जी क़े चक्रवर्ती
सुमेरपुर गावं में एक दर्जी और उसकी बीवी दरजिन रहा करते थे। दोनों बहुत लोभी थे। यदि उनके घर कोई मेहमान आ जाता था, तो उन्हें यह लगने लगता था कि हम पर कोई आफत टूट पड़ी है। एक दिन उनके घर दो मेहमान आ धमके। दर्जी के मन में तो फिक्र हो गई। उसने सोचा कि ऐसी कोई उपाय करना चाहिए कि ये दोनों मेहमान हमारे यहाँ से तुरंत चले जाएं।
उस दर्जी ने घर के भीतर जाकर अपने दरजिन से कहा, ‘सुनो, जब मैं तुमको खूब जोर-जोर से गालियां दूं, तो जवाब में तुम भी मुझे खूब गालियां देना। और जब मैं अपना गज लेकर तुम्हें मारने दौडू़ तो तुम भी आटे वाली मटकी लेकर घर के बाहर निकल जाना। मैं भी तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ूंगा इस तरह से मेहमान समझ जायेंगे कि इस घर में पति पत्नी में बहुत झगड़ा है, और वे बिना कुछ कहे ही तुरंत वापस चले जाएंगे।’
दर्जी की दरजिन बोली, ‘अच्छी बात है।’
कुछ देर के बाद दर्जी दुकान में बैठा-बैठा अचानक दरजिन को खूब गालियां देना शुरु कर किया। उसके जवाब में दरजिन ने भी गालियां देना शुरु कर दिया। उसके बाद उनके आपस का झगड़ा बढ़ते-बढ़ते दर्जी गज लेकर दर्जिन के पीछे दौड़ा। दर्जिन ने आटे वाली मटकी उठाई और बाहर भाग खड़ी हुई।
घर आये मेहमानो ने सोचा कि लगता है यह दर्जी बहुत लोभी प्रकति का आदमी है। यह हमको खिलाना नहीं चाहता, इसलिए यह इस तरह का नाटक कर रहा है। लेकिन हम इसको छोड़ेंगे नहीं। चलो, हम लोग पहली मंजिल पर जाकर वहां सो जाते हैं और मेहमान ऊपर जाकर सो गए। यह मानकर कि मेहमान लोग घर से चले गए होंगे, कुछ देर के बाद दर्जी और दर्जिन दोनों अपने घर को लौट पड़े। मेहमानों को घर में न देखकर दर्जी बहुत प्रसन्न होता हुआ बोला, ‘अच्छा हुआ जो हमारे घर से बला टली।’
फिर दर्जी और दर्जिन दोनों एक-दूसरे की आपस में खूब तारीफ़ करने लगे।
दर्जी बोला, ‘मैं कितना होशियार हूं कि गज लेकर दौड़ पड़ा!’
दर्जिन बोली, ‘मैं कितनी फुरतीली हूं कि तुरंत मटकी लेकर बहार भागी’
मेहमानों ने उन दोनों की बात सुनी ली, और वे ऊपर से ही बोल पड़े,’और हम लोग कितने चतुर हैं कि ऊपर आराम से सोए पड़े हैं।’
यह सुनकर दर्जी-दर्जिन दोनों खिसिया गए। उन्होंने मेहमानों को नीचे बुला लिया और अच्छी तरह खिला-पिलाकर विदा किया।
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