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    महान स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस ने जब अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए

    By May 29, 2019 Featured No Comments10 Mins Read
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    अब आगे विश्व को पांच वीटो पॉवर की कैद से निकालकर वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद) का गठन करना है

    प्रदीप कुमार सिंह

    आजाद हिन्द फौज के संगठनकर्ता, महान क्रांतिकारी एवं जापानी सरकार के ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ से अलंकृत रास बिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदह नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था। जब बालक रास बिहारी मात्र तीन साल के थे तब उनकी मां का देहांत हो गया जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी मामी ने किया। रास बिहारी की आरंभिक पढ़ाई सुबालदाह में उनके दादाजी कालीचरण की निगरानी में हुई। वह दादाजी से स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां बड़े मनोयोग से सुना करते थे। रास बिहारी के दिलो-दिमाग में आजादी के बीज रूपी संस्कार रोपने वाले प्रथम प्रेरणा स्रोत उनके दादाजी थे।

    रास बिहारी बाल्यकाल से ही देश की आजादी के बारे में सोचते थे और क्रान्तिकारी गतिविधियों में गहरी रूचि लेते थे। उनकी आगे की शिक्षा डुप्लेक्स महाविद्यालय, चंदन नगर में हुई। जहाँ उनके पिता विनोद बिहारी बोस सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। डुप्लेक्स महाविद्यालय के अपने शिक्षक चारू चंद से उन्हें क्रांति की प्रेरणा मिली तथा बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंद मठ से उनके अंदर क्रांति का जज्बा पैदा हुआ था। उन्होंने सुरेंद्रनाथ बनर्जी एवं युवा स्वामी विवेकानंद इन दो ओजस्वी महापुरूषों के देश भक्ति तथा आध्यात्मिकता से परिपूर्ण भाषण पढ़कर अत्यधिक आत्म शक्ति अर्जित की। चन्दन नगर उन दिनों फ्रांसिसी कब्जे में था। 1789 की फ्रेंच राज्य क्रांति का उनके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा।

    इस आजादी के दीवाने ने विश्व के अनेक देशों में जाकर अंग्रेजों के खिलाफ समर्थन जुटाया। वह उच्च शिक्षा को भारत को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए अपने हथियार बनाना चाहते थे। भारत के वह उस समय के बिरले व्यक्तियों में से एक थे जिन्होंने चिकित्सा शास्त्र और इंजीनियरिंग दोनों अलग-अलग क्षेत्रों की स्नातक तक की पढ़ाई फ्रांस और जर्मनी से पूरी की थी। रास बिहारी ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक सरकारी नौकरी भी की थी। चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा ग्रहण करने के कारण उन्हें रसायनों के प्रयोगों का अच्छा ज्ञान था। इस ज्ञान को उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विस्फोटक तैयार करने में उपयोग किया।

    1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात जो घटनाएं घटीं, उनसे प्रभावित होकर रास बिहारी क्रांतिकारी गतिविधियों में पूरी तरह से संलग्न हो गए। वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि जब तक देशभक्तों से कुछ क्रांतिकारी कार्यवाही नहीं होती, अंग्रेजी सरकार देश को आजाद करने के लिए झुकेगी नहीं, जतिन बनर्जी के मार्गदर्शन में उनकी क्रांतिकारी गतिविधियाँ बढ़ने लगीं। इस दौरान उन्होंने अरविंदो घोस और जतिन बनर्जी के साथ मिलकर बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकुमत की नीयत को उजाकर करने का प्रयत्न किया। धीरे-धीरे उनका परिचय बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले ‘युगान्तर’ क्रान्तिकारी संगठन के अमरेन्द्र चटर्जी और अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे जतीन्द्रनाथ बनर्जी से हुआ। जतीन्द्रनाथ बनर्जी के सम्पर्क में आने पर उनका परिचय संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों से हुआ। उन्होंने 1908 में अलीपुर बम धमाके के बाद बंगाल छोड़ दिया था।

    रासबिहारी बोस आनेवाली क्रांति के मस्तिष्क एवं आत्मा थे। ठंडे दिमाग से सुस्पष्ट विचार करना उनकी विशेषता थी, साथ ही उनमें प्रचुर शारीरिक तथा आत्मिक शक्ति थी जिसके कारण वे इतनी बड़ी क्रांति की योजना बनाने, जगह-जगह पर घूमने तथा चतुर पुलिस से बचने जैसे अनेक श्रमसाध्य कार्य कुशलतापूर्वक कर सकते थे। उन्होंने क्रान्ति के बीज विशेषकर दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में रोपने में सफलता प्राप्त की।

