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    आखिर लोकतंत्र को वास्तव में किससे खतरा?

    ShagunBy ShagunNovember 5, 2026 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    A weeping Great Nicobar and a smiling 'Ego'!मनोज यादव (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, सपा मुलायम सिंह यूथ ब्रिगेड )

    राजनीति की इस भव्य और विज्ञापनों से सजी बिसात पर इन दिनों एक ऐसा हैरान करने वाला विरोधाभास उभरा है, जिसे देखकर सदियों पुराना मुहावरा ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ भी बौना लगने लगता है। इतिहास गवाह है कि राजा हमेशा अपने महलों के सुरक्षित और संगमरमरी आगोश में बैठता है और अपनी फरियाद लेकर जनता उसकी चौखट पर आती है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के इस आधुनिक और डिजिटल लोकतंत्र का दृश्य पूरी तरह उलट चुका है। आज देश के वे सर्वशक्तिमान हुक्मरान, जिनके हाथों में शासन की सबसे ताकतवर मशीनरी, अथाह वित्तीय संसाधन, केंद्रीय जांच एजेंसियों के अदृश्य शिकंजे और हर एक कानून को अपने पक्ष में मोड़ने का अजेय अधिकार है, खुद सड़कों पर उतरकर व्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और पदयात्राएं करने का स्वांग रच रहे हैं। जिस सरकार के पास देश की हर धड़कन, हर संस्थान और हर नीति को नियंत्रित करने की संपूर्ण क्षमता हो, उसे आखिरकार किस गहरे और अज्ञात भय ने अंदर तक झकझोर दिया कि उसे अपना सिंहासन छोड़कर सड़क के नुक्कड़ पर फरियादी की मुद्रा में खड़ा होना पड़ रहा है?

    इस राजनीतिक ड्रामे की पटकथा तब खुलकर देश की नजरों के सामने आई जब संसद से लेकर सड़क तक देश के अलग-अलग कोनों से बेरोजगारी के मारे करोड़ों युवाओं की आहें, आसमान छूती महंगाई से त्रस्त गृहणियों की सिसकियां और खेत-खलिहानों में कर्ज के बोझ तले पिसते अन्नदाताओं की चीखें गूंजने लगीं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के ताजा आंकड़े और सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईए) की रिपोर्टें इस बात की चीख-चीखकर गवाही देती हैं कि देश में युवा बेरोजगारी की दर किस प्रकार खतरनाक स्तर पर बनी हुई है, जहाँ प्रतिष्ठित सरकारी नौकरियों के विज्ञापनों के बाद निकलने वाली चंद हजार रिक्तियों के लिए भी स्नातक और परास्नातक युवा करोड़ों की संख्या में आवेदन करने को मजबूर हैं।Power on the Streets: Democracy’s Inverted Flow

    दूसरी तरफ, चुनाव आयोग की स्वायत्तता, मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान कथित तौर पर गायब हुए लाखों वोटों के आंकड़ों और केंद्रीय एजेंसियों के पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को लेकर जब विपक्ष ने तीखे और असहज करने वाले सवाल दागे, तो सत्ता पक्ष के भीतर का असहजपन और घबराहट साफ तौर पर सतह पर उभर आई। अपनी प्रशासनिक विफलताओं और जवाबदेही से बचने के बजाय, सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने पूरे देश में आक्रामक रैलियों और विरोध मार्चों का एक ऐसा कृत्रिम सैलाब ला दिया, जिसे देखकर एक पल के लिए ऐसा भ्रम होने लगा मानो देश में शासन किसी और का हो और यह सर्वशक्तिमान दल किसी विकट वनवास या संघर्ष के दौर से गुजर रहा हो। मंचों से ऐसी तीखी और आक्रामक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया, जिसमें विपक्ष को न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है उन्हें देश में नेपाल या बांग्लादेश जैसा अराजक माहौल पैदा करने वाला साजिशकर्ता तक बता दिया गया।

