प्रीतिपूर्ण संवाद की वैदिक परंपरा

0
220

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित वैदिक वांग्मय के साथ ही आधुनिक विधाई प्रक्रिया के भी विशेषज्ञ है। वह पांच बार विधानसभा चुनाव में विजयी रहे। एक बार विधानपरिषद में रहे। इस रूप में उन्होंने संवाद का महत्व समझा,उस पर स्वयं अमल भी किया। संवाद का अध्ययन करते हुए वह वैदिक साहित्य तक जाते है। उस समय की सभा व समिति का अध्ययन करते है। यह निष्कर्ष निकलते है कि सभा व समिति में केवल संवाद ही नहीं बल्कि प्रीतिपूर्ण संवाद होता था। इसी के माध्यम से मतभेद का समाधान निकाला जाता था। विधानसभा में वह ऐसा ही माहौल बनाने का प्रयास करते है।

वह कहते है कि भारतीय चिंतन में संवाद का बहुत महत्व रहा है। यह हमारे दर्शन का अत्यंत सहिष्णु पक्ष रहा है। समाज का गठन संवाद से होता है। प्रकृति भी संवाद करती है। आकाश की तरफ देखने से लगता है कि चंद्रमा अक्सर तारों से बात करता है। आकाश गंगा भी संवाद के अनुरूप देखी गई। इसे आकाश की गंगा कह कर सम्मानित किया गया।

विश्वमित्र व गंगा के बीच संवाद होता है। विश्वमित्र ने कहा कि आप पृथ्वी पर आइए। गंगा कहती है कि मैं वैसे ही नीचे आती हूँ जैसे मां बच्चों को दूध पिलाती है। इस तरह संवाद से गंगा माता हो गई। यहां पशु पक्षियों के बीच भी संवाद को जाना पहचाना गया। इस संवाद से पशु पक्षियों के प्रति करुणा का भाव जागृत हुआ। काक भुसुंडि का संवाद प्रसिद्ध है। शिव पार्वती का संवाद अमर है। सभा समिति जैसी संवाद संस्थाएं वैदिक काल में रही है। आधुनिक प्रजातंत्र में ऐसी संस्थाए है। लेकिन वैदिक सभा समिति में प्रीति पूर्ण संवाद होता था। अब उसका अभाव है। पूरा वैदिक साहित्य संवाद पर आधारित है। प्रकृति,वायु,नदी आदि सभी में छंद,ताल,लय है।

ऋषियों ने इसे देखा,समझा। इस प्रेरणा से मनुष्य के जीवन को लयबद्ध करने पर संवाद किया गया। इसके लिए ही धर्म की स्थापना की गई। लेकिन हमारे यहां धर्म पर भी संवाद होता है। हमारी धर्म संस्कृति में प्रत्येक संशय का समाधान संवाद से होता है। हमारे यहां ईश्वर के दर्शन की जिज्ञाषा है। ऋग्वेद की शैली संवाद की है। विज्ञान और भारत के धर्म में के बीच अलगाव नहीं है। दोनों मिल कर आगे बढ़ें। ऋग्वेद में मधु शब्द प्रसन्नता उत्साह के लिए प्रयुक्त किया गया। इसमें वार्ता, संवाद, जल प्रकृति ,ज्ञान, अभिलाषा आदि सभी के मधु होने की कल्पना की गई। भारतीय संस्कृति, सभ्यता ,विचार, जीवन मूल्यों के अनुरूप होने वाले कार्य अनुष्ठान बन जाते है। यह हमको लोकरंजन की ओर ले जाती है। ऐसा जीवन ही समाज के अनुकूल होता है।

संवाद के माध्यम से विश्व की अनेक ज्वलंत समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। मानव जीवन ही नहीं प्रकृति व पर्यावरण के कष्टों का निवारण किया जा सकता है। इससे मधु अभिलाषा फलीभूत होगी, जिसका उल्लेख वेदों में हुआ है। प्राचीन सूक्तियों से वर्तमान की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया जा सकता है। हमारे ऋषियों ने अपने विचार किसी पर थोपे नहीं। दुनिया के अन्य देश जब दर्शन विज्ञान से दूर थे,वहां सभ्यता का विकास नहीं हुआ था, उसके हजारों वर्ष पहले भारत में वेदों की रचना हो चुकी थी।अंग्रेजो के आने से भारत राष्ट्र नहीं बना।

उनके आने से हम ज्ञानी नहीं हुए। बल्कि उनके कारण से हमारी संस्कृति को नुकसान हुआ। भारत विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र है। यूरोप में तेरहवीं शताब्दी में नेशन का विचार आया। भारत में ईशा के पांच हजार पहले राष्ट्र का स्पष्ट विचार है। वेदों में अनेक बार राष्ट्र शब्द का प्रयोग किया गया। राष्ट्र के इस विचार को किसी ने समाज पर थोपा नहीं बल्कि संवाद से ही यह अवधारणा विकसित हुई।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here