एक आदर्श प्रेम तपस्या का पच्चीसवां वर्ष, यह अनकही अनसुनी गाथा साधना और सत्य (काल्पनिक नाम) के उस अटूट प्रेम की है, जो आज के दौर में किसी दैवीय चमत्कार से कम नहीं
कहानीकार : अलका शुक्ला
बभरू गांव की उन धूल भरी गलियों में, जहाँ घरों के किवाड़ आज भी मर्यादाओं के लिए जाने जाते हैं, वहां साधना का जीवन एक शांत सरिता की तरह बह रहा था। साधना नाम के अनुरूप ही उसका व्यक्तित्व था। पिता, अरविंद बाबू, जो शहर के प्रतिष्ठित और आदर्शवादी व्यक्ति थे, साधना के लिए किसी जीवित देवता से कम न थे। अरविंद बाबू की वैचारिक स्वतंत्रता और उनके तर्कसंगत उसूलों ने साधना को उस सांचे में ढाला था, जहाँ पिता की आज्ञा पर वह अपनी हर इच्छा की बलि दे सकती थी। वह आज की चंचल लड़कियों जैसी न थी; न उसे पार्टियों का चाव था, न सहेलियों के साथ घंटों व्यर्थ की गपशप। वह अपने परिवार के लिए एक खुली किताब थी, पर उस किताब के अंतिम कुछ पृष्ठों पर जो इबारत लिखी जा रही थी, उसे पढ़ने की सामर्थ्य अभी किसी में न थी।
साल २००१ की वह चार सितंबर की तारीख साधना के जीवन का वह मोड़ था, जहाँ नियति ने एक अदृश्य चित्रकार की भाँति उसके भाग्य के कैनवास पर पहला गहरा रंग उकेरा। उसी दिन उसकी भेंट सत्य से हुई। सत्य, जो पंचमढ़ी की पावन वादियों में योग और वेदों के मर्म को आत्मसात कर रहा था, एक अलौकिक अनुभव का साक्षी बनकर यहाँ आया था। सत्य ने महादेव के धाम में एक ऐसा स्वप्न देखा था, जिसने उसके भविष्य की सुनहरी लकीरों को एक नया मोड़ दे दिया था। स्वप्न में शिव ने उसे एक छवि दिखाई थी और कहा था कि यही तुम्हारी जन्मों की संगिनी है, जन्मों की प्रेमिका है, इसे अपने ही गाँव की गलियों में खोजो।

सत्य के लिए वह स्वप्न कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि परम पिता शिव का एक आदेश था। वह युवक, जिसका सीपीएमटी की द्वितीय काउंसलिंग में चयन हो चुका था, महेश योगी संस्थान पंचमढ़ी में योग, वेद, ध्यान और अध्यात्म में एक होनहार विद्यार्थी के रूप में अपने गुरु श्री माली जी का सबसे प्रिय शिष्य बन चुका था। उसका नाम संस्थान की तरफ से विदेश जाने के लिए संभावित सूची में रख लिया गया था। उसके सामने ऐश्वर्य और सफलता की सेज बिछी थी, उसने सब कुछ एक पल में त्याग दिया। वह किसी विक्षिप्त की भाँति नहीं, बल्कि एक सिद्ध साधक की भाँति साधना की खोज में निकल पड़ा। जब ४ सितंबर को पहली बार दोनों की नजरें मिलीं, तो साधना के मन में भी कुछ भाव उठे थे। उसकी अंतरात्मा ने फुसफुसाकर कहा था कि यही वह है, जिसके पास तुम्हारी रूह की चाबी है।
परंतु, प्रेम का मार्ग कभी फूलों की सेज नहीं रहा। बभरू छोटा सा कस्बा है जहां एक दूसरे के बारे में जानकारियां लेने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। दूसरे दिन ही साधना को ज्ञात हुआ कि सत्य उसकी जाति का नहीं है, तो उसके भीतर के संस्कारों और प्रेम के बीच एक भीषण महायुद्ध छिड़ गया। एक ओर वह प्रेम था जो रूहानी था, और दूसरी ओर पिता का वह मान-सम्मान जिसे वह अपनी जान से बढ़कर मानती थी। साधना ने एक कठोर निर्णय लिया, मौन का वरण! उसने सात वर्षों तक सत्य से हर नाता तोड़ लिया। उसने सोचा था कि यदि वह निष्ठुर बन जाएगी, तो सत्य उसे भूलकर संसार की चकाचौंध में खो जाएगा। यह साधना का महात्याग था। अपने प्रेमी को एक बेहतर भविष्य देने के लिए उसे अपनी ही नजरों में गिरा देना, उससे बड़ा बलिदान और क्या हो सकता था?
