दक्षिण एशिया के इतिहास में देवों के देव महादेव की उपासना सबसे प्राचीन उपासनाओं में से एक है। महाभारत के ‘द्रोण पर्व’ से ज्ञात होता है कि कृष्ण के परामर्श से अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र प्राप्त करने के लिए हिमालय पर जाकर शिव की आराधना की थी। दरअसल, जगत का कल्याण करने वाले भगवान आशुतोष ‘सत्यम, शिवम और सुंदरम’ के शाश्वत प्रतीक माने जाते हैं। भगवान आशुतोष के कल्याणसुंदरम स्वरूप को ही ‘शिवत्व’ कहा जाता है।
महादेव का यह शिवत्व स्वरूप ही शक्ति के सृजनात्मक रूपांतरण का सूचक है। इस ‘शक्ति स्वरूप शिव’ के आध्यात्मिक रहस्यों की अनुभूति के प्रयोजन हेतु श्रावण मास की शिवरात्रि को शिवलिंग जलाभिषेक के रूप में धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किया जाता है। वस्तुतः शिवरात्रि की महत्ता फलीभूत तब होती है, जब इस पर्व के ‘शिव तत्व’ को हृदय से विस्मृत न किया जाए। ‘शिव’ का अर्थ ही है- कल्याण स्वरूप।
दरअसल, शिवरात्रि को एक प्रतीकात्मक व परंपरागत पर्व की भांति नहीं, बल्कि त्रिगुणात्मक प्रकृति के स्वरूप से अपने अस्तित्व को जोड़ने के सुअवसर की तरह समझना चाहिए। शांत मुद्रा में खड़े भगवान शिव के हाथ में जो त्रिशूल है, वह किसी का संहार करने वाला हथियार नहीं है। असलियत में त्रिशूल प्रतीक है आध्यात्मिक जीवन के तीन मूल आयामों- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी को साधने का। गौरतलब है कि मानव-शरीर में प्राणिक ऊर्जा के केवल यही तीन मूलस्रोत हैं जिनसे प्राणवायु का संपूर्ण शरीर-तंत्र में संचार होता है। आमतौर पर साधारण व्यक्ति इड़ा और पिंगला ऊर्जा के स्तर पर ही जीवन-यापन करते हुए अपनी उम्र गुजार देता है। वह कर्मकांड में बंधकर ही त्योहारों को सेलिब्रेट करते रहना चाहता है।







