Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 578 ज़िन्दगी को इतनी गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं दोस्तो, यहाँ से जिंदा बच कर कोई नहीं जा पाता .. ? राजा भी नहीं … ! महाराजा भी नहीं …. !! -चंद्रकांत त्रिपाठी
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन