सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से पहल न होने से नाराज है आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी
लखनऊ। छह साल से लंबित 69000 शिक्षक भर्ती मामले में आरक्षित वर्ग (पिछड़ा और दलित) के अभ्यर्थियों ने बुधवार को एक बार फिर लखनऊ में अपना गुस्सा जताया। सैकड़ों अभ्यर्थी विधानसभा के सामने धरना-प्रदर्शन करने पहुंचे, लेकिन भारी पुलिस बल ने उन्हें इको गार्डन तक नहीं पहुंचने दिया और जबरन बसों में बैठाकर धरना स्थल से हटा दिया।
आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार की चुप्पी से नाराजगी
अभ्यर्थियों का मुख्य आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से कोई सक्रिय पहल नहीं हो रही। सितंबर 2024 में पहली सुनवाई के बाद से मामला सिर्फ तारीख पर तारीख मिलने तक सिमट गया है। सरकार ने कोर्ट में 3 सप्ताह का समय मांगा था, जो पूरा हो चुका है, लेकिन अभी तक अपना पक्ष ठीक से नहीं रखा गया।

आंदोलनकारी नेता का तीखा बयान
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे धनंजय गुप्ता ने कहा कि “राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट, मुख्यमंत्री द्वारा गठित जांच समिति की रिपोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट की डबल बेंच का फैसला—सब हमारे पक्ष में हैं। फिर भी न्याय नहीं मिल रहा क्योंकि हम पिछड़े और दलित समाज से हैं।”उन्होंने बताया कि रिपोर्ट के अनुसार लगभग 19000 पदों का नुकसान हुआ है। सरकार ने 6800 अभ्यर्थियों की सूची जारी की, लेकिन नियुक्ति नहीं दी। अभ्यर्थी पिछले छह साल से लगातार संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांगें अनसुनी हो रही हैं।
क्या हैं प्रमुख मांगें?
- सरकार सुप्रीम कोर्ट में तुरंत अपना पक्ष रखे।
- आरक्षण विसंगति को दूर कर 19000 खोए पदों पर नियुक्ति हो।
- 6800 अभ्यर्थियों को तुरंत नियुक्त किया जाए।
- मामले का जल्द निस्तारण कर अभ्यर्थियों को न्याय दिलाया जाए।
अभ्यर्थियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई न होने से पूरा आरक्षित वर्ग आहत है। वे चेतावनी दे रहे हैं कि अगर सरकार ने जल्द कार्रवाई नहीं की तो आंदोलन और तेज होगा।
यह भर्ती विवाद यूपी में सालों से सुर्खियों में है और हजारों युवाओं का भविष्य अटका हुआ है। अब देखना होगा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में कितनी तेजी दिखाती है।







