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    Home»उत्तर प्रदेश

    आशा परखेंगी नमक की गुणवत्ता

    By October 20, 2018 उत्तर प्रदेश No Comments4 Mins Read
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    वर्ल्ड आयोडीन डेफिशियेंसी डिसऑर्डर डे- 21 अक्टूबर, 2018: आयोडीन की कमी से होने वाले विकार के लिए आयोडीनयुक्त नमक का प्रयोग करना ही एक सरल उपाय है

    लखनऊ, 20 अक्टूबर 2018: आयोडीन हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। गर्भवती के लिए तो यह बेहद जरूरी है। आयोडीन की कमी के कारण जन्म लेने वाले शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास पर असर पड़ता है।

    वास्तव में घर का नमक खाने योग्य है या नहीं और उसमें आयोडीन की मात्रा कितनी है इसकी सटीक जानकारी किसी को पता नहीं चल पाती।

    बता दें कि स्वास्थ्य विभाग ने इसके लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब तराई क्षेत्र में आशाएं घर -घर जाकर आई किट से नमक में आयोडीन की गुणवत्ता परखेंगी। इसके लिए आशाएं घर में उपयोग में लाए जाने वाले नमक का किट के माध्यम से परीक्षण कर घर के सदस्यों को उसके बारे में बताकर जागरुक करेंगी।

    राष्ट्रीय आयोडीन अल्पता विकार नियंत्रण कार्यक्रम (एनआईडीडीसीपी) के जारी किए गए 2018 के दिशा निर्देश के अंतर्गत आशाओं को अपने कार्य क्षेत्र में प्रत्येक माह एक साल्ट टेस्टिंग किट उपलब्ध कराई जाएगी, जिसके द्वारा 50 घरों के नमक की जांच की जाएगी। उपकेंद्र/प्राथमिक/सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संबन्धित आशा संगिनी/एएनएम के द्वारा आशा को नमक के नमूने की जांच के सत्यापन के बाद आशाओं को भुगतान भी किया जाएगा।

    आयोडीन की कमी से होने वाले विकारों को 5 प्रतिशत से कम करने का लक्ष्य और घरेलू स्तर पर सामान्य नमक के स्थान पर आयोडीन नमक का सेवन सुनिश्चित करने के लिए इस कार्यक्रम को सभी राज्यों/ केन्द्र शासित प्रदेशों की सम्पूर्ण आबादी पर लागू किया गया।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक गर्भवती महिलाओं के लिए 200-220 माइक्रोग्राम आयोडीन प्रतिदिन जरूरी है। स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए 250 से 290 माइक्रोग्राम, एक साल से छोटे शिशु के लिए 50-90 माइक्रोग्राम प्रतिदिन, एक से 11 वर्ष तक के बच्चों के लिए 90-100, किशोरों और वयस्कों के लिए 150 माइक्रोग्राम प्रतिदिन आयोडीन जरूरी है।

    डफरिन अस्पताल के डॉ. सलमान बताते हैं कि आयोडीन की कमी से जुड़े विकार जिसे आयोडीन डेफ़ीशिएंसी डिसोर्डर भी कहते हैं। आयोडीन की शरीर में थाइरोइड हारमोन के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसका असुंतलन बच्चे के विकास, व्रद्धि व मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है। बच्चे का बौद्धिक स्तर व उसका मेंटेनेंस आयोडीन की मात्रा पर निर्भर करता है। इसलिए जब महिला गर्भवती होती है तब उसके थाइराइड की जांच की जाती है ताकि बच्चे में किसी प्रकार की कमी न हो पाए। बच्चे के जन्म के तीसरे दिन से लेकर पांचवें दिन के बीच कंजेनाइटल हाइपोथायरायडिज्म की जांच की जाती है। अगर इसमें कमी होती है तब उसका इलाज समय से जरूरी होता है क्यूंकि अगर समय से इलाज नहीं हुआ तो बच्चा शारीरिक व मानसिक रूप से अपांग हो सकता है।

    उन्होंने कहा कि, आयोडीन एक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व है और एक व्यक्ति को सामान्य वृद्धी और विकास के लिए प्रतिदिन 100-150 माइक्रोग्राम आयोडीन की आवश्यकता होती है। आयोडीनयुक्त नमक का उपयोग, इससे होने वाले विकार को रोकने का एक सरल और सस्ता उपाय है। आयोडीन अनाज, दालों, ताजे खाद्य पदार्थ, दूध, मछली, समुद्री जीव, अंडे और नमक में मिलता है।

    अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के विपरीत, आयोडीन की कमी, पानी, मिट्टी और खाद्य पदार्थों में आयोडीन की प्रचुर मात्रा के ना होने के कारण होती है और उस भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले सभी लोगों को प्रभावित करती है। भारत में एक आम व्यक्ति और स्कूली बच्चों में होने वाले घेंघा रोग की कुल दर बहुत अधिक है। इसी के साथ आयोडीन की कमी के कारण जन्मजात बच्चों में मानसिक विकृति की संख्या बहुत अधिक है। इसके जोखिम को कम करने के लिए, नमक के साथ आयोडीन को मिलाया गया है।

    एन.ऍफ़.एच.एस.4 के आंकड़ो के अनुसार भारत में 91 प्रतिशत परिवार आयोडीनयुक्त नमक का सेवन करने लगे हैं हालांकि पर्याप्त मात्रा में आयोडीनयुक्त नमक का सेवन करने वाले परिवार केवल 71 प्रतिशत ही हैं।

    नवजात केमिकल हाइपोथायरायडिज्म (एन.सी.एच) की घटनाओं को निर्धारित करने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों से 22,000 नवजात शिशुओं के साथ किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि एनसीएच की घटनाएं दिल्ली और केरल जैसे राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में आयोडीन की कमी वाले स्थानीय जिलो में सौ गुना अधिक थी।

    1962 में भारत सरकार ने केंद्रीय वित्त पोषित राष्ट्रीय घेंघा रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनजीसीपी) का शुभारंभ किया। शुरूआत में इस कार्यक्रम का उद्देश्य उप हिमालयी इलाके के ‘घेंघा प्रभावित क्षेत्र’ में रहने वाले लोगो के लिए आयोडीन नमक प्रदान करना था। अगस्त 1992 में राष्ट्रीय घेंघा रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनजीसीपी) का नाम बदलकर राष्ट्रीय आयोडीन अल्पता विकार नियंत्रण कार्यक्रम (एनआईडीडीसीपी) कर दिया गया, जिसमें आयोडीन की कमी संबंधी विकारों जैसे मानसिक और शारीरिक मंदता, बहरा-गूंगापन, बौनापन, मृत जन्म और गर्भपात जैसे कारणों को देखा गया।

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