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    Home»Featured

    दुधवा टाइगर रिजर्व में बढ़ रही विलुप्त गिद्धों की तेजी से संख्या

    By June 15, 2019Updated:June 29, 2019 Featured No Comments5 Mins Read
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    मप्र के भोपाल में भी गिध्द संरक्षण का प्रयास हो रहे हैं तेज

    क्या आपने अपने इलाके में कभी गिद्ध देखा है? नहीं न!! यदि देखा भी होगा तो इंटरनेट पर या फिर किसी मैगज़ीन में! दरअसल काफी साल हो गए इन्हे विलुप्त हुए आखिर ऐसे वे क्या कारण रहे होंगें, जिससे इन्हें विलुप्ति के कगार पर पंहुचा दिया, सरकार द्वारा इनके संरक्षण के लिए क्या उपाए किये जा रहे हैं आज इसी पर एक चर्चा करेंगे।

    प्रकृति ने मानव के द्वारा फैलाई गई गंदगी को साफ करने का कार्य तीन जीवों के हवाले किया है। और वो तीन जीव हैं- गिद्ध, कौआ और कुत्ता! ये तीनों प्राणी अनवरत रूप कुदरती सफाईकर्मी की भूमिका का निर्वाह करते रहें है। जहॉ कुत्ता और कौआ मनुष्यों द्वारा फैलाई गई खाद्यान्न सामग्री को चट कर उसके सडऩे से फैलने वाले रोगों से बचाते हैं वहीं गिद्ध मरने वाले पशुओं को खाकर वातावरण को दूषित होने से तो बचाते ही हैं, साथ ही प्राकुतिक रूप से भोजन चक्र में अह्म भूमिका भी निभाते है। ये हमें बीमारी से बचाते है।

    संक्रामक बीमारी और कुत्तों की उपस्थिति का अंर्तसंबंध 1994 में गुजरात के सूरत शहर में फैली प्लेग की बीमारी से ज्ञात होता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1994 में सूरत नग रनिगम ने कुत्तों को मारने का अभियान चलाया था जिससे कुत्ते तो खत्म हो गए लेकिन शहर में गंदगी और चूहे बढ़ गए। अब गंदगी रोग की वाहक होती है और चूहे प्लेग के जीवाणुओं के,जिसका परिणाम सूरत में प्लेग जैसी भयानक बीमारी की वापिसी के रूप में सामने आया था। गिद्ध की प्रासंगिेता की बात है तो गिद्ध मरे हुए पशुओं को खाते थे अब से लगभग पच्चीस वर्ष पहले तक गॉव और शहर के बाहर गंदगी के पास गिद्ध के झुण्ड मंडराते हुए दिखते थे। मगर अब गिद्ध की संपूर्ण प्रजाति पर ही संकट हैं ?

    RT natureismetaI: A flock of Vultures waiting for a Black-backed Jackal to finish its meal https://t.co/3o4z3ryjMv

    — susi (@sumit29136) June 29, 2019

    भारत में गिद्धों की मुख्य नौ प्रजातियॉ- बिय डेंड, इजिप्शियन, स्लैंडरबिल्ड, सिनेरियस, किंग, यूरेजिन, लॉग बिल्ड, हिमालियन ग्रिफिन और व्हाइट बैक्ड हैं, जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार 1980 के दशक तक भारत में काफी संख्या में गिध्द पाए जाते थे। देश के हर हिस्से में इनकी उपस्थिति थी। 1990 के मध्य दशक तक इनकी संख्या आधी हो गई। और वर्ष 2007 तक स्थिति इतनी विकट हो गई कि देश के 99 प्रतिशत गिद्धों का सफाया हो गया। वैसे अपनी संख्या वृद्वि के हिसाब से भी गिध्दों का जीवन चक्र भी काफी जटिल होता है। गिद्ध जब पॉच साल के होते हैं तभी वे जोड़ा बनाते हैं और प्रजनन शुरू करते हैं। पूरे जीवन काल में वे केवल एक मादा साथी के साथ जोड़ा बनाते हैं।

