अगर कल को कोई कहे कि दिल्ली मेरी है और यहां 26 जनवरी की परेड नहीं हो सकती तब क्या होगा? दिल्ली सरकार की ओर से दलील दी जा रही है कि दिल्ली का दो बॉस नहीं हो सकता
नई दिल्ली, 23 नवंबर। दिल्ली में सत्तासीन केजरीवाल सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर जारी कानूनी लड़ाई पर केंद्र ने बुधवार को भी अपना पक्ष रखा। केंद्र ने दलील दी कि दिल्ली सिर्फ यहां रहने वालों की नहीं, बल्कि पूरे देश की राजधानी है। उसे ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। साथ ही कहा कि दिल्ली की मंत्रिपरिषद की सलाह उपराज्यपाल (एलजी) पर बाध्यकारी नहीं है। केंद्र भी अपना पक्ष रखेगा। दिल्ली सरकार ने एलजी को दिल्ली का बॉस बताने के हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ मामले की सुनवाई कर रही है।
केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) मनिंदर सिंह पेश हुए। उन्होंने पीठ को बताया कि संविधान और कानून के मुताबिक दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है। विशेष कार्यकारी अधिकार नहीं होने के कारण दिल्ली की सारी जिम्मेदारी केंद्र सरकार वहन करती है। इसी के तहत केंद्र सालाना चार हजार करोड़ रुपये दिल्ली के कर्मचारियों को पेंशन के तौर पर देती है। रही बात चुनी हुई सरकार की तो केंद्र में भी चुनी हुई सरकार है। दिल्ली चूंकि केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए वहां विधानसभा होने के बावजूद मंत्रिपरिषद की सलाह एलजी पर बाध्यकारी नहीं है। दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। दिल्ली का प्रशासन राष्ट्रपति के अधीन है।
दिल्ली पर केंद्र का हक बताते हुए सिंह ने कहा कि वह किसी का नाम नहीं लेना चाहते, लेकिन अगर कल को कोई कहे कि दिल्ली मेरी है और यहां 26 जनवरी की परेड नहीं हो सकती तब क्या होगा? दिल्ली सरकार की ओर से दलील दी जा रही है कि दिल्ली का दो बॉस नहीं हो सकता। यह बात ठीक है। दो बॉस नहीं हो सकते, एक ही होगा और वह है केंद्र। विधानसभा होने के बावजूद दिल्ली राज्य नहीं है, ऐसे में वह पूर्ण राज्य की तर्ज पर अधिकारों की मांग नहीं कर सकता है।







