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    Home»संपादकीय

    गाज़ा में अब भुखमरी की जंग और मानवता की हार

    ShagunBy ShagunAugust 1, 2025 संपादकीय No Comments6 Mins Read
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    फोटो : सोशल मीडिया के वीडियो से साभार
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    गाज़ा की धरती आज न केवल बमों और गोलियों की गूँज से थर्रा रही है, बल्कि भुखमरी की चीखों से भी कराह रही है। यह जंग अब सिर्फ सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रही; यह एक ऐसी अमानवीय लड़ाई बन चुकी है, जहाँ लोग न केवल दुश्मन की गोलियों से, बल्कि खाने के एक टुकड़े के लिए आपस में लड़कर और भूख से मर रहे हैं। गाज़ा के हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि हर तस्वीर, हर खबर दिल को चीर देती है। यहाँ का हर बच्चा, हर माँ, हर बुजुर्ग एक ऐसी जंग लड़ रहा है, जहाँ जीत की कोई उम्मीद नहीं, सिर्फ हार का सिलसिला है। हार भूख की, हार इंसानियत की।

    भुखमरी की क्रूर हकीकत से सामना

    गाज़ा के बाज़ारों में उपलब्ध खाने की चीज़ें इतनी महँगी हैं कि एक आम इंसान के लिए उन्हें खरीदना असंभव हो गया है। एक किलो चीनी की कीमत 106 डॉलर और एक किलो आटे की कीमत 12 डॉलर तक पहुँच चुकी है। इन हालात में एक परिवार का गुजारा कैसे हो? एक पिता अपनी भूखी संतान को क्या खिलाए? एक माँ अपने रोते बच्चे को कैसे चुप कराए? भोजन के अभाव में लोग मदद के लिए इकट्ठा हो रहे हैं, मगर वहाँ भी उन्हें नसीब नहीं हो रहा। सहायता वितरण के स्थानों पर छीना-झपटी, मारपीट और इज़राइली सैनिकों की गोलियों ने 1300 से ज़्यादा लोगों की जान ले ली है। यह आँकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों का दर्द है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को भूख और हिंसा की भेंट चढ़ते देखा।

    फोटो : सोशल मीडिया के वीडियो से साभार

    मानवता का पतन

    गाज़ा की यह त्रासदी सिर्फ वहाँ के लोगों की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की असफलता की कहानी है। एक तरफ गाज़ा में लोग एक-एक निवाले के लिए तरस रहे हैं, दूसरी तरफ दुनिया के दूसरे हिस्सों में भोजन की बर्बादी और ऐशो-आराम का तमाशा जारी है। यह गैर-बराबरी की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? समाचार एजेंसियाँ अपने पत्रकारों के माध्यम से लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए अपील जारी कर रही हैं। यह कितना शर्मनाक है कि जो लोग दुनिया को सच दिखाने का काम करते हैं, उन्हें भी भूख का सामना करना पड़ रहा है। डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, बच्चे कोई भी इस भूख की मार से बचा नहीं है। गाज़ा में भूख अब सिर्फ एक शारीरिक पीड़ा नहीं, बल्कि एक मानसिक और सामाजिक ज़ख्म बन चुकी है, जो हर इंसान को कमज़ोर कर रही है।

    युद्ध और भुखमरी का गठजोड़

    गाज़ा में भुखमरी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि युद्ध और नाकाबंदी का परिणाम है। युद्ध ने वहाँ की खेती, मछली पालन और बुनियादी ढाँचे को तबाह कर दिया है। नाकाबंदी ने सहायता सामग्री को सीमाओं पर रोक दिया है। जो थोड़ा-बहुत खाना उपलब्ध है, वह या तो लूट लिया जाता है या इतना महँगा है कि वह आम लोगों की पहुँच से बाहर है। सवाल यह है कि जब दुनिया के पास संसाधन, तकनीक और बुद्धि की कोई कमी नहीं, तो क्यों गाज़ा के लोग इस तरह मरने को मजबूर हैं? क्या यह सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है, या फिर मानवता के प्रति उदासीनता का परिणाम?