    गिद्ध अक्टूबर की शुरूआत में अपने घोंसले बनाते हैं और मार्च तक उनमें रहकर प्रजनन करते हैं। फिर वे घोंसले छोड़कर चले जाते है। गिद्ध साल में एक ही बार अण्डे देते है, जिनमें से 50 प्रतिशत बेकार चले जाते है। जहॉ तक हमारी प्रकृति में इनकी उपयोगिता की बात है तो इन्हें कुदरती सफाई कर्मी कहा जाता है। ये हमारे जैव पर्यावरण के अनुकूल होते है। मृत जानवरों को खाकर उनसे फैलने वाली घातक बीमारियों से हमें बचाते है।

    इस संदर्भ में गिध्द संरक्षण कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिक डॉ.विभु प्रकाश के अनुसार- मृत जानवरों के मांस में बैक्टरीया और फंगश पनपने लगते है। ये मांस के सडऩे के बाद जमीन के अंदर चले जाते हैं, साथ ही हवा के द्वारा वातावरण में फैलते हैं। इन बैक्टरीया को नष्ट नहीं किया जा सकता है। परिणामस्वरूप अनेक बीमारियॉ मनुष्यों और जानवरों में फैल सकती है। इस मांस को खाकर गिध्द हमें बीमारियों से बचाते है। गिध्दों के पेट में उच्च अम्लता वाला एसिड होता है, जिससे मॉस तेजी से पचता है।अत: काफी मात्रा में मांस खाने के बाद वे शीघ्र ही पुन: मॉस खाने के लिए आ जाते है। गिध्दों की इस क्षमता के कारण जमीन में बैक्टरीया का प्रभाव होने के पहले ही मॉस खत्म हो जाता है, और हम उसके घातक प्रभाव से बच जाते हैं।

    प्रकृति का रक्षक गिद्ध विलुप्ति की कगार पर क्यों?

    अब प्रश्न ये है कि प्रकृति का यह रक्षक विलुप्ति की कगार पर कैसे पहुॅच गया? गिध्दों की विलुप्ति का सबसे बड़ा एकमात्र कारण है- दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनेक। इस दवा का प्रयोग मनुष्यों एवं पालतु पशुओं पर काफी अधिक किया जाता है। इसका प्रभाव जानवरों के मॉस में काफी लंबे समय तक बना रहता है। जानवरों के मरने पर इस दवा से युक्त मॉस को खाने के कारण गिध्दों में यूरिक एसिड बहुत तेजी से बनने लगता है, जो गिध्दों की किडनी खराब कर देता है और वे मर जाते है। हालॉकि वर्ष 2008 में सरकार ने जानवरों के लिए इस दवा को प्रतिबंधित कर दिया है। लेकिन मनुष्यों के लिए 30 एमएल की छोटी शीशी में उपलब्ध है और पशु पालक और पशु चिकित्सक इसका प्रयोग कर रहें हैं जिससे गिध्द मर रहें है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पशुओं के लिए दी जाने वाली एक अन्य दवा एकेक्लोफेनेक भी गिध्दों के लिए खतरा बन गई है। एकेक्लोफेनेक की संरचना और औषधीय गुण डाइक्लोफेनेक जैसे है।और अब यह दवा गिध्दों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। हालॉकि पर्यावरणविदों के प्रचार प्रसार और डाइक्लोफेनेक पर रोक के बाद कई जगहों पर गिध्द पुन: देखे गए हैं। उत्तरप्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व में गिध्दों की संख्या बढ़ी हैं। म.प्र. में भोपाल के निकट गिध्द संरक्षण का प्रयास हो रहा है। वास्तव में गिध्द हमारे पर्यावरण के साथ साथ मानवता के लिए भी जरूरी है। क्योंकि इनके खात्में से न जाने कौन सी अनजानी बीमारी सिर उठा ले और हमारा सफाया कर दे बेरोकटोक? ऐसी स्थिति से बचने के लिए आइए हम गिध्दों को बचाएॅ।

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