डॉ दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वस्थ व सकारात्मक राजनीति का परिचय दिया। यह अस्वस्थ मुलायम सिंह यादव को देखने और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामना देने उनके आवास पर गए। कुछ दिन पहले चुनाव में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाए गए। लेकिन यह प्रजातांत्रिक राजनीति थी। योगी और मुलायम सिंह ने इसे व्यक्तिगत रूप नहीं दिया था। यही कारण था कि दोनों जब मिले तो किसी को नजर छिपाने या झुकाने की जरूरत नहीं पड़ी। योगी का यह कदम प्रदेश में स्वस्थ राजनीति को बढ़ावा देगा।प्रजातंत्र में राजनीतिक व वैचारिक मतभेद स्वभाविक है। वैचारिक मतभेद का व्यक्तिगत सम्बन्धों पर प्रभाव अनुचित होता है। इसे स्वस्थ राजनीति नहीं कहा जा सकता। आजादी के बाद कई दशकों तक देश में व्यक्तिगत संबंधों को राजनीति से ऊपर रखने का चलन था। यही कारण था कि जवाहरलाल नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी को भावी प्रधानमंत्री बताया था।
अपने विरोधी उम्मीदवार को आर्थिक व वाहन संबन्धी सुविधा प्रदान करने के भी अनेक उदाहरण थे। लेकिन पिछले कुछ समय से इस प्रकार की राजनीति दुर्लभ होती गई। व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप की सीमाएं लांघने में संकोच नहीं रहा। तमिलनाडु में डीएमके और अन्ना द्रमुक, उत्तर प्रदेश में सपा बसपा ने निजी या पारिवारिक शत्रुता के अध्याय तैयार किये। जयललिता और करुणानिधि वैचारिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से विपरीत ध्रुवों पर आधारित राजनीति करते रहे। यहां तक कि विधानसभा में भी अल्पमत अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करता था।

उत्तर प्रदेश में गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा भी टकराव के रास्ते पर आ गए थे। करीब डेढ़ दशक तक उत्तर प्रदेश की राजनीति इनकी निजी लड़ाई के हवाले रही। एक दूसरे के लिए अमर्यादित शब्दों का प्रयोग सामान्य बात थी। कुछ समय पहले तक दोनों के बीच ऐसा ही चल रहा था। अखिलेश यादव भी मुलायम सिंह की इस विरासत का निर्वाह कर रहे थे। मायावती ने तो सपा का अपने ढंग से नामकरण कर दिया था। वह इसी नाम से सपा का उल्लेख करती थी। दो हजार चौदह के लोकसभा और दी हजार सत्रह के विधानसभा चुनाव ने इनके अस्तित्व के सामने संकट पैदा कर दिया था। इसके बाद दोनों को वजूद बचाने के लिए गठबन्धन करना पड़ा। लेकिन यह भी ज्यादा नहीं चल सका।
मायावती ने फिर अकेले लड़ने का निर्णय लिया है। इस राजनीति ने ऐसा माहौल बदला था कि एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होना भी किसी को मंजूर नहीं था। शीर्ष स्तर की रंजिश का पार्टी प्रवक्ताओं और समर्थकों तक विस्तार दिखाई देने लगा। जिन प्रवक्ताओं का जमीन पर कोई जनाधार नहीं था, वह भी विरोधियों के शीर्ष नेतृत्व पर व्यक्तिगत प्रहार करते थे, अमर्यादित टिप्पणी करते थे। अंततः ऐसे प्रवक्ता भी अपनी अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले साबित हुए।
योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर सकारात्मक राजनीति के अनुरूप कदम उठाया। वह मुलायम सिंह यादव का कुशलक्षेम पूंछने गए। इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुलायम सिंह यादव के पौत्र तेज प्रताप के विवाह में शामिल होने सैफई गए थे। मुलायम सिंह यादव ने पिछली लोकसभा में नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। उनके पुनः प्रधानमंत्री बनने की कामना थी। अनुभवी मुलायम सिंह जमीनी स्थिति देख रहे थे। वह जानते थे कि उत्तर प्रदेश में बसपा से गठबन्धन का सपा को कोई लाभ नहीं होगा।
परिणाम आये तो जाहिर हुआ कि मुलायम सिंह का सोचना सही था। फिर भी सपा और बसपा ने जो कटुतापूर्ण माहौल बनाया था, उससे प्रदेश को बाहर निकालने की जिम्मेदारी योगी आदित्यनाथ को ही निभानी थी। क्योंकि प्रदेश में नए माहौल का जनादेश भाजपा को ही मिला था। जो रिश्ते चुनावी समीकरण के हिसाब से बनते है, उनमें सैद्धांतिक तत्वों का अभाव होता है। ऐसे संबन्ध चुनाव परिणाम पर निर्भर होते है।
गठबन्धन के बाद भी बसपा के किसी बड़े नेता ने मुलायम सिंह यादव का हालचाल लेने की जहमत नहीं उठाई थी। जबकि चुनाव के समय गठबन्धन का बड़ा गुणगान हो रहा था। परिणाम आते ही रिश्तों की कलई उतरने लगी। मायावती ने जो कहा उसमें न सपा के प्रति सम्मान था, न मुलायम सिंह स्वास्थ को लेकर कोई बात थी। मायावती ने कहा कि अखिलेश व डिम्पल से उनके रिश्ते बने रहेंगे। ये दोनों उनको अपना आदर्श मानते है, बहुत सम्मान करते है।
यह कथन सपा के शीर्ष नेतृत्व को अपने सामने कमजोर दिखाने वाला था। मतलब जो माहौल डेढ़ दशक तक चला, उसी तरफ प्रदेश के बढ़ने की तस्वीर बनने लगी थी। ऐसे में योगी आदित्यनाथ ने सकारात्मक पहल की है। यह विचार केवल विरोधी पार्टी के नेता को देखने की औपचारिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रदेश की राजनीति पर दूरगामी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।