इन सात वर्षों में साधना कई बार टूटी फिर भी उसने किसी से कुछ नहीं कहा। पिता के सामने ऐसे खड़ी होती जैसे उसे कोई कष्ट ही न हो। वह नहीं चाहती थी कि उसके पिता के माथे पर चिंता की एक भी लकीर उभरे। फिर वो खुद क्यों न दर्द में जी रही हो।
उधर सत्य, जो अब लखनऊ के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में वरिष्ठ उप-संपादक बन चुका था, अपनी कलम से साधना को परोक्ष रूप से पत्र लिख रहा था। अखबारों में छपने वाली उसकी हर कविता, हर लेख साधना के लिए एक पत्र था एक पुकार थी। सत्य ने अपनी सफलता के ऊँचे सोपानों पर चढ़ते हुए भी अपनी जड़ों को साधना की यादों से सींचना नहीं छोड़ा।
साल २००९ की एक ठिठुरती शाम, साधना के धैर्य का बांध टूट गया। उसने सत्य की परीक्षा लेने की सोची। उसने संदेश भिजवाया कि वह मेरठ के एक हॉस्पिटल में एडमिट है। उस वक्त मेरठ से वो उच्च स्तर की एक डिग्री ले रही थी। सत्य अगली सुबह मेरठ पहुँचा और साधना को स्वस्थ देखा, तो उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक असीम शांति थी। साधना ने उसे चिढ़ाने के लिए मजाक मजाक में कहा “क्यों न हम कोर्ट मैरिज कर लें? आज तो तुम्हारी अच्छी जॉब है, सब आसान होगा।”
उस समय सत्य का उत्तर किसी नैतिक शास्त्र के किसी आदर्श पात्र जैसा था। उसने मीठे स्वर में कहा कि जो विवाह माता-पिता के आंसुओं पर खड़ा हो, वह कभी सुखद नहीं हो सकता। उसने अपने प्रेम को एक तपस्या माना था और माता-पिता की सहमति को उस तपस्या का वरदान। सत्य के यह बोल आज के आधुनिक प्रेमियों के लिए आदर्श और मर्यादा का एक दर्पण ही है। साधना ने भी सहमति में कहा जो विवाह माता-पिता की आँखों में आंसू भरकर किया जाए, वह संस्कार नहीं, अहंकार होता है। मेरा प्रेम कोई समझौता नहीं, बल्कि महादेव के चरणों में चढ़ाया गया पुष्प है। यदि हमारे परिजनों का आशीर्वाद हमे नहीं मिला, तो हम उम्र भर एकाकी जीवन ही जिएंगे। पर हम अपनों की नजरों में एक दूसरे को कभी गिरने नहीं देंगे।
साधना अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस अपने गांव आ गई। सत्य ने साधना के स्वास्थ्य के लिए इतने निर्जला व्रत रखे कि उसके दफ्तर में उसे ‘व्रतमैन’ कहा जाने लगा। उसके सीनियर अधिकारी हँसते हुए पूछते “मियां, यह कौन सा प्रेम है जो तुम्हें अन्न-जल त्यागने पर मजबूर कर देता है?” सत्य बस मुस्कुरा देता। उसके लिए वे व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि साधना के रोगों को अपने भीतर खींच लेने का एक जरिया थे।
