मोदी राज में ग्लोबल होती हिंदी भाषा

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17 सितम्बर: नरेन्द्र मोदी के जन्म दिवस पर विशेष: जरुरत है हिन्दी को आगे बढ़कर ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की भाषा बनाने की


प्रदीप कुमार सिंह

श्री नरेन्द्र मोदी का जन्म 17 सितम्बर 1950 में गुजरात के वदनगर, मेहसाणा जिले में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री दामोदर दास मूलचंद एवं माता का नाम श्रीमती हीरा बेन हैं। श्री नरेन्द्र मोदी के पिता बहुत साधारण व्यक्ति थे, जिनके 6 संतानों के रूप में पांच भाई तथा एक बहन हैं। बालक नरेन्द्र अपने पिता के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय का स्टाल लगाते थे। न्यू इण्डिया के निर्माण के लिए संकल्पित मोदीजी का जन्मदिन सम्पूर्ण भारत में सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयोग से इसी दिन 17 सितम्बर को शिल्पकला कौशल में सर्वोच्च एवं सृष्टि के रचयिता भगवान विश्वकर्मा की जयन्ती बड़े ही श्रद्धा भाव से देश भर में मनायी जाती है। विश्वकर्मा जयन्ती तथा मोदीजी की जयन्ती के अवसर पर भी सभी देशवासियों को दोहरी हार्दिक बधाइयाँ।

हमारा मोदीजी से इस लेख के माध्यम से निवेदन है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रस्ताव पास करवाने की कृपा करें। विश्व में हिन्दी भाषा लगभग 120 करोड़ लोग बोलते तथा जानते हैं। भारत में इनकी संख्या पर लगभग 100 करोड़ है तथा अन्य देशों में हिन्दी बोलने तथा जानने वाले लगभग 20 करोड़ लोग निवास करते हैं। हिन्दी विश्व में संख्या के आधार पर लगभग दूसरे नम्बर की भाषा है। वर्तमान में विश्व के हर कोने में हिन्दी भाषा बोलने वालों की उपस्थिति है। हिन्दी को आगे बढ़कर ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की भाषा बनाने के लिए भी संकल्पित होकर कार्य करने की आवश्यकता है। ग्लोबल सिनेमा के युग में हिन्दी फिल्मों के माध्यम से हिन्दी भाषा कई देशों की कला, संगीत और संस्कृति के लोगों को एक-दूसरे से जोड़कर वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा साकार कर रही है।

दुनिया के ताकतवर देशों के बीच हर मोर्चे पर भारत की धमक बढ़ती जा रही है, इससे हिन्दी भाषा भी ग्लोबल होती जा रही है। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने से देश-विदेश में बसने वाले लगभग 135 करोड़ से अधिक देशवासियों तथा भारतीय प्रवासियों का गौरव तथा सम्मान बढ़ेगा। 24 से 30 सितंबर 2019 तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 74वें सत्र के दौरान पहली बार सतत विकास पर उच्च स्तरीय राजनैतिक फोरम (एचएलपीएफ) का आयोजन (एचएलपीएफ शिखर सम्मेलन) के यूएन के न्यूयार्क स्थित मुख्यालय में किया जा रहा है। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी जी भी भाग ले रहे हैं। इस अवसर पर हमारा सुझाव है कि 24 से 30 सितंबर 2019 तक संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री जी प्रस्ताव रखे तो देशवासियों को अत्यधिक प्रसन्नता होगी। महासभा में वक्ताओं की प्रारंभिक सूची के अनुसार करीब 112 राष्ट्राध्यक्ष, करीब 48 शासनाध्यक्ष और 30 से अधिक विदेश मंत्री महासभा को संबोधित करने के लिए न्यूयार्क पहुंचेंगे।

