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    Home»Featured

    सारे ब्रह्मांड में परमात्मा का ही प्रकाश है

    By November 10, 2018 Featured No Comments3 Mins Read
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    गूगल से साभार
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    मान लें कि कोई बिना टिकट यात्रा कर रहा है। ट्रेन में यात्रियों की बहुत भीड़ है। स्वाभाविक रूप से गाड़ी में कष्ट और असुविधा हो रही है। अगर उसी समय टिकट जांच करने वाले पदाधिकारी वहां पहुंच जाते हैं, तो उसके ऊपर दूसरा कष्ट भी आ पड़ता है। इस तरह यहां प्रारंभ से लेकर अंत तक कष्ट ही कष्ट है। अध्ययन में व्यस्त छात्र को सभी तरह के सुख और सुविधाओं का त्याग करना पड़ता है। लेकिन जब वह सफल परीक्षार्थियों की सूची में अपना नाम पाता है, तो उसकी खुशियों का ठिकाना नहीं रहता है। यहां पहले कष्ट और बाद में सुख है। लेकिन भक्ति के पथ में दुख न तो प्रारंभ में होता है, न ही अंत में।

    जब कोई परमात्मा की अनुकंपा से सचेत होकर जागता है, भक्त बन जाता है। भक्ति साधना नहीं है। भक्ति तो उपलब्धि है। प्रेम क्या है/ प्रेम मन को कोमल बनाता है, तो इतना सुदृढ़ भी कर देता है कि मन स्वयं विषम परिस्थितियों में भी अपना संतुलन बनाए रखता है। जो निरंतर आनंद की अनुभूति उत्पन्न करे, उसे प्रेम कहते हैं। भक्ति और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों स्थाई रूप में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जिस क्षण भक्ति जागती है, तत्क्षण परमात्मा के प्रति प्रेम उजागर हो जाता है। भक्ति आनंद का प्रतिरूप है। आनंद क्या है/ सुख और दुख दोनों जिस साम्यावस्था में होते हैं, उसको आनंद की अवस्था कहते हैं। वहां न हमें सुख महसूस होता है और न ही दुख। सिर्फ आनंद ही आनंद होता है।

    जो लोग नाम-यश को बहुत पसंद करते हैं, अगर उनकी प्रतिष्ठा पर कलंक लग जाए, तो वे स्वयं की हत्या तक सकते हैं। भक्त परमात्मा से कहता है- ‘हे प्रभु! मैं कुछ भी नहीं चाहता हूं। यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो परमभक्ति दें। मैं केवल भक्ति चाहता हूं और कुछ भी नहीं। वे साधक जो आनंद की प्राप्ति के लिए परमात्मा से प्रेम करते हैं, समर्थ लोग तो हैं, लेकिन श्रेष्ठ नहीं।

    केवल वैसे साधक ही श्रेष्ठ भक्त हैं, जो सिर्फ आनंद पाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि परमात्मा को आनंद देने के लिए काम करते हैं। भक्त सबकी सेवा करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि सारा ब्रह्मांड उनके परमात्मा का ही अभिप्रकाश है। प्रत्येक भौतिक सृष्टि परमात्मा की संतान हैं। यदि ऐसा भक्त लोगों की सेवा करता है तो उसकी यह कृति परमात्मा की सेवा करने के बराबर है। भक्त केवल इसलिए साधना करता है, क्योंकि परमात्मा यह चाहता है।

    अतः भक्त केवल परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए साधना करता है। अर्थात जो लोग परमात्मा को आनंदित करने के लिए साधना करते हैं, जो सुख-दुख हर परिस्थिति में परमात्मा की सेवा करने को तत्पर रहते हैं, वही सच्चे भक्त हैं।

    – ओशो

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