     

    23 दिसंबर 1912 में ‘दिल्ली दरबार’ के बाद जब भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग की शोभा यात्रा दिल्ली के चांदनी चौक में निकाली जा रही थी तब हार्डिंग पर बम फेंका गया परन्तु वो बाल-बाल बच गए। बम फेंकने की इस योजना में रास बिहारी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। बोस ब्रिटिश पुलिस से बचने के लिये रातों-रात रेलगाड़ी से देहरादून चले गए और अगले दिन देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में अपने कार्यालय में जाकर इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। अंग्रेजी प्रशासन को उन पर कोई शक न हो इसलिए उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सार्वजनिक सभा बुलायी और वायसराय हार्डिंग पर हुए हमले की घोर निन्दा भी की।

    सन 1913 में बंगाल बाढ़ राहत कार्य के दौरान उनकी मुलाकात जतिन मुखर्जी से हुई, जिन्होंने उनमें नया जोश तथा आत्म विश्वास भर दिया जिसके बाद रास बिहारी बोस दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। उन्होंने भारत को आजादी दिलाने के लिये प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनायी और फरवरी 1915 में अनेक भरोसेमंद क्रान्तिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके क्रांतिकारी कार्यों का एक प्रमुख केंद्र वाराणसी रहा, जहाँ से उन्होंने गुप्त रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया।

    अमेरिका और कनाडा में रहने वाले पंजाबियों ने गदर पार्टी का गठन किया था। पार्टी के गठन का मकसद भारत को आजाद कराना था। 1914 में अमेरिका और कनाडा में बसे भारतीयों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए भारत आना शुरू कर दिया था। इस गदर आंदोलन की कमान रासबिहारी बोस को सौंपी गई। उन्होंने 21 फरवरी, 1915 को ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ बगावत की योजना बनाई थी। लेकिन अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई जिसके बाद बगावत की योजना को टाल दिया गया।

    ऐसा माना जाता है कि सन 1857 की सशस्त्र क्रांति के बाद ब्रिटिश शासन को समाप्त करने का यह पहला व्यापक और प्रभावशाली क्रांतिकारी योजना थी। ‘सशस्त्र क्रांति’ की योजना के बाद ब्रिटिश पुलिस रास बिहारी बोस के पीछे लग गयी जिसके कारण वो जून 1915 में रवीन्द्र नाथ टैगोर के रिश्तेदार राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान के शहर शंघाई पहुँचे और वहाँ रहकर भारत की आजादी के लिये काम करने लगे। ब्रिटिश सरकार ने रास बिहारी जी का पता बताने वाले को जगह-जगह पोस्टर लगाकर एक लाख रूपये इनाम देने की घोषणा की। आज से लगभग 111 वर्ष पूर्व यह एक बहुत बड़ी रकम थी। रास बिहारी जी की हूंकार से दिल्ली से लंदन तक बैचेनी बढ़ गयी थी।

    जापान में उन्होंने अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतन्त्रता के लिये निरन्तर प्रयास किया। जापान में उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का कार्य किया। वहाँ पर उन्होंने क्रान्ति की ज्वाला पूरे एशिया में फैलाने के लिए ‘न्यू एशिया’ नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। रास बिहारी बोस ने जापानी भाषा सीख ली तथा वार्ताकार एवं लेखक बन गए। उन्होंने कई सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया तथा भारत का न्यायपूर्ण दृष्टिकोण स्पष्ट करने हेतु जापानी में कुल 16 पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘रामायण’ का भी अनुवाद जापानी भाषा में किया। जापान में रास बिहारी बोस ने जापानी डिश को भारतीय ढंग से बनाया जिसे जापान में काफी लोकप्रियता मिली। भारतीय उप-महाद्वीप में परोसी जाने वाली करी, जापान में नाकामुराया करी के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो ने टोकियो में एक होटल खोला और रास बिहारी जी वही से भारतीयों को संगठित करना शुरू किया। उधर ब्रिटिश सरकार लगातार उनके पीछे लगी हुई थी और वो जापान सरकार से उनकी गिफ्तारी की मांग कर रही थी। जिसके चलते लगातार एक वर्ष तक रास बिहारी बोस अपनी पहचान को बदल-बदल कर आवास भी बदलते रहे।

