बच्चों की कहानी
नदी के किनारे एक प्राचीन, विशाल बरगद का पेड़ खड़ा था। उसकी घनी छाया और मजबूत शाखाएँ मानो प्रकृति का दिया हुआ महल थीं। इस पेड़ पर सैकड़ों चिड़ियों का परिवार रहता था। उन्होंने अपनी चोंचों से तिनके, घास और कोमल पत्तियों से इतने मजबूत और सुंदर घोंसले बनाए थे कि बारिश हो या धूप, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था।
एक दिन अचानक आकाश में काले बादल घुमड़ आए। तेज हवा चली और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। पक्षी आराम से अपने घोंसलों में दुबके बैठे थे, अपने छोटे-छोटे बच्चों को पंखों से ढककर।
उसी समय पेड़ के नीचे कुछ बंदर खेल रहे थे। वे पानी में भीगकर बुरी तरह काँपने लगे। उनके बाल चिपक गए, ठंड से उनके दाँत बजने लगे। वे एक-दूसरे से चिपटकर गर्मी ढूंढने की कोशिश कर रहे थे।
एक बूढ़ा, समझदार तोता, जो पेड़ की सबसे ऊँची शाखा पर रहता था, उन्हें देखकर बोला, “अरे भाई बंदरों! देखो तो, बारिश में कैसे काँप रहे हो। अगर तुमने पहले से ही हमारी तरह कोई सुरक्षित घर बना लिया होता, तो आज यह हाल नहीं होता। हम छोटे-से जीव हैं, फिर भी अपनी चोंच से तिनके बटोर-बटोरकर घोंसला बनाते हैं। तुम्हें तो भगवान ने दो-दो हाथ और दो-दो पैर दिए हैं। तुम तो पलक झपकते ही अच्छा-सा घर बना सकते हो!”
बंदरों को तोता की यह सलाह बिल्कुल पसंद नहीं आई। उनकी आँखों में गुस्सा चढ़ गया।
एक बड़ा, काला बंदर गरजा, “अरे ओ उड़ने वाले! तू हमें सबक सिखा रहा है? हम जंगल के राजा हैं! तू छोटा-सा कीड़ा हमें उपदेश दे रहा है क्योंकि तुझे घोंसला मिल गया है? ठहर जा, बारिश रुकते ही दिखाते हैं हम अपना हुनर!”
बारिश थमते ही बंदरों का गिरोह पेड़ पर चढ़ गया। वे क्रोध में चीखते-चिल्लाते ऊपर पहुँचे। फिर जो कुछ हुआ, वह बहुत भयानक था। उन्होंने एक-एक करके सभी घोंसलों को तोड़ डाला। सूखे पत्ते और तिनके हवा में उड़ने लगे। छोटे-छोटे अंडे नीचे गिरकर फूट गए। नन्हें पक्षी के बच्चे डर के मारे चीं-चीं करते पेड़ से गिर पड़े।
बेचारे पक्षी इधर-उधर उड़ते हुए चीख रहे थे। माताएँ अपने बच्चों को बचाने के लिए बार-बार नीचे उतर रही थीं, लेकिन बंदर हँसते-हँसते और भी ज्यादा तोड़फोड़ कर रहे थे। जब सब कुछ बरबाद हो गया, तो बंदर नीचे उतरकर हँसते हुए बोले, “देखा? हमने घर कैसे बनाया! अब तुम भी भीगकर काँपो!”
पक्षी उदास होकर इधर-उधर बिखर गए। तोते की आँखों में पछतावा भर आया। उसने गहरी साँस ली और कहा,
“काश! मैं चुप रह जाता… मूर्खों को सलाह देना सबसे बड़ा अपराध है।”
शिक्षा : जब तक कोई माँगे या पूछे ना, तब तक सलाह कभी मत दो। कई बार अपनी बुद्धिमत्ता दिखाने के चक्कर में हम दूसरों के गुस्से को भड़का बैठते हैं। चुप रहना भी एक बड़ी बुद्धिमत्ता है।







