कहना मुश्किल है
कि हर वह व्यक्ति
जिसके लिए शोक-सभा की जाती है
उस शोक का हक़दार होता है भी या नहीं
जो शोक उसके लिए मनाया जाता है वह सच्चा होता है या नहीं
और जो उसके लिए शोक मना रहे होते हैं,
उसमें से कितने वाकई शोकार्त होते हैं
और कितने महज़ राहत महसूस करते हुए दुनियादार
बहरहाल, जैसी भी रही हो उस एक ज़िंदगी को
डेढ़-दो घंटों में निपटा देने के बाद
दो मिनट का वह वक़्फ़ा आता है जब मौन रखा जाना होता है
◆ विष्णु खरे (9 फ़रवरी 1940 – 19 सितंबर 2018)







