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    अकेलेपन की ओर बढ़ती दुनिया: परिवार की संस्था पर सवाल

    ShagunBy ShagunJune 24, 2026 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    A World Drifting Towards Loneliness: Questions About the Institution of Family
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    आधुनिक युवा शादी को ‘विकल्प’ क्यों मान रहे हैं?

    आज की भागती-दौड़ती जिंदगी में लोग परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। ऐशो-आराम, स्वतंत्रता और कम जिम्मेदारियों वाली जिंदगी का आकर्षण इतना बढ़ गया है कि युवा पीढ़ी विवाह और परिवार जैसे संस्थानों को नजरअंदाज करने लगी है। ब्रिटेन के एक सर्वे में लगभग आधे किशोरों ने शादी को अपनी जिंदगी के लिए जरूरी नहीं माना। भारत में भी यही रुझान तेजी से बढ़ रहा है।

    करियर पहले, शादी बाद में या कभी नहीं

    आज का युवा चमकदार करियर, ऊंची कमाई और लग्जरी लाइफस्टाइल को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। शादी उनके लिए कोई अनिवार्यता नहीं, बल्कि एक विकल्प बनकर रह गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस सोच में युवतियों की संख्या युवाओं से करीब दोगुनी है।

    युवतियां अब ऐसे रिश्ते चाहती हैं जिसमें समझौते कम और बराबरी ज्यादा हो। जब ऐसा पार्टनर आसानी से नहीं मिलता, तो वे सिंगल रहना ज्यादा बेहतर समझती हैं। अनुमान है कि वर्तमान में भारत में सिंगल महिलाओं की संख्या दस करोड़ के करीब पहुंच चुकी है।A World Drifting Towards Loneliness: Questions About the Institution of Family

    फास्ट लाइफ का खतरनाक आकर्षण

    फास्ट फूड, फास्ट करियर और फास्ट एंटरटेनमेंट की संस्कृति ने युवाओं को इस कदर प्रभावित कर दिया है कि वे लंबे समय तक अकेले रहकर मौज-मस्ती भरी जिंदगी बिताने को तैयार हैं। चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी यही स्थिति है, जहां युवा शादी और बच्चे पैदा करने से बच रहे हैं।लेकिन सवाल उठता है – क्या यह रुझान सिर्फ युवावस्था तक सीमित रहेगा? या आने वाली पीढ़ियां जन्म से ही अकेलेपन का सामना करेंगी?

    परिवार की संस्था खतरे में

    परिवार मानव सभ्यता की सबसे मजबूत इकाई रहा है। इसी के सहारे समाज आगे बढ़ता है और सृष्टि का विस्तार होता है। अगर विवाह और जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने की यह सोच जारी रही, तो भविष्य में बुजुर्गों की देखभाल, भावनात्मक सुरक्षा और सामाजिक संतुलन जैसे मुद्दे और गंभीर हो जाएंगे।

    अकेलापन सिर्फ व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकट बनता जा रहा है। कई विकसित देश पहले ही इसकी मार झेल चुके हैं – जहां घटते जन्म दर और बढ़ते अकेलेपन ने सामाजिक ढांचे को हिला दिया है।

    अब समय है सही दिशा देने का

    यह सही है कि युवा स्वतंत्र और महत्वाकांक्षी हों, लेकिन स्वतंत्रता का मतलब जिम्मेदारियों से भागना नहीं होना चाहिए। समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था को मिलकर इस सोच को सही राह दिखानी होगी।

    • बच्चों में परिवार के मूल्यों को बचपन से ही विकसित करना चाहिए।
    • शादी को बोझ की बजाय जीवन की सुंदर जिम्मेदारी के रूप में पेश करना चाहिए।
    • करियर के साथ-साथ भावनात्मक और सामाजिक संतुलन का महत्व समझाना चाहिए।

    आधुनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहुत जरूरी हैं, लेकिन पूर्ण अकेलेपन न तो सुख देता है और न ही समाज को मजबूत बनाता है। सही संतुलन ढूंढना होगा – जहां करियर भी हो और परिवार भी। वरना आने वाली पीढ़ी सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि गहरे अकेलेपन का बोझ भी उठाएगी।

    देखिए अब समय आ गया है कि हम सिर्फ व्यक्तिगत सफलता ही नहीं, बल्कि सामूहिक खुशहाली की भी चिंता करें।

    Shagun

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