    अगर कागजी विज्ञापनों की चमक-धमक और सरकार द्वारा प्रायोजित आंकड़ों के बुलबुले से बाहर निकलकर थोड़ी देर के लिए इस देश की जमीन की वास्तविक और नग्न तस्वीर पर नजर डालें, तो व्यवस्था की नाकामी की एक-एक परत खुद-ब-खुद उघड़कर सामने आ जाती है। रोजगार के नाम पर युवाओं को केवल कोरे आश्वासन मिले हैं; स्थिति यह है कि देश का युवा आज भी विश्वविद्यालयों की महंगी डिग्रियां हाथ में लिए पेपर लीक के अंतहीन घोटालों, परीक्षा माफियाओं के षड्यंत्रों और भर्ती परीक्षाओं की तारीखों के बीच अपनी जवानी होम कर रहा है। इसी प्रकार, आम आदमी की रसोई पर महंगाई की ऐसी गहरी मार पड़ी है कि दालों, खाद्य तेलों और रसोई गैस सिलेंडर के बढ़ते दामों ने मध्यम वर्ग और गरीब तबके की कमर तोड़कर रख दी है, और ऊपर से हर रोज की जरूरत की वस्तुओं पर लादे गए भारी-भरकम वस्तु एवं सेवा कर ने आम इंसान की सारी बचत को लील लिया है। देश की वे संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाएं, जिन पर हमारे महान लोकतंत्र की रीढ़ और निष्पक्षता टिकने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी थी, वे आज सत्ता के राजनीतिक दबाव के आगे बेबस और असहाय नजर आती हैं।

    न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और स्वतंत्र मीडिया की साख पर जो गंभीर सवाल आज देश और दुनिया के मंचों पर उठ रहे हैं, वे किसी भी स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी खतरे की घंटी से कम नहीं हैं। सबसे विडंबनापूर्ण पहलू तो यह है कि जो दल कभी खुद देश की सड़कों पर ऐतिहासिक आंदोलन करके, हर व्यवस्था को खुली चुनौती देकर सत्ता के इस सिंहासन तक पहुँचा था, आज वही दल विपक्ष के हर वैध सवाल, असहमति और वैचारिक विरोध को ‘देशद्रोह’ या ‘अराजकता’ का कलंकित तमगा दे रहा है। जब-जब हुक्मरान अपनी गिरती हुई अर्थव्यवस्था, भुखमरी सूचकांक की बदहाली और प्रशासनिक विफलताओं को छुपाने में पूरी तरह नाकाम हो जाते हैं, तब-तब वे राष्ट्रवाद और धर्म के भावनात्मक अस्त्रों का सुरक्षा कवच ओढ़कर जनता का ध्यान भटकाने की पुरानी और आजमाई हुई चालाकियां चलते हैं। लेकिन लोकतंत्र केवल इस संकीर्ण बात से कदापि प्रमाणित नहीं होता कि कौन सी पार्टी कितने भारी बहुमत से चुनाव जीतती है या किसके चुनावी कोठार में हजारों करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड का काला-सफेद खजाना भरा पड़ा है।

    लोकतंत्र की असली और अंतिम परीक्षा तो इस बात में निहित है कि क्या इस देश का एक सामान्य, असहाय और गरीब नागरिक भी बिना किसी लाठी-गोली के डर के सत्ता के गलियारों में बैठे राजा की आँखों में आँखें डालकर यह पूछ सकता है कि -“मेरा हक कहाँ है, मेरे बच्चों का भविष्य कहाँ है?” आज जब सत्ता के ये रक्षक खुद सड़कों पर उतरकर पीड़ित होने का यह ढोंग और स्वांग रचने लगे हैं, तो यह इस बात का सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण है कि आम जनता के भीतर सुलगती खामोशी और घुटन अब इतनी अधिक मुखर हो चुकी है कि उसकी सुलगती हुई आंच इन महलों की ठंडी और संगमरमरी दीवारों तक साफ-साफ महसूस होने लगी है। इतिहास इस बात का शाश्वत और निर्मम गवाह रहा है कि जब-जब देश के हुक्मरान अपनी ही जनता के आंसुओं, आहों और बुनियादी सवालों से आँखें फेरकर अपनी झूठी श्रेष्ठता और सत्ता के अदम्य नशे में चूर हो जाते हैं, तब-तब वक्त का ऐसा बेरहम पहिया घूमता है कि बड़े-बड़े और अजेय सिंहासन भी रेत के महल की तरह पल भर में ढह जाते हैं।

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