डॉ दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल कुलाधिपति के रूप में सभी विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में उपस्थित रहने का प्रयास करती है। ऐसे प्रत्येक समारोहों में उनका संबोद्धन विद्यर्थियो के लिए किसी अकादमिक शिक्षण से कम नहीं होता। वह स्वयं भी शिक्षक रही है। विद्यर्थियो का सही मार्ग दर्शन करना उन्हें बखूबी आता है। इतना ही नहीं विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में वह छोटे बच्चों को भी आमंत्रित करती है। इसके माध्यम से वह बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करने का प्रयास करती है। इनके मार्ग दर्शन में बच्चों से लेकर उच्च शिक्षा के विद्यर्थियो तक के लिए बहुत कुछ होता है। ऐसा करते समय वह एक सुयोग्य शिक्षिका की भूमिका में दिखाई देती है।
लखनऊ के डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में भी उन्होंने अपनी इस भूमिका का बखूबी निर्वाह किया। उन्होंने कहा कि वंचित और अक्षम वर्ग की उपेक्षा नहीं की जा सकती। क्योंकि उनकी उन्नति और उन्हें मुख्य धारा में शामिल किए बिना समग्र विकास की यात्रा पूरी नहीं हो सकती। सभ्यता और राष्ट्र के उत्थान का रास्ता वंचित और उपेक्षित समुदायों के बीच से होकर ही गुजरता है। सिर्फ शिक्षा ही नहीं, जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सबके लिए समान अवसरों की उपलब्धता रहनी चाहिए। दिव्यांग जन को गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा, प्रशिक्षण एवं पुनर्वास के माध्यम से समाज और विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का सराहनीय कार्य चल रहा है।
राष्ट्रीय और सामाजिक विकास उनकी पर्याप्त भागीदारी रहनी चाहिए। समावेशी शिक्षा के प्रयोग से दिव्यांग समुदाय लाभान्वित हो रहा है। निःशक्तता के अलग अलग पक्षों पर शोध करते हुए अपने निष्कर्षों से सरकार को अवगत कराना चाहिए, जिससे दिव्यांगों के विकास, सशक्तीकरण एवं पुनर्वास संबंधी योजनाओं को ठोस, प्रभावी और पारदर्शी ढंग से क्रियान्वित किया जा सके। डाॅ शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय का छठा दीक्षान्त समारोह था। आनन्दी बेन ने कहा कि दिव्यांगों के अन्दर प्रकृति प्रदत्त एक विशिष्ट प्रतिभा व रचनात्मकता होती है। उनमें नैसर्गिक प्रतिभा और दिव्य दृष्टि भी होती है। इन्हें बाधा रहित, अनुकूल एवं सुगम परिवेश प्रदान करना चाहिए।
उन्हें शिक्षण प्रशिक्षण एवं कौशल विकास के अवसर उपलब्ध होने चाहिए। हमारे भीतर उनके प्रति करूणा से ज्यादा कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। राज्यपाल ने दीक्षान्त समारोह के अवसर पर एक हजार एक उपाधि एवं पदक प्राप्त प्रदान किये। इनसे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपने उत्कृष्ट कार्यों द्वारा राष्ट्र निर्माण एवं मानवता के हित में योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हम सभी का दायित्व है कि विश्व के मानचित्र पर भारत को एक महत्वपूर्ण, प्रभावशाली एवं श्रेष्ठ राष्ट्र बनाने में स्वयं को तथा अपने संसाधनों को अर्पित करें।
राज्यपाल ने विभिन्न विषयों में सर्वोच्च अंक हासिल करने वाले छात्र छात्राओं को पदक एवं उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया। राज्यपाल ने जगत्गुरू श्री रामभद्राचार्य तथा भगवान महावीर विकलांग सहायता समिमि, जयपुर के संस्थापक पद्म भूषण देवेन्द्र राज मेहता को डी लिट की मानद उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया।
मुख्य अतिथि श्री रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट के संस्थापक एवं कुलाधिपति जगद्गुरू श्री रामभद्राचार्य ने आशीर्वचन में कहा कि दिव्यांगता अभिशाप नहीं, प्रसाद है। इससे आन्तरिक शक्ति का पता चलता है। विद्यार्थी शिक्षा की गरिमा को समझें। राष्ट्र को देवता मानते हुए अपने कर्म से भगवान की पूजा करें, यही राष्ट्र प्रेम है। दिव्यांगजन सशक्तीकरण एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री अनिल राजभर ने कहा कि दिव्यांग लोग प्रकृति की विशेष संतान हैं। दिव्यांगों की विशेष स्थिति को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिव्यांग नाम दिया है।







