संवाद: स्वास्थ्य सेवाओं का वर्तमान परिदृश्य-दावे और हकीकत
लखनऊ, 15 सितम्बर। स्वास्थ्य सेवाओं को सरकार और डाक्टरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। स्वास्थ्य जन-जन के हक का मुद्दा है। इसके लिए पहले समाज की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना होगा। हक़ के लिए जागरूक हो कुपोषण, दूषित जल और इससे जुड़े अन्य पक्षों को सुधारना होगा। स्वास्थ्य की आयुष्मान योजना बदले नाम वाली योजना और अब तक महज जुमले से अधिक कुछ भी नहीं। जब तक जनता के लिए स्वास्थ्य आर्थिक सामाजिक मुद्दे के साथ ही गंभीर राजनीतिक मुद्दा नहीं बनेगा, तब तक हालात सुधरने वाले नहीं।
ये उद्गार यहां उत्तरप्रदेश प्रेस क्लब में जन विचार मंच की ओर से संवाद शृंखला के अंतर्गत ‘स्वास्थ्य सेवाओं का वर्तमान परिदृश्य-दावे और हकीकत’ विषय पर बोलते हुए दिल्ली सांहस फारेम जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय संयोजक डा. अमित सेन गुप्ता ने व्यक्त किए।
अमित सेन ने कहा कि जनता का स्वास्थ्य एक आइना है। आजादी के सात दशक बीतने की बाद भी स्वास्थ्य की जो स्थिति है वह बताती है कि जरूर बहुत कुछ गलत हो रहा है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य हमारे देश में कभी राजनीतिक मुद्दा नहीं बना, जबकि अमेरिका जैसे देशों में जब यह मुद्दा बना तो इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के साथ ही सामाजिक और आर्थिक मुद्दा बनाने की जरूरत है। गोरखपुर अस्पताल में हुई बच्चों की मौत के प्रकरण को रखते हुए उन्होंने कहा कि इस एक उदाहरण से कमोबेश पूरी देश की स्थिति का आकलन किया जा सकता है। यहां स्वास्थ्य राजनीतिक मुद्दा न बनकर कुत्सित राजनीति का शिकार हो गया और पूरे प्रकरण को बड़ी बेशर्मी ने दूसरी तरफ मोड़ दिया गया।
डा.अमित ने कहा कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए देश की 50 फीसदी से ज्यादा जनता को साफ पानी तक नहीं मिल पाता। कुपोषण एक बड़ी समस्या है पर उसे दूर करने की जगह आज स्वच्छता के नाम पर गरीब वंचित लोगों को लक्ष्य बनाकर प्रताड़ित किया जा रहा है। गांवों में बुनियादी जरूरतें तक पूरी नहीं हो रहीं। न सड़क है न रोशनी है और लोग आज तक स्वास्थ्य के हक को अपना हक या अपना सामूहिक हक़ मान पाए हैं।
उन्होंने कहा कि पहले बुनियानी जरूरतों को पूरा करना और उनके लिए लड़ना होगा। उन्होंने कह कि चिकित्सा के नाम पर निजी अस्पतालों में जो खेल हो रहा है वो किसी अपराध से कम नहीं। सरकारी अस्पतालों-स्वास्थ्य केन्द्रों में स्टाफ और दवाओं की कमी के साथ ही उनकी सेवाओं की दशा किसी से छुपी नहीं, निजी अस्पतालों में अब प्रबंधक डाक्टरों को टारगेट देते हैं जैसे कि इस महीने आपको इतने बाई पास करने ही करने हैं, कीजिए नही ंतो हमारे पास डाक्टर और भी हैं।






