कोविड-19 से सतर्क रहना जरूरी है

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पंकज चतुर्वेदी

बिजली के मीटर बनाने वाली नोएडा की एक कंपनी कोई बीस दिन पहले ही इस लिए बंद हो गई । चूंकि मीटर के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से ‘डिजीटल डिसप्ले’ की चीन से ही सप्लाई होती थी और जो पूरी तरह बंद हो गई सा कारखाने में तालाबंदी हो गई। ‘रोज कुंआ खोद कर पानी पीने वाले’ इस कंपनी के मजदूर जो अधिकांश बुंदेलखंड जैसे इलाकों से हैं, अब धीरे-धीरे अपने गांव- कस्बों में लौट रहे हैं।

गाजियाबाद जिले की साढे सात सो से अधिक लघु व मध्यम औद्योगिक इकाईयों के कोरोना वायरस के चलते बंद होने से हजारों लोगों के घरों पर चूल्हा जलने पर संकट खड़ा हो गया है। पूरे देश में दवाई, टीवी, मोबाईल व अन्य इलेक्ट्रानिक उत्पाद के कई हजार ऐसे कल-कारखाने बंद होने के कगार पर हैं जिनका उत्पादन-आधार ही चीन से आने वाला सामामन है। बाजार का हल तो सामने है। यह तो उस समय है जब कौरोना वायरस के कुप्रभाव का दूसरा चरण अभी प्रारंभ हुआ है। जैसी संभावना है कि आने वाले कुछ दिनों में कौरोना वायरस का संक्रमण तीसरे चरण में भयावह रूप से आम लोगों पर हमला कर सकता है।

कोविड-19 का पहला चरण तो उन देशों में बीमारी का हमला होता है जहां कौरोना वायरस ने अपना घर बना लिया हो, दूसरे चरण में संक्रमित देशों से विभिन्न देशों को जाने वाले पर्यटकों का वायरस की चपेट में आना और तीसरे चरण के तहत बाहर से आए लोगों के साथ आए संक्रमण का स्थानीय लोगों में प्रसार होना की खतरनाक अवस्था होती है। हमारे लिए चेतावनी है कि देश में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र है और वहां जो लोग भी इस वायरस के शिकार हैं वे छोटे कस्बों तक मिले हैं। यह सर्वविविदत है कि भारत में चिकित्सा सेवाएं बहुत कमजोर हैं, लोगों में वैज्ञानिकता के बनिस्पत आस्था या अंधविश्वास का ज्यादा जोर होता है और शिक्षा व जागरूकता की कमी है। उधर दिल्ली जैसे शहर जो आबादी से लबालब हैं, सार्वजनिक परिवहन व अन्य स्थान भीड़ से तरबतर हैं, कौरोना जैसे वायरस के फैलने के लिए माकूल परिवेश देते हैं।

कोविड़ के कारण समूचे चिकित्सा तंत्र पर दवाब तो होगा ही, इसको रोकने, संक्रमित व्यक्ति के इलाज पर होने वाले व्यय का भार भी सरकार व समाज पर पड़ना है। यह हमारे सामने हैं कि हमारे देश में महज आशंका के कारण ही सैनेटाईजर या मास्क की कालाबाजारी और नकली उत्पादन होने लगा। यदि संक्रमण का प्रभाव तीव्र होने की दशा में यदि ‘लॉक डाउन’ की स्थिति एक सप्ताह की ही बन गई तो भोजन, पानी, दवाई जैसी मूलभूत वस्तुओं के लिए आम लोगों में मारामारी होगी। अभी तो देश में संक्रमित लोगों कीं सख्या डेढ सौ भी नहीं है और दिल्ली के अस्पतालों में अफरातफरी जैसा माहौल है। भले ही आप या अपके परिवेश में इस वायरस का सीधा असर ना हो लेकिन इसकी संभावना या देश मंे कहीं भी प्रसार मंदी, बेराजगारी, गरीबी, जरूरी चीजों की कमी, अफरातफरी जैसी त्रासदियों को लंबे समय के लिए साथ ले कर आएगा।

