अमिताभ श्रीवास्तव
शशि कपूर मुंबइया हिंदी सिनेमा के कारख़ाने से निकले ऐसे बिरले अभिनेता थे जिन्होंने कमाया तो मसाला फ़िल्मों से लेकिन बढ़ावा दिया कलात्मक समानांतर सिनेमा को। पृथ्वीराज कपूर के तीन बेटों राजकपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर में शशि को अपने दोनों बड़े भाइयों की तरह सिनेमा में ट्रेंड सेटर होने का गौरव अभिनय या निर्देशन के ज़रिये नहीं मिला लेकिन उन्होंने उसकी भरपाई की कलयुग, जुनून, 36 चौरंगी लेन, उत्सव जैसी फ़िल्में बना कर और अपने पिता के नाम पर पृथ्वी थियेटर को रंगमंच का एक प्रतिष्ठित ठिकाना बनाकर।
एक्टर के तौर पर शशि कपूर को कभी अपने भाई राजकपूर से भी “टैक्सी” का व्यंग्यात्मक ख़िताब मिला था। शशि कपूर एक शानदार शख्सियत के मालिक थे । अपने ज़माने में तो बेहद खूबसूरत सितारों में गिने ही जाते थे , उनकी अदाएं बाद की पीढ़ी के लिए भी मिसाल बनी।
आज भारतीय फिल्म कलाकारों की हॉलीवुड में मौजूदगी की बहुत बात होती है लेकिन बरसों पहले वो शशि कपूर ही थे जिन्होंने मर्चेंट-आइवरी की हाउस होल्डर और हीट एंड डस्ट जैसी फिल्मों में अपना जलवा दिखाया।
बेहद हैंडसम शशि कपूर हिंदी सिनेमा के कामयाब स्टार रहे लेकिन अभिनय के लिए वाहवाही मिली अंग्रेज़ी में मर्चेंट आइवरी की फ़िल्मों या बाद के दौर में न्यू डेल्ही टाइम्स, मुहाफिज़ जैसी फ़िल्मों के लिए। हालाँकि अब देखो तो लगता है कि जब जब फूल खिले जैसी फ़िल्मों में भी उनका काम अच्छा था। मुहाफिज़ का नूर शाहजहानाबादी तो जैसे एक कलाकार के तौर पर सर्वश्रेष्ठ हासिल कर लेने के बाद शशि कपूर के हाशिये पर चले जाने का ही प्रतीक लगता है।
दीवार यूँ तो अमिताभ बच्चन की ही फ़िल्म है लेकिन शशि कपूर की भी बेहतरीन फ़िल्मों में से है। भाई भाई की लड़ाई में माँ तो शशि कपूर के हिस्से में ही आई थी और ये जताने बताने वाला उनका संवाद – मेरे पास माँ है- आज भी यादगार माना जाता है ।
दीवार में शशि कपूर के हिस्से में कई अच्छे सीन आये । एक सीन शशि कपूर के अभिनय के लिए पसंद है जब वह अपनी मां निरूपा राय को ये बताने की कोशिश करते हैं कि अब उनके पति यानी शशि और अमिताभ के पिता नहीं रहे। कुछ बोलते नहीं बस सिंदूर लगाने जा रही माँ की डिबिया ज़मीन पर बिखेर देते हैं।
दीवार के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का पुरस्कार भी मिला। पद्म भूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित शशि कपूर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका था ।
31 साल पहले फिल्मकार रमेश शर्मा ने पत्रकारिता से जुडी एक बहुत शानदार फिल्म बनायी थी – न्यू डेल्ही टाइम्स. फिल्म का मुख्य चरित्र एक पत्रकार था- एक अख़बार का संपादक . विकास पांडे नाम के इस किरदार की भूमिका शशि कपूर ने निभाई थी जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. फिल्म में प्रेस फोटोग्राफर बने एम के रैना एक सीन में संपादक बने शशि कपूर को नसीहत सी देते हुए एक बहुत दिलचस्प और मानीखेज़ संवाद बोलते हैं – तुम और मैं, लोगों को सिर्फ एंटरटेन करते हैं। हम लोग दूसरों को नंगा करके अपना और दुनिया का दिल बहलाते है. तुम्हारी मुश्किल जानते हो क्या है- तुम लोग एडिटोरियल में छींकते हो और चाहते हो कि सरकार को ज़ुकाम हो जाये।
अपना समय गुज़र जाने के सच को स्वीकार कर लेने के बाद एक शालीन शांत इंसान की तरह उन्होंने अपने आपको सार्वजनिक चमक-दमक से समेट लिया।
इस साल जनवरी के महीने में गुज़रे अभिनेता ओम पुरी को श्रद्धांजलि देने आए शशि कपूर को देखना बहुत मार्मिक था. ओम पुरी और शशि कपूर ने इस्माइल मर्चेंट के निर्देशन में फिल्म मुहाफ़िज़ (अंग्रेज़ी में In custody ) समेत कई फिल्मों में साथ काम किया था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तम्भकार है)