कहानी में एक समय ऐसा भी आया जब सत्य के घर वालों ने उसके ऊपर विवाह का भारी दबाव बनाया। एक सुंदर और धनी कन्या से उसका रिश्ता तय कर दिया गया। सत्य भीतर से टूट गया। उसकी लोवर पीसीएस मेंस की परीक्षा सिर पर थी, पर मन तो साधना के विरह में भटक रहा था। वह मात्र २० अंकों से सफल होने से चूक गया। ऐसे और कई एग्जाम में इंटरव्यू से बाहर होना प्रेम की राह में एक और कठिन साधना थी। साधना ने उसे और तड़पाने के लिए झूठ कह दिया कि उसकी जिंदगी में कोई और आ गया है। यह झूठ साधना ने स्वयं को सजा देने के लिए बोला था। वह चाहती थी कि सत्य उसे घृणा करे और सुखी रहे। पर सत्य का प्रेम घृणा की मिट्टी में उगने वाला पौधा नहीं था। उसने अंततः अपने माता-पिता के सामने घुटने टेकने के बजाय उन्हें अपने सत्य से अवगत कराया। उसने उस लड़की को भी सच बता दिया जिससे उसका रिश्ता तय हुआ था। उसका त्याग फल लाया। उसके माता-पिता ने उसकी बात मान ली और एक सुयोग्य रिश्ता केवल अपने बेटे के अटल प्रेम के आगे ठुकरा दिया।
पच्चीस वर्षों का यह कालखंड कोई सामान्य समय नहीं है। यह एक युग है। पच्चीस वर्षों तक एक-दूसरे की छवि को हृदय में बसाकर, बिना किसी शारीरिक आकर्षण के, केवल रूहानी डोर से बंधे रहना किसी चमत्कार से कम नहीं। आज साधना अपने पिता अरविंद बाबू के सम्मुख एक अर्जी लेकर खड़ी है। वह कहती है कि “पिता जी, यह समाज जिसने सीता जैसी सती पर उंगली उठाने में संकोच नहीं किया, वह हमारे आंसुओं को पोछने कभी नहीं आएगा। मेरे जीवन की खुशियाँ आपके हाथों में हैं। मैंने आज तक ऐसा कुछ नहीं किया जिससे आपका सिर झुके, पर आज मेरी रूह इस पच्चीस वर्ष की तपस्या का प्रतिफल मांग रही है।”
यह कहानी आज के उस दौर के लिए एक मिशाल है, जहाँ प्रेम सोशल मीडिया के लाइक और कमेंट्स तक सिमट गया है। जहाँ चंद दिनों की अनबन रिश्तों को तोड़ देती है, वहाँ साधना और सत्य ने पच्चीस साल तक विरह की अग्नि में तपकर यह सिद्ध कर दिया कि प्रेम यदि निस्वार्थ हो, तो वह ईश्वर का ही एक रूप है। सत्य का वह अटूट विश्वास और साधना का वह मौन आत्म-बलिदान इस बात का प्रमाण है कि अंतर्जातीय दीवारें उन हृदयों को नहीं रोक सकतीं, जिन्हें स्वयं विधाता ने एक-दूसरे के लिए बुना हो।
अरविंद बाबू की आँखों में नमी थी और हृदय में गर्व। उन्हें अपनी बेटी के चरित्र पर तो विश्वास था ही, पर आज उन्हें उस युवक के धैर्य पर भी फक्र हो रहा था। यह गाथा केवल दो मनुष्यों के मिलन की नहीं, बल्कि उस आदर्श प्रेम की पुनर्स्थापना है, जो समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गया है। इस कहानी का अंत किसी विवाह के मंडप पर नहीं, बल्कि उस विश्वास पर होता है कि जहाँ सत्य और साधना का संगम होता है, वहाँ स्वयं महादेव अपना आशीर्वाद बरसाते हैं। यह संसार का वह दुर्लभ प्रेम है, जिसे इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि प्रेम करना आसान है, पर प्रेम को युगों तक तप बनाए रखना कितना जटिल और संघर्ष युक्त है। ईश्वरीय गुण से युक्त प्रेम को असल रूप में जीना किसी महानता से कम नहीं है।