हमारी तरफ कोविड- 19 का खतरा किस तरह बढ़ रहा है इसे जानने के लिए इसके प्रसार की प्रक्रिया को समझना जरूरी है । इस बीमारी का मूल कारक ‘एसएआरएस कोव-2’ नामक वायरस है। इसके अलावा भी छह अन्य किस्म के कौरोना वायरस होते हैं जिनके कारण आम सर्दी-जुकाम और एसईआरसी अर्थात सीवियर एक्यूट रेसपायरीटी सिंड्रोम और एमईआरसी अर्थात मिडिल ईस्ट रेसपायरीटी सिंड्रोम जैसी बीमारियां होती हैं। इन दिनों दुनिया में कोहराम मचाने वाला वायरस तेलीय वसे का आणविक कण हैं जिसकी सतह पर ‘‘मुकुट अर्थात क्राऊन’’ की तरह कांटे निकले होते हैं और तभी यह कौरोना कहलाता है।

 

माना जता है कि इसका मूल चमगादड़ हैं। चूंकि यह तेलीय कण है तभी साबुन या अल्कोहल आधारित घोल के संपर्क में आते ही निष्क्रिय हो जाता है। यह वायरस किसी संक्रमित व्यक्ति से किसी स्वस्थय व्यक्ति के नाक, मुंह या आंखें के जरिये प्रवेश करता है। संक्रमित छींक या खांसी के साथ निकली बूंदों में यह एक मीटर तक मार करता है। कपड़े-त्वचा आदि चिपक जाने के बाद पर यह लंबे समय तक जीवित रहता है।

 

स्वस्थ्य इंसान के शरीर में घुसते ही यह एसीई-2 प्रोटिन बनाने वाली कोशिकाओं पर चिपक जाता है। इसी तेलीय संरचना कोशिकाओं की झिलली को कमजोर करती हैं। इसी प्रक्रिया में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है व संक्रमित व्यक्ति को बुखार आने लगता है। प्रत्येक संक्रमित कोशिका पलक झपकते ही सैंकड़ो-हजारों में गुणित होने लगती हैं। इससे पैदा अनुवाशिकी पदार्थ ‘‘आरएनए’’ संक्रमण को फैंफडों तक ले जाता है। इस तरह बीमार व्यक्ति की छींक या खांसी से निकली बूंदें परमाणु बम की तरह अपनी जद में आए लोगों को अपनी चपेट में ले लेती हैं। सबसे चिंताजनक यह है कि शरीर के भीतर संक्रमण फैलने की गति इतनी तेज होती है कि अधिकांश मामलों में जब तक डाक्टर इसे समझता है, मरीज के फैंफडों में वायरस अपना पूरा कुप्रभाव दिखा चुका होता है।

 

भारत में इसके कुछ मरीज ठीक भी हुए हैं, वे केवल इस लिए ठीक हुए कि उन्हें संक्रमण फैलने से पहले ही पहचान लिया गया और उनका इलाज हो गया। यह भी बात सच है कि अभी इसके जांच की सुविधांए सीमित हैं और सरकारी अस्पताल तक ही हैं। ऐसे में अल्प शिक्षित, कम जागरूक, मजबूरी में भीड़ भरे सार्वजनिक स्थलों पर रहने वाले जब तक आम बुखार या सर्दी-जुकाम को समझें तक तब इसके गंभीर रूप लेने की संभावना अधिक है। फिर ऐसा व्यक्ति समाज में किन-किन लोगों के संपर्क में आया, इसका पता लगना कठिन होगा।

इस समय तो जहां तक संभव हो, सार्वजनिक स्थानों पर जाने से परहेज करना, बार-बार हाथ धोना, गैरजरूरी अपनी आंख-नाक को हाथ लगाने से बचना जरूरी है। साथ ही इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि इसका सामाजिक-आर्थिक असर लंबे समय तक आम लोगों को प्रभावित करेगा।

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