बालक नरेन्द्र बचपन में शरारती कम साहसी ज्यादा थे। मोदी जी ने एक संन्यासी के रूप में अपने जीवन के अनेक वर्ष भिक्षा मांगकर भोजन खाया हैं। देश के इस ऋण को वह निरन्तर तथा अथक सेवा करके चुका रहे हैं। नरेन्द्र मोदी अब एक नाम नहीं है वरन् इसने लोक कल्याणकारी विकास के रूप में विश्वव्यापी पहचान बना ली है। यह पहचान ‘साफ नीयत तथा सही विकास’ के रूप में निरन्तर आगे की ओर अग्रसर है। मोदीजी कहते है कि वह प्रधानमंत्री नहीं वरन् वह जनता के एक प्रधान सेवक है। मोदीजी ने जनता की सेवा के कार्य से एक दिन भी छुट्टी नहीं ली है। मोदीजी ने हमेशा जीवन में कुछ करने का सपना देखा लेकिन उनके अंदर कुछ बनने का विचार एक बार भी नहींे आया। उन्होंने अब तक जीवन के प्रत्येक क्षण हमेशा पूरी तरह खिलकर तथा खुलकर जीआ है।

आज मोदी के युवा जुनून तथा परिपक्वता से भरे जज्बे से सारी दुनिया आश्चर्यचकित है। गुजरात के एक छोटी सी जगह वदनगर का एक चाय बेचने वाले का गरीब बालक विश्व का एक नया इतिहास लिख रहा है। श्रीकृष्ण की भगवत गीता से मोदीजी जीवन में निरन्तर कर्म करने की सीख ली। मोदी जी के आत्मविश्वास तथा आनंद से भरे ओजस्वी चेहरे से एक कर्मयोगी की पहचान सदैव दिखाई देती है। 69 वर्षीय मोदी जी के ऊर्जावान तथा सदैव नवीन उत्साह से भरे रहने का राज प्रत्येक दिन की शुरूआत प्रातः योग, ध्यान तथा प्राणायाम होकर उपवास तथा भारतीय शाकाहारी भोजन मंे छिपा है।

स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अपने अल्प जीवन काल में ही विश्व समुदाय को न केवल सार्वभौमिक सनातन संस्कृति से परिचित करवाया, बल्कि उससे जोड़ा भी। मोदी जी स्वामी विवेकानंद को अपना मार्गदर्शक मानते हैं। सनातन संस्कृति की सोच को विस्तार देने की प्रक्रिया आज के महानायक नरेन्द्र यानि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कर रहे हैं। जब से उन्होंने देश की बागडोर अपने हाथों में ली है, तब से सनातन संस्कृति की शिक्षा को आधार मानते हुए इसके प्रसार के लिए वे ‘अग्रदूत’ की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। पीएम मोदी न केवल सनातन संस्कृति के ज्ञान को माध्यम बनाकर विश्व समुदाय को जीवन जीने का नवीन मार्ग बता रहे हैं, बल्कि भारत को एक बार फिर विश्वगुरू के रूप में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर इस बात को सबके सामने रखते आए हैं कि हमारी सनातन संस्कृति में विश्व की सभी वर्तमान समस्याओं का भी समाधान है। उन्होंने अपने इस दृष्टिकोण को ‘माय आइडिया आफ इंडिया’ के रूप में कई बार संसार के समक्ष भी रखा है।

”विश्व की हर परंपरा ने सूर्य को महत्व दिया है। भारतीय परंपरा में वेदों में सूर्य को विश्व की आत्मा और जीवन का पोषक माना गया है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन के खतरे से जूझ रहे हैं, ऐसे में हमें इस प्राचीन विचार से आगे का मार्ग ढूंढने की जरूरत है।” 11 मार्च, 2018 को प्रधानमंत्री मोदी ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन की समस्याओं से जूझ रहे विश्व के सामने सनातन संस्कृति द्वारा इस समस्या का समाधान बताया था। उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करने से जलवायु परिवर्तन की समस्या से मुक्ति मिल सकती है। ‘सर्वधर्म समभाव’ से दुनिया में शांति होगी। सत्य, अहिंसा, करूणा, समन्वय, सर्वधर्म समभाव जैसे अनेक तत्व सनातन संस्कृति के आधार हैं। ये ही वे तत्व हैं जिन्होंने बाधाओं के बीच भी हमारी संस्कृति की निरन्तरता को अक्षुण्ण बनाए रखा है। अगर दुनिया सर्व धर्म समभाव यानि सभी धर्मों का सम्मान करने लगे तो संसार में धर्म के नाम पर होने वाले विवाद अवश्य खत्म हो जाएंगे। हमारी संस्कृति पूरे साहस के साथ इस सत्य को मानती है कि ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा मानव जाति एक है।