    सन 1918 में रास बिहारी बोस ने सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री तोशिको से विवाह कर लिया और सन 1923 में जापानी नागरिकता ग्रहण कर ली। वह कुछ वर्षों के लिए घर-गृहस्थी में व्यस्त हो गये उनके दो बच्चों भी हुए। 1925 में 28 वर्ष की आयु में तोशिका की न्यूमोनिया बीमारी से मृत्यु हो गई। पत्नी की मृत्यु के बाद युवा रास बिहारी ने दूसरा विवाह नहीं किया और वह पूरी तरह से राजनीति में सक्रिय हो गये। रास बिहारी बोस ने जापानी अधिकारियों को भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और भारत की आजादी की लड़ाई में उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने 28 मार्च 1942 में टोक्यो में पहला सम्मेलन करके ‘इंडियन इंडीपेंडेंस लीग’ की स्थापना की और भारत की स्वाधीनता के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया।

    जून 1942 में उन्होंने थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक में इंडियन इंडीपेंडेंस लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें भारत के सबसे सक्रिय युवा क्रान्तिकारी सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित किया गया। इसी के साथ झंडे का भी चयन किया और जिसे आजाद नाम दिया। इस झंडे को उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया। सुभाष उस समय जर्मनी में थे। वह जर्मनी की पनडुब्बी में बैठकर बहुत ही गुप्त रूप से रास बिहारी जी से मिलने आये थे। रास बिहारी जी को सुभाष बाबू से देश को आजादी दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने की बहुत उम्मीदें थी। मलय और बर्मा के मोर्चे पर जापान ने कई भारतीय युद्ध बन्दियों को पकड़ा था। इन युद्ध बन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई.एन.ए.) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर 1942 में गठित की गयी। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई.एन.ए. का पुनर्गठन किया।

    देश की आजादी के लिए एक देश से दूसरे देश की कठिन यात्राऐं करने के कारण रास बिहारी जी का स्वास्थ्य निरंतर गिरने लगा था। उन्हें बुरी तरह अस्वस्थ होने पर टोकियो के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। जापानी सरकार के सम्राट ने ‘आर्डर आफ दी राइजिंग सन’ एक विदेशी को दी जाने वाली सर्वोच्च उपाधि से उन्हें अस्पताल में ही सम्मानित किया। भारत माता के इस वीर सपूत का लगभग 59 वर्ष की आयु में 21 जनवरी 1945 को सरकारी अस्पताल में निधन हो गया। भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में इनका नाम सदैव प्रथम पंक्ति तथा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। आत्मा अजर अमर अविनाशी है। महान व्यक्तित्व सदा अमर रहते हैं। रास बिहारी जी की विश्वात्मा सूक्ष्म रूप से युगों-युगों तक अपने कल्याणकारी विचारों से सारी मानव जाति का सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी।

    रास बिहारी जी के जीवन पर भारतीय, ब्रिटिश, फ्रेन्च, जर्मनी तथा जापानी संस्कृतियों का गहरा प्रभाव पड़ा था। जिसके कारण युवा रास बिहारी का विश्वव्यापी दृष्टिकोण तथा विश्वव्यापी समझ विकसित हो गयी थी। वह सारे विश्व को अपने कुटुम्ब की तरह मानते थे। आपने जो आजादी़ की आवाज उठाई थी, वह महज़ अंग्रेजां के खिलाफ़ नहीं बल्कि सारी मानव जाति के शोषण के विरूद्ध थी। भारत की आजादी से प्रेरणा लेकर 54 देशों ने अपने को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कर लिया था।

    रास बिहारी जी ने जो जज्बा भारत को आजाद करने का जीवन पर्यन्त दिखाया था, आज उसी जज्बे के साथ विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक तथा युवा भारत के प्रत्येक नागरिक को अब आगे विश्व को पांच वीटो पॉवर की कैद से निकालकर वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था (विश्व संसद) का गठन करने का वातावरण निर्मित करना है। पांच वीटो पावर सिस्टम होने के कारण विश्व शान्ति की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ में मानव जाति के हित में कोई निष्पक्ष फैसला नहीं हो पाता है। इसलिए वीटो पावर सिस्टम समाप्त करके विश्व की एक संसद का गठन विश्व के सभी देशों को मिलकर करना चाहिए। प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून होने से कोई देश किसी आतंकवादी को शरण नहीं दे सकेंगा। विश्व को घातक शस्त्रों की होड़ तथा युद्धों से मुक्त कराने की चुनौती भी देश के प्रत्येक नागरिक को स्वीकारनी चाहिए तथा इसके लिए यथा शक्ति योगदान करना 21वीं सदी की सबसे बड़ी मानव सेवा है।

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