रसोई की आग, दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के बीच गहरा संबंध; हर जलने की घटना हादसा नहीं, लेकिन हर मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी
दीपक कुमार
भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की खबरों में आग से जलने की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं। कभी रसोई में हादसे के नाम पर महिला की जान चली जाती है, तो कभी नवविवाहिता संदिग्ध परिस्थितियों में जली हुई मिलती है। कुछ मामलों में घरेलू हिंसा से परेशान महिला खुद को आग लगा लेती है। इन घटनाओं के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं, लेकिन एक सवाल बार-बार उठता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा में आग का जिक्र इतनी बार क्यों आता है?
यह सवाल केवल किसी एक अपराध या घटना तक सीमित नहीं है। इसके पीछे घरेलू व्यवस्था, दहेज प्रथा, महिलाओं की आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दबाव और जांच व्यवस्था से जुड़ी कई गंभीर वजहें हैं।
घर और रसोई: जहां सुरक्षा का भरोसा भी खतरे में बदल सकता है
भारतीय परिवारों में लंबे समय से खाना बनाने और घर संभालने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं पर रही है। लकड़ी के चूल्हे, मिट्टी के तेल के स्टोव और गैस सिलेंडर जैसी चीजें घरेलू जीवन का हिस्सा हैं। छोटे घरों, कम जगह और हवा आने-जाने की उचित व्यवस्था न होने से आग लगने का खतरा बढ़ सकता है।
साड़ी, दुपट्टे और ढीले कपड़ों के कारण भी खुली आग के संपर्क में आने पर जलने की आशंका रहती है। ऐसे में रसोई में दुर्घटना होना संभव है। लेकिन यही परिस्थितियां किसी जानबूझकर की गई हिंसा को दुर्घटना बताकर छिपाने की गुंजाइश भी पैदा कर सकती हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि जलने की हर घटना के पीछे हिंसा होती है। जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक मामले की निष्पक्ष और गंभीर जांच हो।
दहेज की मांग और विवाह के बाद बढ़ता उत्पीड़न
महिलाओं के जलने से जुड़ी घटनाओं में दहेज उत्पीड़न का पहलू भी बेहद गंभीर है। कई परिवारों में शादी के बाद भी पैसे, गाड़ी, गहने और संपत्ति की मांग जारी रहती है। मांग पूरी न होने पर महिला को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में महिला दो परिवारों के बीच फंस जाती है। एक तरफ ससुराल में उत्पीड़न और दूसरी तरफ मायके पर आर्थिक तथा सामाजिक दबाव। कई बार बदनामी का डर, बच्चों की चिंता और आर्थिक निर्भरता उसे हिंसक माहौल से बाहर निकलने नहीं देती।
दहेज के लिए बहू को जलाने की घटनाएं इस समस्या का सबसे भयावह रूप हैं। हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि जलने की हर घटना दहेज से जुड़ी नहीं होती और दहेज उत्पीड़न हमेशा आग लगाने के रूप में सामने नहीं आता।
हादसा, आत्महत्या या हत्या: सच तक पहुंचना आसान नहीं
आग से जलने की घटनाओं में सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि वास्तव में हुआ क्या था। कोई महिला रसोई में दुर्घटना का शिकार हो सकती है, कोई लंबे समय से घरेलू हिंसा झेलने के बाद आत्महत्या का प्रयास कर सकती है और किसी मामले में उस पर जानबूझकर हमला भी किया जा सकता है।
इन तीनों परिस्थितियों में चोटें एक जैसी दिखाई दे सकती हैं, लेकिन उनके पीछे की कहानी अलग होती है।
2014 में बीएमसी विमेंस हेल्थ में प्रकाशित नायरीन दारूवाला और उनके सहयोगियों के अध्ययन में दिल्ली और मुंबई के अस्पतालों में भर्ती महिलाओं के जलने की घटनाओं का विश्लेषण किया गया। शोध में सामने आया कि कई मामलों को शुरुआत में दुर्घटना माना गया, जबकि वास्तविक परिस्थितियों को समझने में कई कठिनाइयां थीं। महिलाओं का अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में खुलकर न बता पाना, परिवार के अलग-अलग बयान और फोरेंसिक साक्ष्यों की कमी जांच को जटिल बना सकती है।
इस अध्ययन में दिल्ली के एक बर्न यूनिट में भर्ती 197 महिलाओं में 74 प्रतिशत मामले दुर्घटना, 18 प्रतिशत आत्महत्या और 7 प्रतिशत हत्या के दर्ज किए गए। एक प्रतिशत मामलों को किसी श्रेणी में नहीं रखा जा सका। मुंबई के अस्पताल में भर्ती 86 महिलाओं में 91 प्रतिशत मामले दुर्घटना और 9 प्रतिशत आत्महत्या के थे। वहां हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये आंकड़े वर्ष 2012 के दौरान दो अस्पतालों में किए गए सीमित अध्ययन के हैं। इन्हें पूरे देश के आंकड़े नहीं माना जा सकता।
आंकड़े बताते हैं समस्या की गंभीरता
2009 में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में भारत में आग से होने वाली मौतों का अनुमान लगाया गया था। शोधकर्ताओं के अनुसार, वर्ष 2001 में आग से जुड़ी चोटों के कारण देश में 1.63 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इनमें करीब 1.06 लाख महिलाएं थीं। इनमें भी बड़ी संख्या 15 से 34 वर्ष की उम्र की महिलाओं की थी।
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि ये अनुमान पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज आंकड़ों से लगभग छह गुना अधिक थे। हालांकि ये पुराने आंकड़े हैं और इन्हें वर्तमान स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन इनसे समस्या के व्यापक स्वरूप का पता जरूर चलता है।
2016 में प्रकाशित पद्मा भाटे-देवस्थली और लक्ष्मी लिंगम के शोध में भी इस बात पर जोर दिया गया कि महिलाओं के जलने की घटनाओं को केवल चिकित्सा से जुड़ी आपात स्थिति मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। इनके पीछे घरेलू हिंसा, लैंगिक असमानता और सामाजिक परिस्थितियों की भी जांच जरूरी है।
आत्महत्या के पीछे भी छिपी हो सकती है लंबी पीड़ा
घरेलू हिंसा से जुड़ी हर घटना में किसी दूसरे व्यक्ति का सीधा हमला शामिल नहीं होता। कई बार लगातार अपमान, मारपीट, धमकियों, अकेलेपन और आर्थिक निर्भरता के कारण महिला गहरे मानसिक तनाव में पहुंच सकती है। कुछ परिस्थितियों में वह आत्महत्या जैसा कदम भी उठा सकती है।
लेकिन किसी महिला की आत्महत्या को केवल उसका व्यक्तिगत फैसला मानकर उसके पीछे की परिस्थितियों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है। यह देखना जरूरी है कि क्या वह लंबे समय से हिंसा या प्रताड़ना झेल रही थी और क्या उसे समय पर सहायता मिल सकी थी।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर आत्महत्या को हत्या माना जाए, बल्कि जांच में महिला के साथ हुए पुराने दुर्व्यवहार को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
इलाज के साथ हिंसा के संकेत पहचानना भी जरूरी
जलने की घटना के बाद महिला को तत्काल चिकित्सा सहायता मिलना सबसे जरूरी है। लेकिन डॉक्टरों और अस्पतालों की जिम्मेदारी केवल घावों का इलाज करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें ऐसे मामलों में घरेलू हिंसा के संभावित संकेतों को भी समझना चाहिए।
इसके लिए अस्पतालों, पुलिस, फोरेंसिक विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। महिला को ऐसा सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए, जहां वह बिना किसी डर के अपनी बात बता सके। घटना के पुराने रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और मेडिकल साक्ष्यों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कई बार पड़ोसी और रिश्तेदार घरेलू हिंसा की जानकारी होने के बावजूद चुप रहते हैं। परिवार की इज्जत और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर महिलाओं की पीड़ा को दबा दिया जाता है।
घर महिलाओं के लिए सुरक्षित जगह क्यों नहीं?
आग से जलने की हर घटना की कहानी अलग होती है। कोई हादसा हो सकता है, कोई आत्महत्या और कोई सुनियोजित हिंसा। इसलिए बिना जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है।
लेकिन इन घटनाओं के बीच एक समान चिंता जरूर दिखाई देती है। वह है महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का सवाल। जिस घर को सुरक्षा का स्थान माना जाता है, यदि वहीं महिला अपनी जान और सम्मान को लेकर असुरक्षित महसूस करे तो यह पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
आखिरकार, सवाल केवल यह नहीं है कि कितनी महिलाएं आग से जलकर जान गंवा रही हैं, बल्कि यह भी है कि कितनी महिलाओं की पीड़ा समय रहते पहचानी जा रही है। जब तक दहेज, घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक चुप्पी जैसी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक केवल जलने के घावों का इलाज पर्याप्त नहीं होगा। महिलाओं के लिए घर को सचमुच सुरक्षित बनाना ही इस समस्या का सबसे जरूरी समाधान है।