वसुधैव कुटुम्बकम भारतीय संस्कृति का आदर्श है। इस कथन का अर्थ है- धरती ही परिवार है। यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है। अयं बन्धुरयं नेतिगणना लघुचेतसा। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। इसका अर्थ है- ”यह अपना बन्धु है और यह अपना बन्धु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो सम्पूर्ण धरती ही परिवार है।” प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को अपनी विदेश नीति का मूल आधार बनाया है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की इस नीति को वैश्विक मान्यता मिल रही है और पूरी दुनिया इस अवधारणा को अपनाने की राह पर अग्रसर है। ‘अहिंसा परमो धर्मः’ श्लोक के व्यापक अर्थ हैं। अर्थात अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। पूरी दुनिया में आज जिस तरह से हिंसा का वातावरण है और धर्म के नाम पर मार-काट मची हुई है, इससे मुक्ति का रास्ता इस एक वाक्य ‘अहिंसा परमो धर्म’ में छिपा हुआ है। महात्मा गांधी ने देश को आजाद कराने में अहिंसा को सबसे शक्तिशाली हथियार बनाया था। 2 अक्टूबर को गुजरात में मोहन नाम के एक बालक के रूप में पूरे एक युग का जन्म हुआ था। गांधीजी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में सारे विश्व में मनाया जाता हैं। मोदीजी महात्मा गांधी के अहिंसा, स्वच्छता तथा सेवा के विचारों से अत्यधिक प्रभावित रहे हैं। मोदी जी का विश्वास है कि ‘अहिंसा परमो धर्मः से दुनिया भर में हो रहे कत्लेआम को रोका जा सकता है।

‘दरिद्र’ को ‘नारायण’ मानने से विश्व भर से गरीबी दूर होगी। गरीब और वंचित वर्ग की सेवा को ही भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च धर्म माना गया है। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर इस बात को वैश्विक मंचों पर दोहराते रहते हैं। विश्व के विशेषकर गरीब अफ्रीकी देशों के साथ उन्होंने जिस तरह का नाता बनाया है उसके मूल में यही बात छिपी है। राजनीति सुधारक तथा वोटरशिप योजना के जन्मदाता युवा श्री भरत गांधी अति अधुनिक कम्प्यूटर तथा मशीनी युग के कारण शिक्षित तथा अशिक्षित लोगो में बढ़ती बेरोजगारी तथा गरीबी को जड़ से खत्म करने के लिए भारत सरकार से प्रत्येक वोटर को वोटरशिप देने की मांग निरन्तर कर रहे हैं। इस विचार को देश भर में भारी समर्थन मिल रहा है। भारत सरकार इस दिशा में अनेक योजनाओं के तहत लाभार्थी के बैंक खाते में डायरेक्ट खाते में डायनेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर (टी.बी.टी.) के द्वारा पैसा भेज रही है। लेकिन सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति देश के प्रत्येक वोटर का संवैधानिक अधिकार मानते हुए वोटरशिप को जब लागू किया जायेगा तभी हम राजनीतिक तथा आर्थिक आजादी से युक्त लोकतंत्र की सर्वोच्च अवस्था का अनुभव कर पायेंगे। सरकार को जनता द्वारा भारी बहुमत से चुनी संसद में इस विषय पर शीघ चर्चा करानी चाहिए।

‘नारी तू नारायणी’ अर्थात ईश्वर की जननी भी नारी है। जन्म, पालन-पोषण और दिशा सब नारी से हंै, नारी से ही तो मानवजाति हैं वरना मानव जाति का अस्तित्व कहां? नारी तू नारायणी, वाक्य को उद्धृत करते हुए अक्सर प्रधानमंत्री कहते हैं कि स्त्री शक्ति को सशक्त करना आवश्यक है नहीं तो हमारे अस्तित्व पर खतरा है। उनकी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं में इसकी झलक देखी जा सकती है। वैष्णव जन तो तेने कहिए जे, पीड़ पराई जाने रे गुजरात के संत कवि नरसी मेहता द्वारा रचित भजन है। दूसरों की पीड़ा को जानने वाला ही ईश्वर की संतान कहलाने योग्य है। ये हमारी भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन भी है। गांधीजी का यह प्रिय भजन था। प्रधानमंत्री श्री मोदी के आह्वान पर इस बार 11 सितम्बर से महात्मा गांधी के 150वीं जयन्ती से 2 अक्टूबर तक ‘स्वच्छता ही सेवा अभियान’ की शुरूआत हो गयी है। उन्होंने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि इस बार 2 अक्टूबर को जब बापू की 150वीं जयंती मनायेंगे तो इस अवसर पर हम उन्हें न केवल खुले में शौच से मुक्त भारत समर्पित करेंगे बल्कि उस दिन पूरे देश में प्लास्टिक के खिलाफ एक नए जन-आंदोलन की नींव रखेंगे।

