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    शब्द रंग का सौंदर्य बोध

    By November 26, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    नकारात्मक चिंतन से शब्दों मर्यादा पर भी प्रतिकूल असर होता है। शब्द समाज को जोड़ते भी है, तोड़ते भी है।जैसी भावना होती है, वैसे ही विचार सामने आते है। भारतीय चिंतन में शब्द ब्रह्म का महत्व प्रतिपादित किया गया। इस प्रकार मर्यादित और सकारात्मक अभिव्यक्ति की प्रेरणा दी गई। प्राचीन भारत का शास्त्रार्थ विलक्षण होता था। वाद विवाद से तत्वज्ञान होता है। लखनऊ में  शब्दरँग शीर्षक से  पांच विषयों पर विचार विमर्श का आयोजन किया। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने इसका उद्घाटन किया।
    संविधान दिवस पर ऐसे समारोह का आयोजन प्रेरणा प्रदान करने वाला है। उल्लेखनीय है कि संविधान के शिल्पी का सही नाम प्रयोग करने का आग्रह और प्रमाण राम नाईक ने ही प्रस्तुत किया था। उन्होंने संविधान में उल्लखित हस्ताक्षर का प्रमाण दिया। इसमें भीमराव रामजी आंबेडकर नाम का पूरा उल्लेख किया गया था। डॉ आंबेडकर का यह सुंदर हस्ताक्षर था। यह संविधान की मूल प्रति में अंकित है।
     इसी को राम नाईक ने शब्द रंग से जोड़ा। मूल संविधान में भगवान राम, कृष्ण, आदि अनेक चित्र भी दिए गए थे। इसकी जानकारी हमारे नागरिकों को होनी चाहिए। आज ही के दिन मुंबई में आतंकवादियों ने हमला किया था। यह संविधान को चुनौती थी। इसमें एक को छिड़कर सभी आतंकी मारे गए थे।
    विद्रोह और स्वतंत्रता संग्राम दोनों शब्द है। लेकिन इनका प्रयोग अलग अलग भाव को उजागर करता है। अठारह सौ सत्तावन संग्राम को अंग्रेजों ने विद्रोह कहा था। वीर सावरकर ने इसे स्वतंत्रता संग्राम कहा। इतने मात्र से इसका भाव राष्ट्रवादी हो गया।  राम नाईक  कॉमर्स के विद्यार्थी थे। उनके शिक्षक ने कहा था कि व्यक्तित्व सुधार करना चाहिए। इसके लिए चार मंत्र बताए।  मुस्कुराइए, प्रोत्साहन दीजिये, किसी की अवमानना मत करिए, जो भी करते है उससे बेहतर मार्ग की भी तलाश करते रहे। मुस्कुराने से आप सबके प्रिय बनते है। अच्छे कार्य के लिए अपने से बड़े या छोटे सबकी प्रसंशा करनी चाहिए। किसी की अवमानना या अपमान नहीं करना चाहिए। शारीरिक घाव तो भर जाते है , लेकिन शब्दों के जख्म कभी नहीं भरते। यदि किसी से कोई शिकायत हो तो उसे अकेले में बता देना चाहिए। प्रत्येक कार्य को बेहतर ढंग से करने की जिज्ञासा सदैव रहनी चाहिए।
     फ़िल्म अभिव्यक्ति का लोकप्रिय और प्रभावी माध्यम है। साहित्य से अधिक प्रभाव फ़िल्म का होता है। एक तरफ समाज को उचित सन्देश देने वाली फिल्में बनी, लेकिन अधिकांश फिल्में  ग्लैमर पर आधारित रही है। समाज पर इनका अधिक प्रभाव पड़ा। इसमें युवकों को स्वप्न लोक दिखाए गए, पाश्चात्य उपभोगवाद को महिमा मंडन किया गया।
    मीडिया भी समाज से जुड़ा संचार  माध्यम है। पहले  केवल प्रिंट मीडिया था। अखबार पढ़ने के साथ दिनचर्या शुरू करने वाले लोगों की संख्या करोड़ों में है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रसार का व्यापक रूप स्थापित कर दिया है। प्रिंट मीडिया का महत्व भी कम नहीं हुआ है। सोशल मीडिया ने तो सभी को टिप्पणी का अवसर प्रदान कर दिया है।
    लेकिन समाज में सकारात्मक चिंतन को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। मीडिया इसमें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वाह कर सकती है। लेकिन कई बार निराशा भी दिखाई देती है। नरेंद्र मोदी सरकार गठित होने के कुछ समय बाद ही कथित असहिष्णुता अभियान शुरू किया गया था। कानून व्यवस्था के कुछ उदाहरण लेकर हंगामा किया गया, सम्मान वापस होने लगे, पूरे विश्व में भारत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।
    ऐसे समय में मीडिया की बड़ी जिम्मेदारी थी। उसे भारत को बदनाम करने वाले इस अभियान के पीछे लगी राजनीतिक शक्तियों को बेनकाब करना चाहिए था। भारत ही नहीं विश्व को यह बताना चाहिए था कि भारत जैसी सहिष्णुता कहीं नहीं है। यहां सभी पंथ के लोग सौहार्द के साथ रहते है।
     डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर समाज मे समरसता चाहते थे। लेकिन आज देश की सबसे पुरानी पार्टी ने संविधान दिवस पर जातिवादी सम्मेलन आयोजित किये। लखनऊ में राष्ट्रीय कला मंच के अंतर्गत शब्द रंग का आयोजन किया गया। इसके पीछे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का मूल विचार शामिल था। सभी प्रचार माध्यमों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए। राष्ट्रवादी चिंतन होगा तो सकारात्मक चिंतन को प्रोत्साहन मिलेगा। केरल सबसे शिक्षित राज्य है। लेकिन यहां कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ता विरोधियों के प्रति  हिंसक व्यवहार करते थे। यही कार्य पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार ने किया था। लेकिन केरल, कोलकाता से लेकर दिल्ली तक इन राजनीतिक हत्याओं का पत्रकारों ने विरोध नहीं किया।
     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने नौ मिनट के भाषण में छह बार नरेंद्र मोदी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया। उस पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष भी वैसे ही निकले, उन्होंने नरेंद्र मोदी की बनावे वर्षीय मां का बेशर्मी से उल्लेख किया। ये शब्द ही है जो उन्हें प्रकट करने वाले का भी स्तर उजागर करते है। ऐसे में मीडिया , फ़िल्म ,समाज सभी का यह दायित्व है कि वह शब्दों की मर्यादा सुनिश्चित करे।

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