पांच सालों से इसकी मांग बढ़ी है। आंतरिक से लेकर बाहरी रंगाई अब इन्हीं से की जा रही है। इसमें सफेद बेस स्टेनर मिला कर रंग तैयार किए जाते है।