अच्छे विचार सारे विश्व से चारों ओर से आने चाहिए अर्थात आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। यानि हमारे पास चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आते रहे जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रधानमंत्री पूरी दुनिया में घूम-घूम कर अच्छे आइडिया और अच्छे विचारों के भारतीय दर्शन में मानव कल्याण की अत्यन्त उपयोगिता देखते हैं। मोदीजी अपने विदेश दौरों में अक्सर वह ऐसी जगहों पर जाते हैं जहां से अपने देश के लिए कुछ नया तथा समाजोपयोगी आइडिया तथा तकनीक लेकर आ सके।

मुंडकोपनिषद से लिया गया सत्यमेव जयते यह वाक्य स्पष्ट करता है कि सत्य की जीत सदैव होती है। वेदान्त एवं दर्शन ग्रंथों में जगह-जगह सत्य तथा असत्य का प्रयोग हुआ है। सत्य शब्द सृष्टि का मूल तत्त्व है, सदा है, जो परिवर्तित नहीं होता, जो निश्चित है। प्रधानमंत्री मोदी अपने जीवन में इसे अहम स्थान देते हैं। दरअसल राजनीतिक जीवन में ही उन्हें जितनी झंझावतें झेलनी पड़ी हैं उतनी शायद ही किसी राजनीतिज्ञ ने झेली हों, परन्तु जीत सत्य की ही हुई है। गांधीजी ने सत्याग्रह को देश की आजादी के लिए व्यापक रूप से अपनाया था।

‘योग’ से सारा संसार स्वस्थ होगा। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः अर्थात सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहे। योग, ध्यान तथा प्राणायाम की शुरूआत भारत में ही हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा की गई थी। आज के दौर में विभिन्न मानसिक और शारीरिक समस्याओं से निजात पाने के लिए योग एकमात्र अचूक रामबाण दवा के समान है। आज पूरी दुनिया जानने लगी है कि योग करने के कितने फायदे हंै। मोदी के प्रयासों से योग को वैश्विक पहचान मिली है। संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा के अनुसार 21 जून को प्रतिवर्ष सारे विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। आज सारा संसार सनातन संस्कृति के इस योग सूत्र से स्वस्थ होने की राह पर अग्रसर है।

शल्य चिकित्सा का जन्म भी भारत में ही हुआ है। शरीर को ठीक करने वाली इस विधि की शुरूआत सबसे पहले महर्षि सुश्रुत द्वारा की गई। बाद में इसे पश्चिमी देशांे द्वारा अपनाया गया। भारत और गणित के बीच रिश्ता कोई नया नहीं है। यह 1200 ईसा पूर्व और 400 ईस्वी से 1200 ईस्वी के स्वर्ण युग तक जाता है जब भारत के महान गणितज्ञों ने इस क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया था। भारत ने दुनियाँ को दशमलव प्रणाली, शून्य, बीजगणित, उन्नत ट्रिगनोमेट्री यानि त्रिकोणमिति, नेगेटिव नंबर यानि नकारात्मक संख्या, वैदिक गणित और इसके अलावा बहुत कुछ दिया है। सबसे पहले महर्षि आर्यभट्ट ने ही इस दुनिया को शून्य के उपयोग के बारे में समझाया था। इसके अलावा वेदों से हमें 10 खरब तक की संख्याओं के बारे में पता चलता है।

