चंद रेखाओं में सीमाओं में जिन्दगी क़ैद है सीता की तरह,
राम कब आयेंगे मालुम नहीं,
काश रावण ही कोई आ जाये…
लखनऊ, 18 दिसम्बर 2018: कैफी आजमी साहब की इन पंक्तियों का एक अर्थ नहीं हजार मायने हैं। मैं यहां इसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था से जोड़ता हूं। यदि विपक्ष गूंगा, बहरा और अंधा हो तो सत्ता पक्ष चाहकर भी कुछ बेहतर नहीं कर सकता। दो दशक से देख रहा हैं कि पत्रकारों की जमात उ. प्र. राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त समिति से लेकर इंडियन फेडरेशन वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन की आलोचनाएं कर करके थकते नहीं। लेकिन ये आलोचनाएं देहाती औरतों की तरह होती हैं। हम कलम निगार हैं लेकिन कलम नहीं चला सकते। हम हर खबर और विश्लेषण को तर्क के शिल्प और सुबूत की आत्मा से मुकम्मल करते हैं लेकिन पत्रकार संगठनों और पत्रकार नेताओं की कार्यप्रणाली की खामियों को तर्कपूर्ण तरीके से आज तक किसी ने भी पेश नहीं किया। संवाददाता समिति में आपसी सामंजस्य ना होना.. IFWJU के कारण समिति में गुटबाजी का नतीजा ही है कि अन्य उत्साही पदाधिकारी चाहकर भी पत्रकार के हित में कुछ नहीं कर पाते हैं।
ये परंपरा थी कि समिति अपने गठन के बाद समस्त पत्रकारों के साथ गेट टू गेदर में मतदाता पत्रकारों को धन्यवाद देती थी। पत्रकार चुनी हुए पदाधिकारियों का स्वागत करते थे। अंदरूनी गंदी सियासत के कारण पहली बार ये परंपरा टूट गयी। विशिष्ट योगदान वाले पत्रकारों को समिति में नामित सदस्य घोषित किया जाता था। आपनी खीचा-तानी में ये भी नहीं हुआ। करीब दस से अधिक वर्षों बाद भाजपा सरकार ने पत्रकारों को सम्मान स्वरूप मान्यता समिति में शामिल करने का फैसला किया।
मान्यता समिति गठित हुई ही थी कि संवाददाता समिति के चुनाव और IFWJU के विभाजन की लड़ाई के कारण मान्यता समिति भंग हो गयी। शासन ने फिर नाम मांगे लेकिन संवाददाता समिति को दर्जन भर लोगो में दो तीन नाम चुनने में पसीना आ गया। आपसी झगड़े से बचने के लिए दो-तीन के बजाय आधा दर्जन नाम भेज दिए गये। सबको लेना संभव नहीं था इसलिए मान्यता समिति का गठन नहीं हो सका। जिस कारण सात-आठ महीनों से ज्यादा वक्त तक मान्यता लेने की लाइन में लगे पत्रकार भटकते रहे। यानी पत्रकारों ने जिस समिति का गठन अपने हितों के लिए किया था वही समिति पत्रकारों के लिए अनहितकारी बन गयी।
इन सब नकारात्मक पहलुओ के जितनी जिम्मेदार संवाददाता समिति /IFWJU के पदाधिकारी थे उससे ज्यादा जिम्मेदार कष्ट उठाने वाले आम पत्रकार थे। जिन्होंने इन बिन्दुओं के खिलाफ तर्कपूर्ण तरीके से आवाज नहीं उठायी। सब खामोश रही।
एक छोटे से मास्टर प्लान पर दो दिन काम हुआ ही था कि चंद घंटों में संवाददाता समिति हरकत में आ गयी। एक्शन में आयी समिति ने आनन-फानन में उन गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों के विधानसभा सत्र के पास बनवा दिये जिनके पास बनने से इंकार कर दिया गया था।
नंबर वन- मान्यता प्राप्त समिति के नाम की ही दूसरी समिति ने दो वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकारों को विधानसभा अध्यक्ष के हाथों से ‘अटल पत्रकारिता सम्मान दिलवाया।
नंबर दो- अपनी जिम्मेदारियों से बेखबर समिति के स्थान पर दूसरे पत्रकार संगठन द्वारा विधानसभा सत्र के पास बनने में सहयोग करने की खबर जारी करना। संवाददाता समिति पदाधिकारियों ने अपनी तस्वीरों के साथ घोषणा की थी कि विधानसभा सत्र की कवरेज से संबंधित कार्यशाला का आयोजन होगा। पदाधिकारियों की तस्वीरों के पीछे ये घोषणा भी दफ्न हो चुकी थी। दूसरे संगठन ने ऐसी वर्कशॉप की घोषणा करके बहुत पहले घोषणा करने वाली संवाददाता समिति को जगा दिया।
प्लान नंबर तीन- संवाददाता समिति का वादा जी बी एम बुलाने का था। ताकि समिति समय समय पर सभी पत्रकारों के साथ बैठकर उनकी समस्याओं और जरूरतों पर गौर करे।
ये घोषणा भी कोई दूसरा पत्रकार संगठन कर दे तो संवाददाता समिति जल्द ही समस्त पत्रकारों की सामान्य बैठक बुलाने पर मजबूर हो जायेगी।
हरकत में बरकत है। जब सत्ता पक्ष सो रहा हो तो उसे अपने कलम से जगा दो। क्योंकि पत्रकार धरना नहीं दे सकता। लाठी नहीं चला सकता। पत्रकारों के परिवार के जिम्मेदारों को उनका एहसास दिलाने के लिए तलवार की नोक पर हक की लड़ाई नहीं लड़ सकता। तर्क दे सकता है.. सुबूत दे सकता है.. एहसास करा सकता है.. मजबूरी में विपक्ष जैसी राजनीति कर सकता है। कलम से और सिर्फ कलम से। इसके अलावा हमारे पास है ही क्या। ये ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है, जो किसी भी शक्ल में सोते हुए लोगों के मुंह पर पानी की छींटे देती रहेगी।
-नवेद शिकोह, 8090180256







