कहा सरकार अपने जारी आदेश में करे संशोधन नहीं तो होगा विरोध
लखनऊ, 07 जुलाई। उप्र सरकार द्वारा सरकारी सेवाओं में दक्षता सुनिश्चित करने के लिये 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के सरकारी कार्मिकों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति करने का जो शासनादेश जारी किया गया है, उस पर आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति ने घोर आपत्ति की है और संशोधन की मांग उठायी है।
संघर्ष समिति की प्रान्तीय कार्यसमिति की बैठक में सरकार पर हमला बोलते हुए कहा गया कि भारत सरकार द्वारा जारी आदेश के बाद उप्र सरकार को दलित कार्मिकों हेतु पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था बहाल करने की कोई चिन्ता नहीं है। वहीं दूसरी ओर अनिवार्य सेवानिवृत्ति का फैसला लेकर दलित व पिछड़े वर्ग के कार्मिकों को पुनः टारगेट किया जायेगा।
संघर्ष समिति के नेताओं ने कहा कि लगभग सभी विभागों में दलित व पिछड़े वर्ग के ज्यादातर कार्मिकों को उन पदों पर तैनात किया जाता है जहां कोई जाने को तैयार न हो और वह नान परफार्मेन्स श्रेणी में आता है। सबसे बड़े दुख की बात तब हो जाती है जब विभागों में समीक्षा बैठक होती है तो उसकी तुलना उन पदों से की जाती है, जिन पदों की परफार्मेन्स अच्छी रही हो और फिर दलित व पिछड़े कार्मिकों को निन्दा व प्रतिकूल प्रविष्टि प्रदान कर उनकी रिर्पोट खराब की जाती है, जो अब अनिवार्य सेवानिवृत्ति का बड़ा आधार बनेगा।
आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति,उप्र के संयोजक अवधेश कुमार वर्मा, केबी राम, डा. रामशब्द जैसवारा, आरपी केन, अनिल कुमार, अजय कुमार, श्याम लाल, अन्जनी कुमार, राकेश पुष्कर, प्रेम चन्द्र, अशोक सोनकर, रंजीत, श्रीनिवास राव, चमन लाल भारती, दयाराम सोनकर, चन्द्र शेखर, सुनील कनौजिया, राहुल ने कहा कि उप्र सरकार को अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश में संशोधन कर उसमें अनिवार्य रूप से यह व्यवस्था की जाये कि हर विभागीय स्क्रीनिंग कमेटी में दलित व पिछड़े वर्ग का कार्मिक अनिवार्य रूप से कमेटी में रखा जाये और यह भी संशोधन आवश्यक रूप से कराया जाये कि उन पदों जहां पर सामान्य वर्ग का कार्मिक कभी भी नहीं जाता। जो नान परफार्मन्गि वाले पद होते है और ऐसे पदों पर दलित व पिछड़े वर्ग के कार्मिक को येन केन प्रकारेण बैठा दिया जाता है और फिर वह दण्ड पाते हैं, के लिये एक भिन्न मानक बनाये जाये और ऐसे पदों पर मिलने वाले दण्ड को स्क्रीनिंग कमेटी अनिवार्य रूप से नजरअंदाज करे। जिससे सही मायने में समानता के आधार पर दक्षता का मूल्यांकन हो पाये।
संघर्ष समिति ने एक उदाहरण पेश करते हुए कहा कि विगत कुछ वर्ष पहले बिजली विभाग में अनेकों दलित अभियन्ताओं को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गयी थी, जिसमें से एक दलित अभियन्ता सुप्रीम कोर्ट तक अनिवार्य सेवानिवृत्ति के खिलाफ लड़ाई लड़ा और अन्ततः वह जीता और पुनः उसे सम्मान के साथ सेवा में रखा गया। जो यह सिद्ध करता है कि दलित कार्मिकों को बदले की भावना से अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जाती रही है।