भारत ने ज्योतिष शास्त्र के रूप में दुनिया को एक अनोखी भेंट दी है। संस्कृत भाषा को इस विश्व की सबसे प्राचीन भाषा माना जाता है। भारत ने पहले ही प्रयास में मंगलयान का मंगल गृह की कक्षा में पहुँच जाना बहुत बड़ी उपलब्धि है। जीएसएलबी मार्क 2 इस प्रोजेक्ट के सफल हो जाने से अब भारत सेटेलाइट लांच करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं है। भारतीय इतिहास में ये पहला मौका है जब 100 सेकेंड में पूरी तरह से स्वदेशी अंतरिक्ष चंद्रयान-2 के मिशन ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे हिंदुस्तान को एक सूत्र में बांध दिया था।
चंद्रयान-2 ने गांव और शहर की दूरियां मिटा दी। जाति, धर्म, क्षेत्रवाद और राजनीति की दीवारें गिरा दी। भारत के राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान इसरो के वैज्ञानिक तथा चेयरमैन डा. के. सिवन आज देश के सबसे बड़े नायक बन चुके हैं। हाल ही में चन्द्रयान-2 ने ऐतिहासिक सफलता प्राप्त करके सारी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया है। मोदीजी ने अनूठे तरीके से इसरो के वैज्ञानिकों का उत्साहवर्धन निरन्तर किया। इस ऐतिहासिक सफलता से खेल भावना के साथ एक अध्याय इसरो स्प्रिट का और जुड़ गया है।

भारत माता ने विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोगों को अपनी ममता तथा प्यार भरी गोद में संतानों की तरह का बराबर का संरक्षण सदैव दिया है। यह सार्वभौमिक तथा उदार भावना भारत को सारे विश्व का विश्व गुरू बनाने की राह ले जाती है। भारत की अर्थव्यवस्था एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। अनुशासित तथा कर्तव्यनिष्ठ भारतीय सेना विश्व की चार बड़ी सेनाओं में से एक है। भारत जगत गुरू बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। बहरहाल किसी भी देश की सबसे बड़ी सफलता तब होती है, जब उसकी संस्कृति को दूसरे देश भी अपनाएं। चीन जैसे देश भी भारत की सांस्कृतिक ताकत को मान चुका है। वैश्विक समुदाय का भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षण यह साबित करता है कि आज विश्व में जितनी भी समस्याएं विद्यमान हैं उसका निराकरण हमारी भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित है।

इतिहास के पन्नों में भारत को विश्व गुरू यानी की विश्व को पढ़ाने वाला अथवा पूरी दुनिया का शिक्षक कहा जाता था, क्योंकि भारत देश की प्राचीन अर्थव्यवस्था, राजनीति, संगीत, कला और यहाँ के लोगों का ज्ञान इतना समृद्ध था कि पूरब से लेकर पश्चिम तक तथा उत्तर से लेकर दक्षिण तक सभी देश भारत को जगत गुरू का आदर देते थे। पुनः भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

श्री नरेंद्र मोदी जी ने खेल दिवस 29 अगस्त 2019 के मौके पर फिट इंडिया मुहीम की शुरूआत की है। श्री मोदी ने कहा है कि इस फिट इंडिया अभियान को जन आंदोलन बनाया जाए। इससे खेल में जो युवा खिलाड़ी देश का नाम रोशन कर रहे हैं, इससे उनका हौसला बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि फिटनेस सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने के लिए जरूरी शर्त है। मोदीजी एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसके बारे जितना लिखा जाये वह कम है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यह कहते हुए अपनी पीड़ा व्यक्त की थी कि विश्व के समझदार लोगों ने वैश्विक समस्याओं का समाधान परमाणु बम के रूप में खोजा है। गांधीजी यह भी कहते थे कि एक दिन ऐसा आयेगा जब राह भटकी मानव जाति मार्गदर्शन के लिए भारत की ओर वापिस लौटेगी। भारत के लिए विश्व एक बाजार नहीं वरन् एक परिवार है। परिवार में स्नेह और प्यार होता है। आज राह भटकी दुनिया विश्व गुरू भारत से वसुधैव कुटुम्बकम् तथा जय जगत के सार्वभौमिक विचार से सीख ले रही है। भारत की संस्कृति से वसुधैव कुटुम्बकम् का पाठ पढ़कर निकले करोड़ों युवा देश सहित सारे विश्व में डिसीजन मेकिंग पदों पर असीन होकर विश्व के नव निर्माण में पूरे मनोयोग एवं संकल्पित भाव से संलग्न हैं। विश्व भर में प्रवासी भारतीयों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। निकट भविष्य में वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा साकार रूप लेगी। भारत ही विश्व में शान्ति स्थापित करेगा।

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