    फोटो : सोशल मीडिया के वीडियो से साभार

    दुनिया की चुप्पी

    गाज़ा की त्रासदी पर दुनिया की चुप्पी सबसे ज़्यादा दुखदायी है। कुछ देश और संगठन इस संकट पर आवाज़ उठा रहे हैं, मगर उनकी आवाज़ें या तो दबा दी जाती हैं या अनसुनी कर दी जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से बार-बार युद्धविराम और सहायता की माँग की जा रही है, मगर ये माँगें कागज़ी बयानों तक सीमित रह जाती हैं। गाज़ा के लोग सिर्फ खाने की नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता की भीख माँग रहे हैं। मगर दुनिया की ताकतवर सत्ताएँ अपनी राजनीतिक गणनाओं में उलझी हुई हैं। यह विडंबना है कि एक तरफ मानवाधिकारों की बातें होती हैं, दूसरी तरफ गाज़ा जैसे हालात को अनदेखा किया जा रहा है।

    भारत की मानवीय सहायता

    गाज़ा के इस संकट में भारत ने मानवीय सहायता के लिए कदम बढ़ाए हैं। भारत ने अपनी दीर्घकालिक नीति के तहत दो-राज्य समाधान का समर्थन करते हुए गाज़ा के लोगों के लिए कई बार सहायता भेजी है। 2023 और 2024 में भारत ने कुल 70 टन सहायता सामग्री, जिसमें दवाइयाँ, सर्जिकल उपकरण, तंबू, कंबल और पानी शुद्ध करने की गोलियाँ शामिल थीं, मिस्र के एल-अरिश हवाई अड्डे के रास्ते गाज़ा भेजी। इसके अलावा, भारत ने संयुक्त राष्ट्र रिलीफ एंड वर्क्स एजेंसी (UNRWA) को 2024-25 के लिए 5 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की है, जो फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं को समर्थन देती है। भारत ने गाज़ा में युद्धविराम और बंधकों की रिहाई की माँग भी की है, साथ ही यह सुनिश्चित करने की अपील की है कि सहायता सुरक्षित और समय पर गाज़ा के लोगों तक पहुँचे।

    भारत की सहायता गाज़ा के लिए

    1. 2023 में सहायता: 6.5 टन चिकित्सा सामग्री और 32 टन आपदा राहत सामग्री (दवाइयाँ, तंबू, कंबल, पानी शुद्ध करने की गोलियाँ आदि) 22 अक्टूबर को मिस्र के एल-अरिश हवाई अड्डे के रास्ते भेजी गई। दूसरी खेप में 32 टन सहायता सामग्री 19 नवंबर को भेजी गई।
    2. 2024 में सहायता: 30 टन चिकित्सा सामग्री और खाद्य पदार्थ (जीवन रक्षक दवाइयाँ, कैंसर रोधी दवाएँ, सर्जिकल उपकरण, हाई-एनर्जी बिस्किट) UNRWA के माध्यम से भेजे गए।
    3. वित्तीय सहायता: 2024-25 में UNRWA को 5 मिलियन डॉलर की वार्षिक सहायता, जिसमें से 2.5 मिलियन डॉलर की पहली किश्त जुलाई 2024 में जारी की गई। भारत ने 2018 से UNRWA के लिए अपनी सहायता को 1.25 मिलियन से बढ़ाकर 5 मिलियन डॉलर वार्षिक किया है।
    4. भारत की अपील: युद्धविराम, बंधकों की रिहाई, और गाज़ा में सुरक्षित, समयबद्ध और निरंतर मानवीय सहायता की माँग। भारत ने दो-राज्य समाधान के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

    स्थायी शांति की ज़रूरत

    गाज़ा की इस त्रासदी का समाधान सिर्फ सहायता सामग्री भेजने से नहीं होगा। इसके लिए युद्धविराम, नाकाबंदी हटाने और स्थायी शांति की ज़रूरत है। दुनिया को यह समझना होगा कि भुखमरी सिर्फ एक मानवीय संकट नहीं, बल्कि एक नैतिक संकट भी है। हमें अपने भीतर की इंसानियत को जगाने की ज़रूरत है। हर देश, हर संगठन और हर व्यक्ति को इस संकट के समाधान में अपनी भूमिका निभानी होगी। गाज़ा के बच्चों को भूख से मरते देखकर अगर हमारा दिल नहीं पसीजता, तो हमारी मानवता पर सवाल उठना लाज़मी है।

    गाज़ा की धरती आज खून, आँसुओं और भूख की गवाह है। यहाँ की हर कहानी, हर तस्वीर हमें झकझोरती है। यह सिर्फ गाज़ा की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की हार है। हमें यह तय करना होगा कि हम ऐसी दुनिया में जीना चाहते हैं, जहाँ एक तरफ भूख से मरते लोग हों और दूसरी तरफ ऐशो-आराम की बर्बादी। गाज़ा के लोगों को सिर्फ खाना नहीं, बल्कि ज़िंदगी का हक चाहिए। यह हक उन्हें देना हमारी ज़िम्मेदारी है। अगर हम आज चुप रहे, तो कल इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। गाज़ा को बचाने का वक्त है, और यह वक्त हम सबके लिए एक इम्तिहान है। आइए, इस इम्तिहान में इंसानियत को जीतने दें।

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