साल 1990 से 2000 तक का भारत याद कीजिए। शादी-ब्याह, जन्मदिन या वैवाहिक वर्षगांठ – किसी भी मांगलिक कार्यक्रम को अधूरा माना जाता था अगर वहाँ वीसीआर न पहुँचा हो। यह सिर्फ एक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट नहीं था, बल्कि खुशियों की दुकान और मनोरंजन का भगवान बन चुका था।
जनवासे में वीसीआर का जलवा
शादी के जनवासे में दूल्हा पक्ष के साथ वीसीआर पहुँचना लगभग अनिवार्य था। लोग पंगत खाते ही टेबल-टॉटपट्टी छोड़कर नेवार की संकरी चारपाई को वीसीआर वाले कोने के पास घसीट लेते। फिर शुरू होता तीन शो का सिलसिला -एक मिथुन, एक अमिताभ और एक भोजपुरी फिल्म। आँखें लाल होने तक लोग देखते रहते।
बारात जाने का साधन न मिले तो भी लोग साइकिल पर वीसीआर-वीडियो के नाम पर निकल पड़ते। दूसरे गाँव के बिना बुलाए लोग टॉर्च और छह फुटिया लाठी लेकर दो-तीन किलोमीटर पैदल चलकर सिर्फ वीडियो देखने आ जाते। नैतिकता इतनी थी कि दावत की तरफ मुँह भी नहीं करते थे – खड़े-खड़े घंटों फिल्म देखकर चुपचाप लौट जाते।
वीसीआर: मेहमान रोकने का भी हथियार
किसी बारात में वीसीआर न गया हो तो तीसरे दिन जरूर आ जाता। मेहमान पूछते – “कहो, वीसीअरवा कल आई कि हमहन जाईं…” यानी वीसीआर मेहमानों को रोकने का सबसे असरदार तरीका था। वीसीआर लगाने का समय आमतौर पर रात 8 बजे के बाद ही रखा जाता, क्योंकि पहले लगा दो तो बिना बुलाए पड़ोसी गाँव के लोग उमड़ पड़ते। बिजली भी सिर्फ रात को आती थी, सो मेल बैठ ही जाता।
स्टेटस सिंबल और रोजगार दोनों
घर पर वीसीआर लगवाना उस समय बड़ा स्टेटस सिंबल था। जिसके पास काम न हो, वह वीडियो-वीसीआर चलाने का धंधा पकड़ लेता। वीसीआर चलाने वालों की खूब इज्जत होती। और जो सिंकारा, होंडा या राजदूत के विज्ञापनों को रिमोट से आगे बढ़ा दे – उसे तो छोटा-मोटा वैज्ञानिक मान लिया जाता! कई तो वीसीआर की आड़ में अपनी मोहब्बती सेटिंग भी कर लेते थे।
अवसान की ओर
साल 2000 तक आते-आते कलर टीवी और वीसीआर अधिकांश ड्राइंग रूम में पहुँच चुके थे। कोई अगर वीडियो कैसेट लेकर आता तो लोग उसे बड़ा आदमी समझने लगते – “इसके घर वीसीआर है!” लेकिन तभी वीसीडी-डीवीडी सस्ते दामों पर दस्तक देने लगे और वीसीआर धीरे-धीरे विदा होने लगा।
टेप रिकॉर्डर का भी था अपना जमाना
उसी दौर में टेप रिकॉर्डर का क्रेज भी कम नहीं था। लोग गाने भरवाने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते। लेकिन समय बदल गया। अब पेनड्राइव, मोबाइल मेमोरी और ढेर सारे ऐप्स हैं।
बहरहाल, उस दौर को याद करें तो कहना गलत न होगा – वीसीआर उस समय मनोरंजन का भगवान और खुशियों की असली दुकान था।
- प्रस्तुति : नीतू सिंह






