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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    परिवर्तन सृष्टि का नियम है…

    By November 14, 2018Updated:November 14, 2018 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    Post Views: 856

    वास्तव में कहा जाये तो हम हर व्यक्ति को उसकी विचारधारा से पहचानते अथवा परखते हैं, लेकिन इस विचारधारा का निर्माण कैसे होता है? किसी की विचारधारा एकदम मौलिक नहीं हो सकती। हम कोई भी विचारधारा अथवा दृष्टिकोण अपनी शिक्षा-दीक्षा अथवा अपने परिवेश के प्रभाव से ही अपनाते हैं। जीवन की हर अवस्था में हमारे रोल मॉडल भी अवश्य होते हैं। जो लोग हमें प्रभावशाली लगते हैं, उनकी आदतों को अपनाने में हमें देर नहीं लगती। एक तरह से हम उनकी विचारधारा को ओढ़ लेते हैं।

    यह हमारी वास्तविक विचारधारा नहीं होती अतः इसे सही या गलत कहना भी बिलकुल संभव नहीं। वो दूसरी बात है कि हमें वह बिलकुल सही और संतुलित लगती है।

    किशोरावस्था या युवावस्था में जिन लोगों की विचारधारा का प्रभाव हम पर पड़ता है, कई बार वह जीवनपर्यंत रहता है। सही और संतुलित विचारधारा हो तो इसमें कोई बुराई भी दृष्टिगोचर नहीं होती, लेकिन सही और गलत का सही निर्णय कैसे हो यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं। हमारे अनुभव बताते हैं कि हम जो अच्छी और महंगी वस्तुएं खरीदते हैं, कई बार उतनी उपयोगी नहीं होतीं जितनी सामान्य और कम दाम की वस्तुएं होती हैं। कई बार हम महंगी वस्तुएं खरीद तो लेते हैं, लेकिन वे शोपीस बनकर रह जाती हैं। यही तथ्य विचारधारा पर भी लागू होता है।

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    सभी फोटो: गूगल से साभार

    किशोरावस्था अथवा युवावस्था में मुझ पर जिन लोगों की विचारधारा का प्रभाव पड़ा उनमें से कई लोगों की विचारधारा किसी भी दृष्टि से सही या संतुलित नहीं थी। इससे छुटकारा पाने में बीस वर्ष लग गए। इसका यह अर्थ नहीं है कि आज हमारी जो परिवर्तित या संशोधित विशिष्ट विचारधारा है, वही सही है। सही या गलत की हमारी धारणा व्यक्तिगत अथवा सामूहिक कंडीशनिंग मात्र है और कुछ नहीं। परिवर्तन सृष्टि का नियम है। सही या गलत की धारणा भी परिवर्तनशील है। अतः व्यक्तिगत अथवा सामूहिक कंडीशनिंग में बदलाव के परिणामस्वरूप जो नई विचारधारा उभरकर आती है, वह किसी भी दृष्टि से गलत या अप्रासंगिक नहीं कही जा सकती।

    ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों की एक विशेष विचारधारा होती है और उनके समर्थक आंखें मूंदकर उस पर चलने को बाध्य होते हैं। कभी भी असंख्य लोगों की विचारधारा एक और केवल एक नहीं हो सकती। जब असंख्य लोग आंखें मूंदकर एक ही विचारधारा पर चलते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि उनकी अपनी कोई विचारधारा है ही नहीं। जन कल्याण अथवा लोक कल्याण के नाम पर सहमत होना अच्छा है, लेकिन आज विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि जिस तरह के अनर्गल बयान देते हैं, इससे उनकी अंधभक्ति ही नहीं विचार शून्यता का भी पता चलता है। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र का सही नेतृत्व नहीं कर सकते।

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