जी के चक्रवर्ती
दिल्ली में चुनावी जंग जारी है हर पार्टी अपनी ढपली अपना राग अलाप रही है लेकिन जनता के जो मन में जो है उसे पकड़ पाना इतना आसान नहीं है, फ़िलहाल जुगत जारी है। आठ फरवरी 2020 के दिन दिल्ली विधानसभा में होने वाले चुनाव में वोट डाले जाएंगे। दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के मकसद से शुरू हो चुके चुनावी गतिविधियों मे मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इस चुनाव में हिस्सा लेने वाले राजनीतिक दलों की ओर से लोक- लुभावन वादे करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसमे सबसे बड़ी विडंबना वाली बात यह देश मे होने वाले चुनावों के दरमियान वोट हासिल करने के उद्देश्य से विभिन्न पार्टियों द्वारा जनता से किये जाने वाले अधिकतर वादे अपने अंजाम तक पहुंच ही नही पाते हैं।
इसके अतिरिक्त एक और भी सच्चाई है कि राजनीतिक पार्टियों द्वरा चुनावों में किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने के उद्देश्य से मतदाताओं के सामने कुछ इस तरह के वादे भी कर लिये जाते हैं, जो दिखने में तो अत्याधिक आकर्षक लगते हैं, लेकिन ऐसे वादों का खर्च उठाने में आर्थिक बोझ पड़ने से इसका प्रभाव अन्य चीजों पर पड़ता है।
राजधानी दिल्ली में फरवरी महीने होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए मतदान होना है इसके मद्देनजर चुनाव में शामिल सभी राजनीतिक दलें अभी से गतिविधियां तेज कर चुके हैं। दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी और केजरीवाल भी मौजूदा संमय में बहुत सक्रियता दिखा रहे है। हालांकि अभी तक एक को छोड़ कर किसी भी राजनीतिक दल का घोषणा पत्र सामने नही आया है चुनावी तैयारियों के बीच भारतीय उद्योग व्यापार मंडल (बीयूवीएम) ने भी अपना घोषणा पत्र तैयार कर चुनाव लड़ रहे तीन राजनीतिक दलों को भेज चुका है।
ऐसा दिखाई दे रहा है कि यहां पर लगभग सभी पार्टियों द्वारा मौजूदा समय में बिजली और पानी के बिलों को मुद्दा बनाने के फिराख में हैं लेकिन सत्तासिन पार्टी द्वारा शिक्षा, चिकित्सा, प्रदूषण से लेकर झुग्गी बस्तियों के लोगों को पक्के मकान की गारंटी जैसे कई अन्य आकर्षक प्रस्ताव देने की उम्मीद जताई जा रही हैं, लेकिन यहां यह भी देखने योग्य बात होगी कि इन सभी वायदों पर ठोस धरातल पर सभी चुनावी वायदों को कार्यरूप देने का स्तर क्या होता है?
वहीं आम आदमी पार्टी ने जिस तरह विश्वस्तरीय यातायात व्यवस्था दिल्लीवासियों को उपलब्ध कराने के साथ ही साथ विद्यार्थियों को मुफ्त बस यात्रा की सुविधाये मुहैया कराने की घोषणा की है, उससे एक बार फिर से दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिए लोकप्रियतावादी वायदों का सहारा लेने की प्रवृत्ति की पुष्टि हुई है। इस तरह के लुभावने वादे सभी पार्टियों द्वारा चुनावी वक्त में करती रही हैं, लेकिन ऐसी प्रवृत्ति और वायदों के परिपेक्ष्य में एक यह प्रश्न उठता है कि जनता को कोई सुविधा मुफ्त मुहैया कराने से सरकारी कोष पर पड़ने वाले बोझ की भरपाई क्या जनता से नहीं की जायेगी?
आम आदमी पार्टी की सरकार ने अभी हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन की चलने वाली बसों में महिलाओं को मुफ्त में सफर करने की शुरुआत की। अब ताजा गारंटी कार्ड में विद्यार्थियों को भी यह सुविधा मुहैया कराने जैसा वायदा किया गया है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि ‘आप’ के कार्यकाल के अंतिम चरणों में दिल्ली की महिलाओं के लिए एवं वर्तमान समय में होने वाले चुनाव को ध्यान में रख कर विद्यार्थियों के लिए मुफ्त बस का सफर करने जैसे वादे को क्या लालच दिये जाने वाली राजनीति नही कहा जाएगा?
वैसे देखा जाय तो निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों द्वारा आकर्षक माने जाने वाले ऐसे वादे वास्तव में देश के नागरिकों के आम अधिकार ही होते हैं। यह बात सत्य है कि देश की राजधानी में सरकारी स्कूलों एवं टोले-मोहल्ले में क्लीनिकों के खोले जाने जैसे कुछ कामों को आमआदमी पार्टी सरकार अपनी उपलब्धियां अवश्य गिना रही है। लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में जनता के मूल अधिकार को कीसी भी सरकार द्वारा अपनी उपलब्धि बताने को कैसे या किस रूप में देखा जाना चाहिये?
हमारा देश एक लोकत्रांत्रिक देश होने के कारण यहां के सभी नागरिकों की मूलभूत अधिकारों में गुणवत्ता पूर्ण सस्ती चिकित्सा, शिक्षा एवं यातायात जैसी सुविधायें पाना यहां के जनता की मुलभूत अधिकार होने चाहिए। हमारे देश के लोगों के अपने-अपने राज्यों में मुफ्त सफर की व्यवस्था के साथ ही साथ यह भी अत्यंत आवश्यक है कि सार्वजनिक परिवहन के स्तर को और भी अधिक उन्नतशील बनाये जाने की जरूरत है। वहीं पर जब हम दिल्ली में विश्वस्तरीय यातायात व्यवस्था कायम किये जाने बात में गारंटी की बात करते हैं तो हमे यह कहना पड़ता है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान दिल्ली परिवहन निगम के बेड़े में कितनी बसें शामिल की गयी है?
फिलहाल यह बात किसी से छिपी नहीं है। दिल्ली जैसे देश की राजधानी में पानी-बिजली के बिलों में सुविधा और परिवहन के बसों में मुफ्त के सफर जैसे वायदे करने से भी अधिक आवश्यक यह है कि जनता के बुनियादी जरूरतों के उसके अधिकारों को चुनावी मुद्दा बनाये जाने के स्थान पर उसे सरकार के दायित्वों एवं कर्तव्य के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है।







