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    आइए दिल से स्वागत करें बसंत ऋतु का: मनाएं उमंग और उल्लास का उत्सव

    By January 28, 2020Updated:January 28, 2020 Basant No Comments5 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    बसंत ऋतु की शुरुआत इस बार 30 जनवरी से प्रारंभ हो रही है माघ मास की पंचमी तिथि को पड़ने वाली स्वरस्वती पूजा से इसकी शुरूआत करने का नियम से हमारे भारत वर्ष में हर्षोउल्लास से मनाया जाता है। वसंत पंचमी भारतीय जनजीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। वसंत ऋतु के आभास के साथ ही साथ मानो प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। धरती एवं प्रकृति से लेकर पशु-पक्षीयों तक में भी एक हर्ष उल्लास का संचार होने लगता है।

    वसंत पंचमी का पर्व हमारी भारतीय परम्परा में देवी स्वरस्ती की पूजा अर्चना मुख्य रूप से ज्ञान और बुद्धि की देवी को समर्पित है। वसंत पंचमी के दिन मुख्य: रूप से शिक्षा से संबंध रखने वाले लोग पूरे श्रद्धा भाव से विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि आज के दिन ब्रह्मा जी के जीर्भा से सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ था। ब्रह्मा ने ही सरस्वती को वागीश्वरी, वीणावादिनी, शारदा आदि के नामों से संबोधित किया था , जिसकी वजह से सरस्वती ज्ञान और बुद्धि की देवी होने के साथ ही साथ देवी स्वरस्ती जी के द्वारा संगीत की उत्पति होने के कारण वह संगीत की देवी भी हैं। वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्मदिन जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।

    हमारे वैदिक ग्रन्थ के ऋग्वेद में देवी सरस्वती को परम ज्ञान एवं मानव जाति के चेतना स्वरूपा के तौर पर उनके आराधना करने का हमरे समाज में प्रचलन है। वसंत पंचमी का दिन हमें भारतीय इतिहास के गौरवशाली राजा पृथ्वीराज सिंह चौहान की स्मरण दिलाता है। इस दिन पृथ्वीराज सिंह चौहान ने मोहम्म्द गौरी को अंतिम बार पराजित किया था।


    बसंत का सौन्दर्य:

    बसंत के आगमन के साथ ही ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाता। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने के सुख की अनुभूति करते हैं।
    सच कहें तो प्रकृति तो मानों उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब बसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। नवगात, नवपल्ल्व, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षणा बना देता है।

    वसंत पंचमी के दिन महाकवि निराला का जन्म: 

    वसंत पंचमी के दिन हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का भी याद दिलाती है। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म वसंत पंचमी के दिन ही वर्ष1899 में हुआ था। महाकवि निराला के ह्रदय में निर्धनों के लिए आपर प्रेम और श्रद्धा थी। राष्ट्रकवि निराला निर्धनों के बीच वस्त्र और धन का वितरण करते आये थे। इसी कारण उन्हें ‘महाप्राण’ की उपाधि भी मिली थी। हिन्दी साहित्य जगत के कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिंदी साहित्य में प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास एवं निबंध भी लिखे हैं लकिन उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के क्षेत्र में है।

    उनकी एक कहानी संग्रह लिली में उनकी जन्मतिथि 21 फ़रवरी 1898 अंकित की गई है। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 में प्रारंभ हुई। उनका जन्म का दिन रविवार था इसलिए वे सुर्जकुमार भी कहलाए। उनके पिता पंण्डित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का गढ़कोला नामक गाँव के निवासी थे।

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    महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। बाद में वे हिंदी, संस्कृत एवं बंगला जैसी भाषों का स्वतंत्र रूप से अध्ययन किया था। उनके पिता की छोटी-मोटी नौकरी में कार्यरत थे जिसकी वजह से उनको अनेको असुविधाओं और मान-अपमानों से परिचित अपने जीवन के प्रारमभिक दिनों सामना करना पड़ा था । उन्होंने दलित-शोषित किसान जैसे लोगो के साथ हमदर्दी रखने जैसा संस्कार अपने अबोध मन कल से ही उनके अंदर समाहित थे । तीन वर्ष की अवस्था में ही उनके माता का और उनके बीस वर्ष तक की आयु कल तक पहुँचते -पहुचते ही पिता का भी देहांत हो गया था।

    उनके ऊपर बाल्यावस्था से ही स्वमं के भार सँभालने के साथ ही साथ उनके संयुक्त परिवार का भी बोझ निराला को उठाना पड़ा। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ उनकी पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि उनके चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। शेष बचे परिवार का भार उठाने में उनकी महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। जिसकी वजह से उनका संपूर्ण जीवन आर्थिक-संघर्ष में ही ब्यतीत हुआ।

    सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह थी कि उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांत को त्यागकर समझौते का रास्ता कभी नहीं अपनाया था,जीवन का उत्तरार्द्ध में बीता। वहीं दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में 15 अक्टूबर वर्ष 1961 को उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की।

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