- “मजबूर पत्रकारों की भीड़ और इतने आये वज़ीर”
- मठाधीशों ने अपने-अपने मठों को सियासी हनक के मुलम्मे से चमकाया, किया शक्ति प्रदर्शन
-नवेद शिकोह
लखनऊ, 02 मई। मजदूर दिवस आखिर क्यों मनाते हैं पत्रकार ! क्या पत्रकार मजदूर हैं! मजाक में किये गये किसी के इस सवाल का जवाब काफी संजीदा है। आज का ज्यादातर पत्रकार मजदूर नहीं है। मज़दूरों से भी बदतर है। पत्रकार मजदूर नहीं ऐसा मजदूर है जो हर मजदूर से ज्यादा मजबूर है।
क्योंकि मजदूर हर सुबह मजदूर मंडी में खड़ा होकर एक दिन की मजदूरी तो पा ही लेता है लेकिन पत्रकारिता के पेशे की मंडी तबाह हो रही है।
मालिक की सब्जी लाने से लेकर, लाइजनिंग, ब्लैकमेलिंग, दलाली, सप्लाई, पेड न्यूज… के समझौते में अगर आप अपना जमीर नहीं बेचते हैं तो पत्रकारिता का शोक़ आपका घर बिकवा सकता है।
ठेकेदारी की पत्रकारिता में नौकरी बचाने के लिए हमें हर शर्त मानने को तैयार रहना पड़ता था, और अब तो गजब के हालात हैं। अगर दलाली वाली पत्रिकारिता हमें नहीं आती तो हम पन्द्रह हजार रूपये की तनख्वाह पर भी नौकरी करने लायक नहीं है।

यही सब कारण थे कि पत्रकारों का एक बड़ा हुजूम सौ-दो सौ से लेकर दो-तीन हजार कापी छापने वाले छोटे-मझोले अखबारों से दो वक्त की रोटी तलाशने लगा। अपनी पत्रकारिता, अपना रोजगार और अपना घर बचाने का रास्ता खोजने वाले पत्रकारों के बड़े हुजूम इन लोकल अखबारों की तरफ तेजी से भागने लगे।
पत्रकारिता देश के चंद बेपनाह दौलतमंद बिजनेस घरानों की गुलाम ना बन जाये। लक्ष्मी का कद सरस्वती से आगे ना बढ़ जाये। मीडिया की लगाम को अपने हाथ में लेकर पूंजीपति लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपने स्वार्थ की दिशाओं में हांकने ना लगें। देश के चंद दौलतमंदों के हाथ मे कैद मीडिया की फिक्र तो सरकारों को भी करनी चाहिए है।
जैसे देश की संस्कृति को अपसंस्कृति से बचाने के लिए 4-5 दर्शको वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम को 4-5 लाख का आर्थिक सहयोग देती हैं सरकारें। वैसे ही दो सौ से दो हजार कापी वाले अखबारों को मामूली से सरकारी विज्ञापनों का सहयोग दे सकतीं थी सरकारें। ये आर्थिक सहयोग एक तरह से छोटे अखबारों की सब्सिडी स्वरूप होता।
लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। सरकारों ने छोटे अखबारों को कभी कोई भी सहयोग नहीं दिया। छोटे/गैर ब्रांड /कम संसाधन वाले संघर्षशील/लोकल/गैर पूंजीपति मालिकों के अखबारों और टाटा-बिरला, अंबानी-अडानी के अखबारों को सरकारी विज्ञापन एक ही नियम से दिये जाते है। ऐसा होना ऐसे है जैसे राखी सावंत और गिरिजा देवी की परफार्मेंस को एक नजरिये से देखे सरकार।
होना ये चाहिये था कि छोटे अखबारों के कम और वास्तविक दो-चार हजार प्रसार वाले अखबारों को सरकार विज्ञापन का सहयोग और प्रेस मान्यता की सुविधा देती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बहुत कम प्रसार पर सरकारी विज्ञापन की दरें इतनी भी नहीं दी जातीं कि लागत का खर्च भी निकल आये। यही कारण रहा कि मजबूरी में छोटे अखबारों को सरकारी विज्ञापन के सहयोग के लिए अपना प्रसार बढ़ा कर प्रस्तुत करना पड़ा।
अब अखबारी कागज पर जीएसटी लागू होने की वजह से उतने ही अखबार के कागज की खरीद और उसकी जीएसटी देय का विवरण देना होगा जितना प्रसार आपने शो किया है।
ये संभव नहीं है। इसलिए देश के 90%अखबारों को जीएसटी निगल लेगा।
एक ही रास्ता है कि प्रदेश सरकारे पत्रकारों के रोजगार को बचाने के लिए छोटे अखबारों के वास्तविक यानी कम प्रसार पर ही सहयोग/सब्सिडी सहयोग 8-10 रुपये सरकारी विज्ञापनों की दरें दे दें। और कम प्रसार वाले अखबारों के पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता बरकरार रहे। क्योंकि ऐसा तो है नहीं कि कम प्रसार वाले अखबारों को राज्य मुख्यालय की खबरों के संकलन की जरूरत नहीं पड़ती है।
सत्तानशीनों/मंत्रियों /उप मुख्यमंत्रियों को मजदूर दिवस पर बुलाने वाले पत्रकार संगठन सरकार के इन नुमाइंदगी के समक्ष उक्त बातें और मांगे रखते तो मजदूर दिवस पर पत्रकार संगठनों के आयोजन सार्थक होते।
लेकिन नियत तो ये थी कि हमारी साड़ी से तुम्हारी साड़ी ज्यादा सफेद क्यों। यानी पत्रकार मठों की मठाधीशी की प्रतिस्पर्धा.. शक्तिप्रदर्शन.. सत्ताधारियों से करीबी रिश्ता बनाने का बहाना।
संगठनों की नियत में अखबार और पत्रकारों के रोजगार बचाने का ढेलाभर भी जज़्बा होता तो मजदूर दिवस पर 3-4घंटे तक चले कार्यक्रमों में दिग्गज सियासतदाओं से चर्चा में कथित दिग्गज पत्रकार उन अहम बातों और मांगों को जरूर रखते जो मैंने ऊपर लिखी हैं।







