12 नवंबर: अमजद खान जन्मदिन विशेष
गब्बर का रोल पहले डैनी को ऑफ़र हुआ था और ‘स्क्रीन’ मैगज़ीन के कवर पर डैनी समेत ‘शोले’ के स्टारकास्ट की फ़ोटोज़ भी छप गई थी। लेकिन डैनी को ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग के लिए अफगानिस्तान जाना पड़ा। तब सलीम ख़ान ने जावेद अख़्तर को अमजद ख़ान के बारे में याद दिलाया
अमजद खान की आज 77वीं सालगिरह है। पेशावर के एक पठान परिवार में पैदा हुए अमजद ख़ान ने अपने करियर की शुरुआत थिएटर की दुनिया से की थी। हालांकि अपने पिता जयंत के साथ उन्होंने बाल कलाकार के रुप में कुछ फ़िल्मों में काम किया था लेकिन 1973 में चेतन आनंद की ‘हिंदुस्तान की कसम’ से उन्होंने अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की।
“यहां से पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रात को रोता है तो मां कहती हैं सो जा बेटे नहीं तो गब्बर आ जाएगा।” अमजद खान ने जिस तरह अपने नेगेटिव किरदार से सबको अपना फैन बनाया, उसी तरह अपने पॉजिटिव किरदारों से सबका दिल जीता। अमजद खान ने अपनी जिंदगी में कई दुख झेले, लेकिन एक घटना ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया था।
आपने ये कहावत तो सुनीं ही होगी कि जिसकी किस्मत में जो होता है उसे वो मिल ही जाता है उसी तरह गब्बर का ये रोल आमजद खान की किस्मत में ही था। दरअसल गब्बर का रोल पहले डैनी को ऑफ़र हुआ था और ‘स्क्रीन’ मैगज़ीन के कवर पर डैनी समेत ‘शोले’ के स्टारकास्ट की फ़ोटोज़ भी छप गई थी। लेकिन डैनी को ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग के लिए अफगानिस्तान जाना पड़ा। तब सलीम ख़ान ने जावेद अख़्तर को अमजद ख़ान के बारे में याद दिलाया।
शोले से खुला किस्मत का ताला
शोले के बाद मानों अमज़द खान की किस्मत के ताले ही खुल गए, हर तरफ बस उनकी ही चर्चा होने लगी। 1975 में अमजद खान को शोले में मौका मिला और गब्बर सिंह की कामयाबी का आप अंदाजा इस बात से ही लगा सकते हैं कि अमजद खान को बिस्कुट बनाने वाली एक कंपनी ने अपने ब्रैंड एम्बैस्डर के तौर पर साइन किया। बॉलीवुड के इतिहास में पहली बाक ऐसा हुआ।

लेकिन कहते हैं ना कि सुख के बाद दुख तो आता ही है। इसी क्रम में अमजद खान एक बार किसी फिल्म की शूटिंग के लिए गोवा जा रहे थे, लेकिन अचानक उनका खतरनाक एक्सीडेंट हो गया जिसके बाद अमजद खान को काफी चोट लगी। कहते हैं कि उस एक्सीडेंट में उनकी 13 पसलियां टूट गई थीं। इस हादसे के बाद अमजद खान की हालत काफी खराब हो गई थी और वो ज्यादा काम नहीं कर पाए।
अमजद खान की पत्नी ने मीडिया को बताया कि वो दिन भी बाकी दिनों की तरह ही था। शाम को 7 बजे अमजद को किसी से मिलना था, तो इसलिए वो कपड़े बदलकर निकल गए। फिर तभी साढ़ें 7 बजे के आस-पास शादाम भागते हुए मेरे पास आया और कहा कि पापा की बॉडी ठंडी पड़ रही है। उन्हें पसीने आ रहे हैं और जाकर देखा तो अमजद बेहोश हुए थे और कुछ मिनटों में उन्होंने सबको अलविदा कह दिया।







